Agriculture

क्या भावंतर भरपाई योजना का किसानों को मिल रहा है फायदा?

भावंतर भरपाई योजना के तहत हरियाणा में केवल 13 करोड़ रुपए का ही भुगतान किया गया है, इस पर भी किसान संगठन सवाल उठा रहे हैं। किसानों के और भी कई सवाल है, जिन पर बात नहीं हो रही है

 
By Malick Asgher Hashmi
Last Updated: Friday 08 November 2019
Photo: Vikas Choudhary
Photo: Vikas Choudhary Photo: Vikas Choudhary

हरियाणा के मुख्यमंत्री का पद दूसरी बार संभालते ही मनोहरलाल खट्टर ने भावंतर-भरपाई योजना में दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी है। पिछले दो वर्षों में योजना के औचित्य पर किसान संगठनों के सवाल उठाने के बावजूद उन्होंने इस योजना में तीन और फसलों गाजर, अमरूद और मटर को जोड़ने का ऐलान कर दिया है। प्रदेश के बागवानी विभाग ने कुछ दिनों पहले इस बारे में सरकार को सुझाव दिया था। मुख्यमंत्री की घोषणा पर अमल  हुआ तो इसे लागू करने में एक साल का समय लगेगा।

दरअसल, भावंतर-भरपाई योजना सरकार की एक तरह की बीमा पॉलिसी है। यह प्रदेश में एक जनवरी 2018 से लागू है। इसके पीछे सरकार की मंशा है कि यदि सब्जी उत्पादकों को उनके उत्पाद का भाव बाजार में कम मिले तो आर्थिक सहायता देकर इसकी भरपाई कर दी जाए। अब तक यह चार फसलों फूलगोभी, टमाटर, प्याज और आलू पर लागू है।

भारतीय किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष मास्टर ओम सिंह कहते हैं कि दो साल पहले देश के कई हिस्से में टमाटर और दूसरी फसलों का अधिक उत्पादन होने और बाजार भाव माकूल नहीं मिलने के कारण किसानों ने विरोध स्वरूप इसे सड़कों पर फेंक दिया था। इसके बाद केंद्र की इस योजना को अलग-अलग प्रदेशों में कुछ परिवर्तन के साथ लागू किया गया है। हालांकि, मध्य प्रदेश में लहसुन की फसल के मामले में यह योजना बुरी तरह फ्लॉप साबित हुई है। तत्कालीन एमपी सरकार ने फसल के दाम की भरपाई की जगह किसानों को थोड़े पैसे देकर इतिश्री कर ली थी, जिसको लेकर काफी हंगामा हुआ था।

हरियाणा के किसानों के समक्ष अब तक ऐसी नौबत नहीं आई है। फसलों की बाजार में इतनी अधिक कीमत मिल जाती है कि वे योजना में शामिल होने की जरूरत नहीं समझते। हरियाणा के नूंह जिला के बागवानी अधिकारी दीन मोहम्मद भी स्वीकारते हैं कि जिन किसानों की फसलों को सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक कीमत मिल रही है, उनके लिए भावंतर-भरपाई योजना कारगर नहीं। सरकार ने प्रति क्विंटल आलू और टमाटर का न्यूनतम समर्थन मूल्य 500 रूपये और फूलगोभी तथा प्याज का 600 रूपये रखा है। पिछले दो साल से स्थिति है कि इन फसलों का बाजार मूल्य प्रति किलो दस रूपये से नीचे आ ही नहीं रहा है।

 इसके अलावा फसलों के पंजीकरण और बाद की औपचारिकताएं इतनी जटिल हैं कि प्रदेश के अधिकांश सब्जी उत्पादक योजना के झमेले में पड़ना  नहीं चाहता। इसका लाभ लेने के लिए किसानों को पहले सरकार की वेबसाइट पर पंजीकरण कराना होता है। फिर बागवानी विभाग एवं मार्केटिंग बोर्ड अपनी-अपनी भूमिका अदा करते हैं। विभाग के लोग पंजीकरण कराने वाले किसानों के खेत पर जाकर लगाई गई फसलों की समीक्षा और आंकलन करते हैं। बोर्ड किसान को जे-फार्म और गेट पास उपलब्ध कराता है। जब भावंतर की भरपाई करने की नौबत आती है तो मार्केटिंग बोर्ड आसपास के बाजारों से भावों का पता लगाकर बीच का रास्ता निकालते हुए भुगतान के लिए दाम निर्धारित करता है। इसके बाद किसानों के खातों में सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार से मिलने वाले कम भाव की भरपाई करते हुए बाकी रकम  बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी जाती है। इसे यूं समझ सकते हैं। यदि किसी किसान को टमाटर की कीमत चार सौ रूपये क्विंटल मिलती है, जब कि सरकार ने इसके लिए समर्थन मूल्य पांच सौ रूपये निर्धारित किया हुआ है तो भावंतर-भरपाई योजना के तहत सौ रूपये प्रति क्विंटल तक उसके बैंक खाते में डाला जा सकता है।

बागवानी विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, पिछले साल इस योजना का लाभ टमाटर उपजाने वालों को मिला था और उन्हें तकरीबन 13 करोड़ रुपए अदा किए गए थे। हालांकि भारतीय किसान संघ विभाग के दावों को झूठा करार देता है। संघ के प्रदेश अध्यक्ष मास्टर ओम सिंह कहते हैं कि भिवानी के तोशा में पिछले साल टमाटर की इतनी अधिक पैदावार हो गई थी कि बाजार में किसानों को माकूल दाम नहीं मिला। उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ा था। किसानों ने भावंतर-भरपाई योजना के तहत अपना पंजीकरण नहीं करवाया था। इसलिए उन्हें इसका लाभ नहीं मिला। ओम सिंह ने बताया कि इस योजना के बारे में बहुत कम किसानों को पता है। दूसरा, वे ऑन लाइन पंजीकरण के दौरान मांगी जाने वाली जानकारियां देने में हिचकते हैं। तीसरा, पंजीकरण की तारीखों की उन्हें बहुत कम जानकारी है।

अखिल भारतीय किसान सभा के प्रदेश महासचिव डॉक्टर बलबीर सिंह ने प्रदेश सरकार पर आरोप लगाया कि इस योजना में जान-बूझकर ऐसी फसलें शामिल कर रही है, जिनकी कीमत बाजारों में किसानों को अच्छी मिल रही है। बाकी सब्जियों, फलों, और फूलों को योजना से इसलिए दूर रखा गया है कि इनकी फसलों की बर्बादी की खबरें आए दिन सुर्खियों में रहती हैं।

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भावंतर के लिए पंजीकरण की तारीख

-आलूः 15 सितंबर से 31 अक्टूबर
- प्याजः 15 दिसंबर से 15 फरवरी
-टमाटरः 15 दिसंबर से 15 फरवरी
-फूलगोभीः 15 सितंबर से 31 अक्तूबर
-आलूः खेतों का सत्यापन 30 नवंबर तथा अपील 15 दिसंबर तक
-प्याजः 15 मार्च तथा 25 मार्च तक
-टमाटरः 15 मार्च एवं 25 मार्च
-फूलगोभीः 30 नवंबर एवं 15 दिसंबर

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