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खाद्य सुरक्षा की राह में बाधा बनी आस्था

क्या भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाए बिना पूजा स्थलों पर भोजन की गुणवत्ता सुनिश्चित कर सकता है?

By Karnika Bahuguna

On: Thursday 05 December 2019
 
आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में प्रसाद बनाने के दौरान स्वच्छता की अनदेखी को लेकर कई लोग पहले भी शिशिकायत कर चुके हैं  (जय शेखर / तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम)
आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में प्रसाद बनाने के दौरान स्वच्छता की अनदेखी को लेकर कई लोग पहले भी शिशिकायत कर चुके हैं  (जय शेखर / तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम) आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर में प्रसाद बनाने के दौरान स्वच्छता की अनदेखी को लेकर कई लोग पहले भी शिशिकायत कर चुके हैं (जय शेखर / तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम)

आस्था और तर्क का एकसाथ चल पाना मुश्किल ही होता है। जहां तर्क पर बहस की हमेशा गुंजाइश होती है, वहीं आस्था जैसे बेहद संवेदनशील विषय के साथ छेड़छाड़ की गुंजाइश कम ही होती है। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) को जल्द ही यह बात समझ में आने वाली है। खाने की गुणवत्ता पर नियंत्रण रखने वाला देश का यह अग्रणी संस्थान, धार्मिक स्थलों पर खाने की गुणवत्ता की बेहतरी के लिए खाद्य सुरक्षा प्रबंधन कार्यक्रम (फूड सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम या एफएसएमएस) लागू करने की योजना बना रहा है। लेकिन धर्म और आस्था से जुड़े होने के कारण यह एफएसएसएआई के लिए आसान नहीं होगा।

धार्मिक संस्थानों का अड़ियल रवैया

इसी संदर्भ में एफएसएसएआई को जनवरी के आखिरी हफ्ते में एक परेशानी का सामना करना पड़ा, जब आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर की प्रबंधन समीति तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) ने मंदिर की रसोई की एक फूड सेफ्टी ऑफिसर द्वारा जांच कराने से मना कर दिया। अगस्त 2016 में मंदिर में बनने वाले प्रसाद की सफाई और सुरक्षा को लेकर दर्ज एक शिकायत को लेकर एफएसएसएआई ने राज्य के खाद्य सुरक्षा आयोग (फूड सेफ्टी कमीशन) को उचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।

शिकायत दर्ज कराने वाले बैंगलोर के आरटीआई कार्यकर्ता टी नरसिम्हा मूर्ती ने डाउन टू अर्थ को बताया, “मंदिर में प्रसाद का लड्डू बनाने वाले बावर्ची न तो दस्ताने पहनते हैं, न ही एप्रिन। यहां तक कि सिर भी नहीं ढकते हैं।” पूर्व में आई कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में भी तिरुपति मंदिर के लड्डू में नट-बोल्ट और चाबी के छल्ले जैसी तमाम चीजें मिलने की बात कही गई है। टीटीडी ने इस मामले में अड़ियल रुख दिखाते हुए कहा है कि लड्डू एक पवित्र वस्तु है, जिसे खाने की वस्तु नहीं माना जा सकता। टीटीडी ने आगे कहा—मंदिर में प्रसाद पारंपरिक तरीकों से बनाया जाता है और इससे किसी भी तरह की छेड़छाड़ हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाएगी। मंदिर का प्रसाद श्रद्धालुओं को सब्सिडाइस्ड मूल्य पर मिलता है, इसलिए इसे बेचने की वस्तु भी नहीं माना जा सकता।

लेकिन टीटीडी का यह तर्क, फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (एफएसएस) एक्ट-2006 के विरुद्ध जाता है, जिसमें लड्डू को खाने की वस्तु और टीटीडी को फूड बिजनस ऑपरेटर (एफबीओ) माना गया है। एफएसएसएआई ने राज्य के फूड सेफ्टी कमीशन को लिखित में कहा है कि यह एक्ट खाने की सभी वस्तुओं पर लागू होता है, चाहे वो बेची जा रही हों या मुफ्त में बांटी जा रही हों। इसलिए टीटीडी को एक एफबीओ का लाइसेंस लेना और अपनी जिम्मेदारियों को एफएसएस एक्ट-2006 के दिशा-निर्देशों अनुसार निभाना जरूरी है। आंध्र प्रदेश के असिस्टेंट फूड कंट्रोलर विश्वनाथ रेड्डी कहते हैं, “टीटीडी के एग्जीक्यूटिव ऑफिसर ने लाइसेंस के लिए आवेदन करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि टीटीडी, एफएसएसएआई के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।” टीटीडी ने डाउन टू अर्थ द्वारा इस सन्दर्भ में भेजे गए ईमेल का जवाब इस लेख के छपने तक नहीं दिया।

आंध्र प्रदेश फूड सेफ्टी ऑफिसर के तिरुपति मंदिर की रसोई के निरीक्षण के असफल प्रयास को देखते हुए यह साफ है कि एफएसएसएआई के लिए एफएसएमएस को लागू करना बिल्कुल भी आसान नहीं होगा। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 3 लाख से भी ज्यादा धार्मिक स्थल हैं, जिनमें हर दिन लाखों श्रद्धालु आते हैं। अकेले तिरुपति मंदिर में हर दिन लगभग 50,000 श्रद्धालु आते हैं। नियमों के अभाव में इन जगहों पर खाना बनाने और परोसते समय दस्तानों का प्रयोग नहीं किया जाता है। अधिकांश जगहों पर खाना बनाने और परोसने वालों में संक्रामक बीमारियों की जांच नहीं होती है।

