Agriculture

लगान मुक्ति कानून की मांग पर अपमान झेल रहे कोसी के मजबूर किसान

कोसी के दो तटबंधों के बीच मौजूद 380 गांव के लाखों किसानों को कोसी के कहर के साथ अब सरकार के अपमान का भी घूंट पीना पड़ रहा है

 
Last Updated: Tuesday 02 July 2019
बिना किसी सुविधाओं के कोसी तटबंध में रह रहे हैं किसान। फोटो: उमेश कुमार राय
बिना किसी सुविधाओं के कोसी तटबंध में रह रहे हैं किसान। फोटो: उमेश कुमार राय बिना किसी सुविधाओं के कोसी तटबंध में रह रहे हैं किसान। फोटो: उमेश कुमार राय

उमेश कुमार राय

 

बिहार में कोसी नदी के दो तटबंधो के बीच बसे करीब 380 गांव में रहने वाले लाखों किसान इस वक्त बड़ी दुविधा में हैं। कोसी का कहर और सरकार की उपेक्षा के चलते न तो खेती लायक उनके पास खेत हैं और न ही कोई रोजगार। ऐसी संकटग्रस्त अवस्था में भी किसानों के कन्धों पर भूमि लगान का बोझ है और कानों में सरकारी अपमान के शब्दों की गूंज। हाल ही में हिम्मत बांध कर  कोसी तटबंध की त्रासदी झेलने वाले 3800 किसानों ने मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार के कार्यालय में आवेदन भेजकर लगान मुक्ति की मांग उठाई तो आला अधिकारियों ने उनके प्रतिनिधियों की फरियाद सुनने के बजाए आवेदन को कचरा बताकर वापस लौटा दिया।  

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर और कई अन्य कार्यकर्ताओं ने इस घटना के बाद मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि किसानों के साथ किया गया बर्ताव बेहद हैरान करने वाला है। वहीं कोशी नव निर्माण मंच का आरोप है कि उपसचिव मनोज कुमार ने किसानों के आवेदन को स्वीकार करने के बजाय किसान प्रतिनिधियों को कहा कि 3800 साल दौड़ेगे तो भी कुछ नहीं होगा,  मंच ने कहा कि यह बेहद निराशाजनक है।  

सीएम कार्यालय के अधिकारियों ने किसानों का आवेदन यह कहकर नहीं लिया था कि जिनके आवेदन हैं, उन्हें व्यक्तिगत तौर पर आकर आवेदन देना होगा। वहीं, किसानों का कहना था कि एक साथ अगर 3800 किसान आवेदन लेकर जाएंगे, तो पुलिस कहेगी कि धारा 144 का उल्लंघन किया गया है, क्योंकि सीएम कार्यालय के आसपास धारा 144 लागू होती है। 

कोसी तटबंध के भीतर रहनेवाले किसानों के अधिकारों को लेकर काम कर रहे संगठन कोसी नवनिर्माण मंच के महेंद्र यादव के मुताबिक सीएम को पहले ही एक आवेदन देकर सूचित किया गया था कि 3800 किसान आवेदन देंगे। आवेदन के साथ उन किसानों की सूची भी सौंपी थी, जिन्होंने आवेदन दिया है। मगर मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियों का कहना था कि व्यक्तिगत तौर पर किसान खुद आकर आवेदन देंगे, तभी उसे स्वीकार किया जाएगा। महेंद्र यादव ने सवाल किया कि सीएम कार्यालय 3800 आवेदन लेने से क्यों हिचक रहा है?

