Agriculture

पहाड़ों पर बंजर खेतों की रंगत लौटाने को एकजुट हुए किसान

डबरा गांव के कुछ किसान परिवार एक बार फिर एकजुट हुए हैं। किसानों ने आपस में मिलकर फिर से बंजर जमीनों पर अन्न उगाने की ठानी है।

 
By Varsha Singh
Last Updated: Monday 23 September 2019

Photo : सुधीर सुंद्रियाल

हरी-नीली सी दिखाई देती पहाड़ियों के बीच बंजर पड़ी धरती कभी सरसों, धान, गेहूं, मसूर, उड़द, मंडुआ जैसे फसलों से लहलहाती थी। लेकिन आज इसमें लैंटाना, काला बांस जैसी खतरनाक झाड़ियां उग आई हैं। दूर तक ऐसी ही झाड़ियों में लिपटे बंजर खेत दिखाई देते हैं। ये बंजर खेत हिमालयी धरती की निराशा के प्रतीक हैं।

ऐसी ही पहाड़ियों के बीच पौड़ी जिले के यमकेश्वर तहसील के डबरा गांव में ढुंग्याड़ नाम की जगह पर बंजर खेतों के बीच कुछ मेहनतकश दिखाई पड़ते हैं। इन लोगों ने वर्षों से बंजर पड़े खेतों में फिर से अन्न उगाने की ठानी है। खेती के आधुनिक उपकरणों से ये धरती के बंजर हिस्से को उपजाऊ बनाने में जुटे हैं। गोदांबरी देवी पावर टीलर के ज़रिये खेत की जुताई कर रही हैं। वहीं एक नौजवान बुश कटर से झाड़ियां काट रहा है। कुछ अन्य लोग भी बंजर धरती को उपजाऊ बनाने की जुगत में लगे हैं।

बंजर खेत में जुताई कर रही गोदांबरी देवी कहती हैं कि सूअरों और बंदरों के आतंक से बीते एक दशक में खेत बंजर होते चले गए। पहले एक परिवार ने खेती छोड़ी, शहर में नौकरी करने चला गया। फिर दूसरा परिवार। इसी तरह एक-एक कर लोग यहां से पलायन करते जा रहे हैं।

गोदांबरी बताती हैं कि कोई एक दशक पहले तक यहां सरसों, मसूर, जौ, धान, मंडुआ, गेहूं, दाल जैसे सारे अनाज उगाए जाते थे। कभी बाज़ार से खाने का सामान नहीं लाना पड़ता था। उड़द की 60-70 किलो दाल एक परिवार की होती थी। लेकिन जंगली सूअरों का आतंक बढ़ता गया। सूअरों के झुंड खेतों में उगाई फसल नष्ट कर देते और घर के पास उगायी साग-सब्जियां बंदरों के हवाले हो जातीं। इतनी मेहनत के बाद फसल बर्बाद होने से लोग निराश होते चले गए।

खेतों की चक मिलाकर ताड़-बाड़ करते तो शायद सूअरों की समस्या का कुछ हल निकलता। लेकिन गांव के छोटे किसान आर्थिक तौर पर इतने सक्षम नहीं। महिला किसान बताती है कि किसी तरह गांववालों ने मिलकर बांस की बाड़ लगाई। लेकिन अगली ही रात सूअरों के झुंड ने बांस की बाड़ तहस-नहस कर दी। वे रात में 20-25 की संख्या में आते और सुबह रौंदे हुए खेत दिखाई पड़ते।

डबरा गांव के कुछ किसान परिवार एक बार फिर एकजुट हुए हैं। जिसमें महिला किसान गोदांबरी भी शामिल हैं। 100 नाली खेतों की चक बनाकर इंटीग्रेटेड फार्मिंग की तैयारी चल रही है। किसानों ने आपस में मिलकर खेती के आधुनिक उपकरण खरीदे। जिसकी लागत करीब दस लाख रुपए थी। दो लाख रुपये किसानों ने खुद लगाए, बाकी आठ लाख रुपये सरकार से सब्सिडी मिली।

अभी झाड़ियों के काटने, हटाने और खेतों की जुताई का काम चल रहा है। इसके बाद लहसुन, सरसों, मसूर जैसी अन्य फसलों की बुवाई होगी। रोजगार के लिए पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या है। लोग अपने गांव-खेत छोड़कर शहर जा रहे हैं। बंजर धरती पर उग आई झाड़ियां और पलायन कर चुके गांवों में वन्य जीवों की हलचल बढ़ती जा रही है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक डॉ सत्यकुमार कहते हैं कि बंजर खेतों में उगी झाड़ियां जंगली सूअर, भालू, गुलदार जैसे वन्यजीवों के छिपने की आसान जगहें बन रही हैं। वे बताते हैं कि ये बंजर खेत सेकेंडरी फॉरेस्ट में तब्दील हो रहे हैं।

