खास खबर: फसल की बर्बादी ने बढ़ाई खाने की थाली की कीमत

दुनियाभर में खाद्य मुद्रास्फीति अप्रत्याशित ऊंचाई पर पहुंच गई है। चरम मौसम की घटनाओं से फसलों को पहुंचा नुकसान इसके मूल में है। इस दुष्चक्र को तभी तोड़ा जा सकता है जब किसानों के पास मौसम के पूर्वानुमान का मजबूत तंत्र और फसलों का प्रभावी बीमा हो

By Richard Mahapatra, Shagun Kapil

On: Thursday 10 March 2022
 
कर्नाटक के मांड्या जिले के मालावल्ली तालुका में रहने वाले वेंकटेश और धर्मप्पा को बीमा कंपनियों और स्थानीय कृषि विभाग से मदद नहीं मिलती (फोटो सौजन्य: मांड्या ऐग्रिकल्चर डिपार्टमेंट)
कर्नाटक के मांड्या जिले के मालावल्ली तालुका में रहने वाले वेंकटेश और धर्मप्पा को बीमा कंपनियों और स्थानीय कृषि विभाग से मदद नहीं मिलती (फोटो सौजन्य: मांड्या ऐग्रिकल्चर डिपार्टमेंट) कर्नाटक के मांड्या जिले के मालावल्ली तालुका में रहने वाले वेंकटेश और धर्मप्पा को बीमा कंपनियों और स्थानीय कृषि विभाग से मदद नहीं मिलती (फोटो सौजन्य: मांड्या ऐग्रिकल्चर डिपार्टमेंट)

भारत की थोक मुद्रास्फीति दर नवंबर 2021 में 14.23 प्रतिशत के साथ तीन दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। 14 जनवरी 2022 को जारी आंकड़ों के अनुसार, अगले महीने यानी दिसंबर 2021 में 1.95 की प्रतिशत के मामूली गिरावट के साथ यह दर 13.56 प्रतिशत रही।

थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) हमेशा चिंता का विषय रहता है, क्योंकि इससे खुदरा (रिटेल) मुद्रास्फीति में वृद्धि हो जाती है। महंगाई का लगातार बढ़ना वास्तव में चिंताजनक है। दिसंबर 2021 लगातार नौंवा महीना था जब डब्ल्यूपीआई में वृद्धि दहाई के आंकड़ों में हुई। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति वित्त वर्ष के आखिर यानी मार्च तक रह सकती है।

दिसंबर में मुद्रास्फीति का बढ़ना अप्रत्यााशित था, क्योंकि सरकार ने मुद्रास्फीति के बड़े कारक ईंधन पर टैक्स घटा दिया था। तो अब सवाल उठता है कि इसके बाद भी मुद्रास्फीति क्यों अधिक थी? इसके पीछे यह कारण उभरकर आया है कि खाद्य महंगाई, खासकर सब्जियों और अनाज की कीमत में वृद्धि इस मुद्रास्फीति की जड़ में है।

भारत में थोक मुद्रास्फीति नवंबर 2021 में प्राथमिक खाद्य पदार्थों की महंगाई के कारण 13 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। बहुत से राज्यों में मौसमी सब्जियों के भाव आसमान पर पहुंच गए। फसलों को पहुंचे इस नुकसान के मूल में चरम मौसम की घटनाएं रहीं और यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं थी।

दुनियाभर में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ रही है। 17 जनवरी को खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा जारी खाद्य मूल्य सूचकांक बताता है कि खाद्य महंगाई दशक के सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। यह पिछले वर्ष के मुकाबले औसतन 28 प्रतिशत अधिक हो गई है।

एफएओ के अनुसार, अगर खाद्य मुद्रास्फीति को समायोजित कर दिया जाए तो 2011 के 11 महीने में मुद्रास्फीति पिछले 46 वर्षों में सबसे अधिक थी। मौजूदा हालात की तुलना 2011 की खाद्य महंगाई से की जाती है, जब एशिया खासकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका में अरब स्प्रिंग नामक सरकार विरोधी प्रदर्शनों के चलते तख्तापलट हुए थे।

एफएओ के वरिष्ठ अर्थशास्त्री एब्दोल्रेजा एब्बासियन मौजूदा खाद्य महंगाई को मुख्य रूप से जलवायु परिस्थितियों से जोड़ते हैं। वह कहते हैं, “कीमतों में सामान्य वृद्धि उत्पादन बढ़ाने, लागत में वृद्धि का रास्ता साफ करती है और अप्रत्याशित जलवायु परिस्थितियां 2022 में भी स्थायी बाजार के लिए बहुत कम उम्मीद छोड़ती हैं।”

1956 से 2010 के बीच दोहरी संख्या में मुद्रास्फीति की नौ श्रृंखलाएं रही हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अनुसार, इनमें से सात श्रृंखलाएं सूखे के कारण पैदा हुईं। पिछले छह दशकों में दुनियाभर में 1970 के दशक, 2007-08 और 2010-14 में खाद्य महंगाई की तीन प्रमुख श्रृंखलाएं रहीं।