कुछ बीमार, कुछ गंवा चुके हैं जान

अप्रैल 2014 में 350 लोग तेलंगाना के नालगोंडा जिले के दमरचेरला स्थित श्री कोडनदर्मा स्वामी मंदिर में प्रसाद के रूप में मिलने वाले पनक्कम (गुड़ से बना एक पेय) पीने के कारण बीमार हो गए थे। 2013 में बैंगलोर के श्री मुत्थु मरिअम्मा मंदिर में पनक्कम और छाछ का सेवन करने से दो लोगों की मौत हो गई और 50 अन्य में फूड पॉइजनिंग (खाद्य विषाक्तता) के लक्षण पाए गए थे।

एसोसिएशन ऑफ फूड साइंटिस्ट्स एंड टेक्नोलॉजिस्ट (इंडिया) के मुंबई प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रबोध हल्दे कहते हैं कि, एफएसएमएस धार्मिक स्थलों पर एफएसएसएआई द्वारा बनाए गए मानकों के अनुसार खाद्य सुरक्षा से जुड़े खतरों से बचाव, सफाई और सुरक्षित वातावरण को तय करता है। हल्दे कहते हैं, “इस व्यवस्था में प्रसाद सामग्री के मानकों को तय किया जाता है और उनके दूषित होने की जांच की जाती है। हमने सुरक्षा के नियम बनाए हैं और प्रसाद बनाने और परोसने वाले लोगों को नियमों का पालन करने के लिए प्रशिक्षित किया है।”

सकारात्मक पहलू

एसोसिएशन ने जनवरी 2016 में मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में एफएसएमएस लागू किया है, जहां हर रोज 50,000 श्रद्धालु आते हैं। एफएसएसएआई ने सम्पूर्ण भारत में लागू करने से पहले यहां पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसे शुरू किया है। एफएसएसएआई के अनुसार, “प्रसाद बनाने का काम करने वाले श्रमिकों में सफाई और खाद्य सुरक्षा को लेकर जागरुकता चार महीनों में ही बढ़ चुकी है।” हालांकि अभी एफएसएमएस को लागू करना जरूरी नहीं है, लेकिन कई धार्मिक स्थल स्वेच्छा से इसे लागू कर रहे हैं। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिरडी साईं बाबा मंदिर इन्ही में से एक है। यहां हर दिन 25,000 से भी ज्यादा लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं।

सितंबर 2016 में एफएसएसएआई ने एफएसएमएस पर एक कार्यशाला (वर्कशॉप) आयोजित की थी। इसमें तमिलनाडु सरकार के धार्मिक स्थलों का प्रबंधन देखने वाले विभाग, हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एनडाउनमेंट्स सहित 14 संस्थाओं ने भाग लिया था। इस विभाग ने एफएसएमएस को तमिलनाडु के 20 मंदिरों में लागू करने में रुचि दिखाई है।

गुरुद्वारों का प्रबंधन देखेने वाली शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) ने भी इस कदम का स्वागत किया है। एसजीपीसी के मुख्य सचिव हरचरण सिंह कहते हैं, “अगर उनके सुझाव सही हैं तो हमें उन्हें मानने में कोई परेशानी नहीं है, वरना यह आस्था का विषय है और कोई भी हमें यह नहीं बता सकता कि प्रसाद को कैसे बनाया जाए।”

एफएसएसएआई के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर पवन अग्रवाल कहते हैं कि उनका इरादा किसी की आस्था पर सवाल उठाना नहीं बल्कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसमें सभी की जीत है। मुझे पूरा विश्वास है कि न तो तिरुपति मंदिर और न ही गुरद्वारे ऐसा चाहते हैं कि लोग बीमार पड़ें।” एफएसएसएआई ने राज्यों के फूड सेफ्टी कमीशन को पांच ऐसे धार्मिक स्थलों की पहचान करने को कहा है जहां एफएसएमएस को लागू किया जा सके। यह कदम शहरों के उन गरीब लोगों के लिए भी सहायक साबित होगा जिन्हें खाने में संपूर्ण पोषण नहीं मिल पाता है और जो खाने के लिए प्रसाद पर निर्भर करते हैं।

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन 60,000 - 70,000 श्रद्धालुओं को निशुल्क खाना खिलाया जाता है (फोटो: कर्णिका बहुगुणा)

प्रसाद की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कदम
 
  • प्रसाद को टिकाऊ और सेहत की दृष्टि से सुरक्षित बनाने के लिए निर्माण सामग्री और प्रक्रिया का मानकीकरण।
  • लाइसेंस के लिए आवेदन करने वाले विक्रेताओं को खाद्य सुरक्षा और स्वच्छता के क्षेत्र में प्रशिक्षण के लिए राजी करना।
  • प्रसाद में प्रयुक्त सामग्री सेहत की दृष्टि से सुरक्षित हैं, यह सुनिश्चित करने को स्वपरीक्षण के लिए प्रोत्साहित करना।
  • खाद्य संचालकों को निर्माण में अच्छा आचरण अपनाने के लिए प्रशिक्षित करना; व्यक्तिगत स्वच्छता और सुरक्षात्मक कपड़े, जैसे एप्रन, दस्ताने आदि के उपयोग के बारे में शिक्षित करना।
  • पहले खराब होने वाली खाद्य सामग्री का पहले उपयोग करना सुनिश्चित करने की चक्रिय प्रणाली लागू करना; स्टॉक का आसानी से पता लगाने के लिए प्रलेखन और रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया को मजबूत बनाना।
  • फूल, फल और सब्जियां आदि के कचरे के प्रबंधन का आदेश इस तरह से जारी करना, जिससे कि यह खाद्य सुरक्षा को प्रभावित न करे।