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के सोशल साइंस विभाग के निदेशक प्रोफेसर गिरिजा पांडे कहते हैं कि अतीत पर नज़र डालें तो राज्य के पर्वतीय जिलों में कृषि आमदनी का पूरे तौर पर आमदनी का ज़रिया नहीं बन सका। राज्य में ज्यादातर छोटे किसान हैं जो सिर्फ 3-4 महीने का गुजारा करने भर अन्न उगाते रहे। हालांकि ऐसी घाटियां भी हैं जहां किसान पूरी तरह खेती पर आत्मनिर्भर भी रहे।

प्रोफेसर गिरिजा पांडे कहते हैं कि राज्य में करीब 13 फीसदी ही कृषि भूमि है। इसमें तकरीबन 5-6 प्रतिशत पर्वतीय कृषि क्षेत्र है। इसमें मात्र 13 प्रतिशत सिंचित खेत हैं। बाकि मानसून पर निर्भर करते हैं। मानसून से अलग जो बारिश होती है वो यदि अपने समय पर नहीं आईं, या कम-ज्यादा हुई तो पहाड़ों की खेती के बने रहने पर बड़ी मुश्किल आ जाती है।

वह नैनीताल के पंगोट क्षेत्र का उदाहरण देते हैं जहां मटर की बहुत अच्छी खेती होती थी। वहां से नैनीताल शहर, हल्द्वानी और आसपास के इलाकों तक मटर सप्लाई की जाती थी। इसके साथ पंगोट में दूध उत्पादन और आलू की बहुत अच्छी खेती होती थी। लेकिन पिछले चार-पांच वर्षों में जंगली सूअर और शाही जैसे जानवरों के बढ़ते हमलों ने फसलों को उजाड़ दिया। प्रोफेसर पांडे कहते हैं कि हम कैश क्रॉप पैदा ही नहीं कर सकते। इसलिए ये कारोबार छूट गया।

इसके साथ ही, वाइल्ड लाइफ एक्ट ने वन्य जीवों को तो सुरक्षा दी लेकिन इस कानून से जंगल के करीब रह रहे लोगों के जीवन पर जो असर पड़ा, उसे नज़र अंदाज़ किया गया। प्रोफेसर पांडे कहते हैं कि जंगल के अंदर भोजन की उपलब्धता कम होने की भी दिक्कतें रही होंगी। पहले बफर जोन में जानवरों को खाने-पीने की वनस्पतियां मिल जाती थीं। वो खत्म हुई तो जानवर गांवों की ओर आए और खेतों की ओर वन्यजीवों की आवाजाही बढ़ी। ऐसा पिछले दस-पंद्रह वर्षों में अधिक देखा गया।

वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक डॉ सत्यकुमार भी कहते हैं कि मध्य हिमालयी क्षेत्र में जंगल के अंदर भोजन, अच्छी गुणवत्ता की वनस्पतियां कम हो रही हैं। वहां हिरन, कांकड़ जैसे वन्यजीव भी कम हो रहे हैं। पिछले वर्ष अगस्त महीने में नैनीताल हाईकोर्ट ने राज्य की बदहाल खेती और किसानों के हालात पर चिंता जतायी थी। अदालत ने एक रिपोर्ट के हवाले से कहा कि राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में कृषि योग्य ज़मीन के मात्र 20 फीसदी हिस्से पर ही खेती बची रह गई है। 80 प्रतिशत खेती की जमीन या तो बंजर हो गई है या उसका इस्तेमाल दूसरे कार्यों में किया जा रहा है।

राज्य में कृषि क्षेत्र लगातार सिकुड़ता जा रहा है। वर्ष 2019 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक उत्तराखंड की स्थापना के समय कृषि का क्षेत्रफल 7.70 लाख हेक्टेअर था, वर्ष 2019 तक ये घटकर 6.91 लाख हेक्टेअर रह गया है। राज्य में जोत का औसत आकार 0.89 हेक्टेअर है। केवल 50 फीसदी खेतों में ही सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। पर्वतीय क्षेत्र में मात्र 13 प्रतिशत और मैदानी क्षेत्रों में 94 प्रतिशत सिंचाई की सुविधा है।

कृषि और उससे जुड़े क्षेत्र की बजट में हिस्सेदारी औसतन 3.80 प्रतिशत से 3.63 प्रतिशत के बीच रहती है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान लगातार घट रहा है। वर्ष 2011-12 में फसल क्षेत्र की हिस्सेदारी 7.05 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2018-19 में 4.67 प्रतिशत के आसपास आ गई। कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्र का राज्य घरेलू उत्पाद में योगदान 0.70 प्रतिशत रहा।

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