ये तीनों श्रृंखलाएं मुख्यत: जलवायु के झटकों की देन थीं। इसके बाद अन्य कारक जैसे तेल की कीमतों में वृद्धि, व्यापार नीति में दखल और बायो ईंधन का उपभोग जिम्मेदार थे। मौजूदा श्रृंखला पूर्ण रूप से असामान्य मौसम की देन प्रतीत हो रही है।



ऐसी परिस्थितियां वर्ष 2019-20 में भी बनी थीं। खाद्य पदार्थों की महंगाई, खासकर सब्जियों के ऊंचे दाम के चलते जनवरी 2020 में खुदरा मुद्रास्फीति 68 महीने के उच्चतम स्तर यानी 7.59 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। तब खाद्य पदार्थों की महंगाई सुर्खियां बनी थी लेकिन इसके पीछे के कारणों का विश्लेषण नहीं किया गया।

चरम मौसम की घटनाओं ने फसलों को नुकसान पहुंचाया था जिससे सब्जियों की आपूर्ति श्रृंखला नष्ट हो गई थी। इससे सब्जियां बाजार में नहीं पहुंच पाई। वर्षवार तुलना में हम पाएंगे कि जनवरी 2019 के मुकाबले सब्जियों के दाम 50.19 प्रतिशत बढ़ गए हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों और बाजार में यह वृद्धि 45.56 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 59 31 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। छह श्रेणियों में बांटे गए उपयोग उत्पादों में सबसे अधिक वृद्धि खाद्य और पेय पदार्थों में हुई है जिससे समग्र मुद्रास्फीति में इजाफा हो गया। 2014 में जब मुद्रास्फीति एक भावनात्मक मुद्दा था, तब आरबीआई ने कहा, “खाद्य महंगाई का परंपरागत कारण सूखा या बाढ़ से आपूर्ति में बाधा रही है।”

विश्व की मौजूदा खाद्य महंगाई मुख्य रूप से गेहूं के कारण है। इसकी कीमत सूखे और गेहूं उत्पादक देशों में अत्यधिक गर्मी के चलते बढ़ी है। 2021 में बहुत सी रिपोर्ट बताती हैं कि अमेरिका में स्प्रिंग गेहूं का उत्पादन 40 प्रतिशत तक कम हुआ है।

दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं निर्यातक रूस में इसकी पैदावार कम हुई है और उसने घरेलू उपयोग सुनिश्चित करने के लिए इसके निर्यात पर टैक्स लगा दिया है। ब्राजील के कॉफी बीन उत्पादन क्षेत्र में जुलाई 2021 में अप्रत्याशित फॉस्ट (पाला) के कारण उत्पादन में 10 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। अंतरराष्ट्रीय कॉफी संगठन के अनुमान के मुताबिक, जलवायु के उतार चढ़ाव के चलते दुनिया के प्रमुख कॉफी उत्पादक अगले दो वर्षों में कीमतों में उछाल का सामना करेंगे।

ब्रिटेन स्थित वार्विक विश्वविद्यालय में ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी डेवलपमेंट के सीनियर टीचिंग फेलो एलिस्टर स्मिथ ने सितंबर 2021 में द कन्वरसेशन में लिखा, “वर्ष 2000 से अनिश्चित और प्रतिकूल मौसम की घटनाओं को एफएओ ने बहुत बार रिपोर्ट किया है। इन घटनाओं ने उत्पादन की उम्मीदों और मौसमी उत्पादन को झटका दिया है।”

उन्होंने एफएओ के मुद्रास्फीति समायोजित खाद्य मूल्य सूचकांक का अध्ययन किया और पाया कि वैश्विक खाद्य मूल्य 2011 से अधिक है। यह वह दौर था जब महंगे भोजन के लिए हुए दंगों के चलते लीबिया व मिस्र में तख्तापलट हुआ था।

गैर-लाभकारी संस्था ऑक्सफैम ने खाद्य कीमतों पर प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के प्रभाव का आकलन किया है। 2012 में इसके अनुमानों से पता चलता है कि 2010 की तुलना में 2030 तक गेहूं के लिए औसत विश्व बाजार निर्यात मूल्य में 120 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

प्रसंस्कृत चावल के निर्यात मूल्य में यह वृद्धि 107 प्रतिशत और मक्का में 177 प्रतिशत होगी। तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन बारिश और उसके वितरण को बदलकर कृषि चक्र को बदल रहा है।

सीधा संबंध

चरम मौसम की घटनाओं व घटती कृषि उपज के बीच सीधा संबंध है और खाद्य महंगाई की तस्वीर भी पहले से अधिक साफ हो चुकी है

गोभी के 40,000 पौधे और 15,000 फूलगोभी पूरी तरह नष्ट हो गई है। यह दर्द झारखंड के रांची जिले के मंदार गांव के किसान रमेश कुमार सिंह का है। 12 जनवरी 2022 को मंदार सहित कम से 9 जिलों के गांवों में भयंकर ओलावृष्टि हुई। इस समय फसल कटाई के लिए तैयार थी। सिंह कहते हैं, “इस नुकसान से मेरी संभावित कमाई की उम्मीदें खत्म हो गईं और निवेश भी।”