उन्होंने बताया कि कोसी नदी पर तटबंध बनाये जाने के बाद ही खेत बर्बाद हो गये। किसान को जमीन के बदले जमीन मिलने के बजाए उन्हें कोई पुनर्वास तक नहीं मिला। किसानों को तटबन्ध के नाम पर छला गया है। अब सरकार और प्रशासन भी किसानों की समस्या से मुंह चुरा रहा है। 

मेधा पाटकर व डॉ सुनीलम समेत दो दर्जन से ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सीएम नीतीश कुमार से अपील की है कि वे समय निकालकर किसानों के प्रतिनिधियों से मिलें और उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए कोसी की समस्या के निराकरण की दिशा में पहल करें। 

गौरतलब हो कि 60 के दशक में कोसी की दोनों तरफ बांध बनाया गया था। स्थानीय लोग इसके खिलाफ थे। तब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने खुद गांव-गांव घूम कर लोगों को इसके लिए राजी किया था और कहा था कि उनकी एक आंख शेष देश पर रहेगी और दूसरी आंख कोसी के लोगों पर। लोगों ने उनकी बात मान ली और कोसी तटबंध के भीतर अपना घर-बार, जमीन छोड़कर बाहर आ गए।

उस वक्त सरकार ने खेती के लिए जमीन तो नहीं मगर मकान बनाने के लिए तटबंध के बाहर जमीन देने और कुछ मुआवजे का आश्वासन दिया था, लेकिन ज्यादातर किसानों को जमीन नहीं मिल पाई, नतीजतन ये लोग तटबंध के भीतर रहने को विवश हो गए। बताया जाता है कि करीब 380 गांव कोसी तटबंध के भीतर स्थित हैं और आबादी करीब 10 लाख होगी।

तटबंध के भीतर की जमीन पर कोसी के साथ हर साल आने वाले बालू की मोटी परत जमी हुई है, जिस कारण फसल नहीं हो पाती है, लेकिन किसानों से न सिर्फ रेत बने खेतों से बल्कि जहाँ से नदी बहती है उस जमीन का भी लगान वसूला जाता है। किसानों की मांग है कि सरकार उनसे वसूली जाने वाली मालगुजारी खत्म करे। सुपौल जिले के बौराहा गांव में रहनेवाले इंद्रनारायण सिंह की 10 एकड़ जमीन कोसी तटबंध के भीतर है। कोसी के पानी के साथ आने वाला बालू खेत में जमा हो गया है, जिससे खेत की पैदावार नहीं के बराबर रह गई है।

उन्होंने कहा, ‘60 के दशक में जब तटबंध बन रहा था, तो सरकार ने कहा था कि हमें पुनर्वास के लिए जमीन और मुआवजा मिलेगा, लेकिन मुट्ठी भर लोगों का ही पुनर्वास हो सका, हम लोगों को न तो तटबंध के बाहर घर बनाने के लिए जमीन मिली और न मुआवजा। इस वजह से हमें विवश होकर तटबंध के भीतर रहना पड़ रहा है। खेत में बालू जमा हो गया है जिस कारण पैदावार नहीं होती है। तटबंध के भीतर स्कूल, सड़क और अस्पताल जैसी बुनियादी सहूलियतें तक नहीं हैं, लेकिन हमसे खेत की मालगुजारी और सेस लिया जाता है।’

कोसी में हर साल बाढ़ आती है, जिस कारण तटबंध के भीतर बने घर हर साल टूट जाते हैं और यहां रहने वाले लोगों को राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ती है। 50 वर्षीय इंद्रनारायण सिंह ने बताया कि पिछले 40 सालों में उनका घर 14 बार टूट चुका है।

3800 आवेदन-पत्र देनेवाले किसानों में सुपौल के सिमराहा गांव के चंद्रेश्वर मंडल और मरौना प्रखण्ड के खोखनहा निवासी मोहम्मद अब्बास और रामचन्दर,  सिंघेश्वर राय और सदरुल ने कहा कि हम सरकार से मांग करते हैं कि कोसी तटबंध के बीच गुजर-बसर करने वाले किसानों के सभी तरह के लगान और सेस को खत्म कर जमीन का मालिकाना हक भू-धारी किसानों को देने और बालू के कारण बर्बाद हुए खेतों के पुनर्वासन के लिए कानून बनाए। उन्होंने सरकार से ये मांग भी की कि वह किसानों से पूर्व में किए गए वादों को भी पूरा करे।। 

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