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भारत में भूख का स्तर गंभीर

12 अक्टूबर को जारी वैश्विक भूख सूचकांक बताता है कि देश में भूख और कुपोषण की समस्याएं व्यापक स्तर पर फैली हुई हैं। 

By Kundan Pandey

On: Friday 06 December 2019
 
भारत की निचली रैंक का मतलब है कि 21 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों का वजन और हर तीसरे बच्चे की लंबाई उम्र के हिसाब से कम है। (Credit: Vikas Choudhary/CSE)
भारत की निचली रैंक का मतलब है कि 21 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों का वजन और हर तीसरे बच्चे की लंबाई उम्र के हिसाब से कम है। (Credit: Vikas Choudhary/CSE) भारत की निचली रैंक का मतलब है कि 21 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों का वजन और हर तीसरे बच्चे की लंबाई उम्र के हिसाब से कम है। (Credit: Vikas Choudhary/CSE)

वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) की 119 देशों की सूची में भारत 100 स्थान पर है। 12 अक्टूबर को जारी की गई यह सूची बताती है कि देश में भूख और कुपोषण की समस्याएं व्यापक स्तर पर फैली हुई हैं। इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईएफपीआरआई) की इस सूची में भारत को 31.4 अंक मिले हैं जो उत्तरी कोरिया और ईराक से भी कम हैं। एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन काफी निम्न दर्जे का है। भारत सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मुकाबले ही बेहतर स्थिति में है।

सूचकांक में शामिल 119 में से 52 देशों में भूख का स्तर गंभीर, खतरनाक और बेहद खतरनाक पाया गया है। एशियाई देशों में चीन, फिजी, मलेशिया, थाइलैंड और मंगोलिया में भूख का सबसे कम स्तर पाया गया है। 

भारत की निचली रैंक का मतलब है कि 21 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों का वजन और हर तीसरे बच्चे की लंबाई उम्र के हिसाब से कम है। वैश्विक भूख सूचकांक में चार प्रमुख बिंदुओं पर गौर किया जाता है-कुपोषण, बाल मृत्युदर, उम्र के अनुपात में कम वजन और कम लंबाई।  

सूचकांक में शामिल आधे विकासशील देशों में स्थिति काफी गंभीर है। भारत भी इसमें शामिल है और इस श्रेणी में शामिल देशों में सबसे नीचे है। भारत में 2005-06 में उम्र के अनुपात में कम वजन (वेस्टिंग) की दर 20 प्रतिशत थी जो 2015-16 में बढ़कर 21 प्रतिशत हो गई है। सिर्फ तीन देशों जिबोटी, श्रीलंका और दक्षिणी सूडान में यह दर 20 प्रतिशत से अधिक है। पिछले 25 सालों में भारत में इस दर में सुधार नगण्य ही हुआ है।

आईएफपीआरआई के दक्षिण एशिया निदेशक पीके जोशी का कहना है कि भारत में राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रमों के बावजूद सूखे और सांगठनिक कमियों के कारण बड़ी संख्या में गरीब 2017 में कुपोषण का शिकार हैं।