पिछले साल का सितंबर महीना 27 वर्षों में भारत का सबसे नम महीना था। क्षेत्र के किसान अक्टूबर में बुवाई कर पाए लेकिन नवंबर-दिसंबर में हुई बेमौसम बरसात ने उनकी फसलों का चौपट कर दिया। सब्जी उगाने वाले रमेश जैसे किसानों ने इतना कुछ झेलने के बाद बड़ी उ़म्मीदों के साथ मौसम की आखिरी बुवाई की लेकिन जनवरी की ओलावृष्टि ने इस उम्मीद पर भी पानी फेर दिया।

मध्य प्रदेश निवाड़ी जिले में भी रबी की खड़ी फसलें 9 जनवरी को हुई ओलावृष्टि से जमीन पर बिछ गई। सुबह 8 बजे शुरू हुई ओलावृष्टि आधा घंटे तक जारी रही और करीब दर्जनभर गांवों में गेहूं, मटर, सरसों, ज्वार व अन्य फसलों को नुकसान पहुंचाती रही।

कलोथरा गांव के किसान संजीव प्रजापति बताते हैं, “ओलों का वजन 10-50 ग्राम था और शाम तक नहीं गले। मैंने अपनी जिंदगी में कभी ऐसी ओलावृष्टि नहीं देखी।” 25 दिसंबर के बाद से राज्य के 52 में से नौ जिलों में बारिश हुई है।

हाल के वर्षों में देश में चरम मौसम की घटनाओं ने किसानों को तबाह कर दिया है। यह 2021 में अति गंभीर थी। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 20 नवंबर को लोकसभा में बताया, भारत ने 25 नवंबर 2021 तक चक्रवाती तूफान, अचानक बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने से 5.04 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र खो दिया है।

डाउन टू अर्थ के विश्लेषण से पता चलता है कि दिसंबर 2021 से 15 जनवरी 2022 तक 12 राज्यों के 80 जिलों में करीब 45 ओलावृष्टि की घटनाएं हुईं। इससे पहले इन राज्यों में भारी बारिश हुई थी, जब खरीफ की खड़ीं फसलों की कटाई की जा रही थी और किसान उन्हें बेचने के लिए तैयार थे। साथ ही, खेत सब्जियों जैसी नकदी फसलों के लिए भी तैयार थे।

भारत के सबसे गरीब जिलों में से एक ओडिशा के नुआपाड़ा में इस साल जनवरी में सामान्य से पांच गुना अधिक बारिश हुई। इसने किसानों के साल भर के निवेश को खत्म कर दिया क्योंकि रबी की हजारों हेक्टेयर फसल जैसे हरा चना, आलू, मसूर, बंगाल चना, लीमा बीन्स और प्याज में पानी भर गया है।

बेंद्राबहल गांव के एक छोटे आदिवासी किसान केदार सबर ने अपने 1.2 हेक्टेयर में गोल चना बोया था। इसे धान की कटाई से कुछ दिन पहले तराई में बोया जाता है। सबर कहते हैं, “जब धान की कटाई के दौरान चने के पौधे पैरों के नीचे कुचले जाते हैं, तो वे तेजी से बढ़ते हैं और मिट्टी के सूखने पर फूलने लगते हैं।” अब बेमौसम बरसात से फूल झड़ रहे हैं।

बारिश ने उन किसानों का इंतजार भी बढ़ा दिया है जो अपनी फसल बेचने को तत्पर थे। नुआपाड़ा के बुदिकोमना गांव में रहने वाले आशीष पाढ़ी के पास 5 हेक्टेयर के उपजाऊ खेत हैं। वह बताते हैं, “मैं 18 दिसंबर को छह टन धान मंडी ले गया।

मंडी में मिलर के न पहुंचने पर मेरे धान की खरीद नहीं हो सकी और धान खुले में पड़ा रहा। 11-12 जनवरी को हुई बारिश से धान गीला हो गया। इसके बाद बिचौलियों ने मुझसे 1,200 रुपए प्रति क्विंटल के भार से धान बेचने को कहा। यह भाव सरकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य से 760 रुपए कम था।”

ब्रेंदाभाई गांव के एक अन्य किसान संजय तिवारी ने बताया कि पूरे नुआपाड़ा के 1,000 किसानों का 5,000 टन धान खुले में पड़ा रहा। जैसे ही ओलावृष्टि और असामान्य रूप से अत्यधिक वर्षा की खबरें फैलीं, देशभर के उपभोक्ताओं ने तकलीफ महसूस की।

उनकी चिंता सब्जियों की ऊंची कीमतों को लेकर थी। रांची में फूलगोभी और टमाटर जैसी मौसमी सब्जियों की कीमतें 30 रुपए प्रति किलो से ऊपर पहुंच गईं। सामान्य वर्ष में इन सब्जियों की कीमत 5-10 रुपए प्रति किलो रहती है। डाउन टू अर्थ ने सर्वेक्षण के दौरान पाया कि 25 बाजारों में सब्जियों, गेहूं और धान की कीमत असामान्य रूप से अधिक थी।


 

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