Environment

त्योहारों में धर्म के नाम पर पर्यावरण को नुकसान

जब से धर्म फैशन का रूप लेने लगा है, इसने पर्यावरण को ज्यादा नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है

 
By Bhagirath Srivas
Last Updated: Friday 04 October 2019

तारिक अजीज / सीएसई

कथनी और करनी के बीच के फर्क को स्पष्ट रूप से अनुभव करना हो तो धर्म को पर्यावरण के चश्मे से देखना चाहिए। कहने को तो हमारे धर्मग्रंथों में नदियों को मां का दर्जा दिया गया है, लेकिन दूसरी तरफ गंगा-यमुना सरीखी नदियों को हम दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में तब्दील भी कर देते हैं। विभिन्न पशुओं और पेड़ों को हम देवतुल्य मानते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें नष्ट करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। हवा और पानी हमारे जीवन का आधार हैं, फिर भी हमने इन्हें ही सबसे ज्यादा जहरीला बना दिया है। सिद्धांतों और धर्म में पर्यावरण को महत्व देना और उसकी चिंता करना अलग-अलग पहलू हैं। धर्मग्रंथों में मानव शरीर को पर्यावरण के अंश अथवा पंचतत्वों से निर्मित माना जाता है, इसीलिए कहा भी गया है-

“क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा,

पंचतत्व से बना शरीरा”

भारत में धर्म और पर्व एक-दूसरे से घनिष्ठता से जुड़े हैं। सभ्यता की शुरुआत से ही त्योहार मानव समाज का हिस्सा रहे हैं। ये लोगों को एक-दूसरे से जुड़ने का मौका देते हैं। लेकिन अब ऐसे कई पर्व पर्यावरण के लिए समस्या बनते जा रहे हैं और इनके औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। उदाहरण के लिए दिवाली को ही लीजिए। दिवाली पर हुई आतिशबाजी के चलते सांस लेने में दिक्कत और आंखों में जलन आम है। दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर उच्चतम न्यायालय के प्रतिबंध के बावजूद बेलगाम आतिशबाजी ने दिल्ली का दम घोंटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए आतिशबाजी का समय रात आठ से 10 बजे तय किया है। न्यायालय ने पटाखों के लिए कुछ मानक भी निर्धारित किए। लेकिन लोगों ने अदालत के आदेश की परवाह नहीं की और जमकर आतिशबाजी की। चूंकि मामला धर्म और आस्था से जुड़ा है, इसलिए अक्सर कानून और न्याय व्यवस्था भी लाचार नजर आते हैं।

यह सच है कि प्रकृति के प्रति मानवीय दृष्टिकोण धर्म से निर्देशित होता है। अमेरिका के इतिहासकार लिन वाइट जूनियर ने 1967 में साइंस पत्रिका में लिखे अपने विवादास्पद निबंध में कहा था कि लोगों का प्रकृति के प्रति व्यवहार इस पर निर्भर करता है कि वे अपने आसपास की चीजों से खुद को कैसे देखते हैं। पर्यावरण के प्रति मनुष्य का आचरण काफी गहराई से धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है। उन्होंने अपने निबंध में लिखा, “ईसाई धर्म वन्यजीव संरक्षण को महत्व नहीं देता, क्योंकि वह प्रकृति पर प्रभुत्व की बात कहता है। ईसाइयत अपने अनुयायियों को कहता है कि भगवान की इच्छा है कि मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रकृति का दोहन करे।” हालांकि बाद में कई इतिहासकारों ने लिन के मत को खारिज कर दिया।

यह भी सच है कि दुनियाभर में दस में से आठ लोग खुद को धार्मिक मानते हैं। कई देशों में भले ही धर्म पहले जितना प्रभावशाली न रहा हो, लेकिन इसका लोगों पर व्यापक प्रभाव है। भारत में तो धर्म के नाम पर सरकारें बन और गिर जाती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान गंगा को अपनी मां तक कहकर बुलाया था और उसे स्वच्छ करने का वादा किया था। लगभग साढ़े पांच साल गुजरने और गंगा सफाई के तमाम कार्यक्रमों के बाद भी गंगा निर्मल नहीं हुई है। भविष्य में भी इसकी उम्मीद नजर नहीं आ रही है। गंगा बचाने की मुहिम में जुटे पर्यावरणविद जीडी अग्रवाल ने गंगा को निर्मल बनाने की मांग को लेकर प्रधानमंत्री को कई पत्र लिखे लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। अंतत: उन्होंने 111 दिन के अनशन के बाद अपना जीवन त्याग दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि पर्यावरण के प्रति अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाकर ही हम मानव अस्तित्व को बचाकर रख सकते हैं। हम खुद को बचा पाए तो धर्म भी बच जाएगा। इसलिए धर्म को पर्यावरण के अनुरूप ढालने की जरूरत है।

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