डिब्बा बंद खाने पर लिखा हो साफ-साफ, क्या और कितना खराब है: सीएसई

ये बेहद जरूरी है कि ऐसे प्रोडक्ट्स पर पैक के पीछे लगे हुए न्यूट्रिशनल इनफार्मेशन लेबल के अलावा फ्रंट ऑफ पैक लेबलिंग की जाए।

By DTE Staff

On: Monday 08 March 2021
 
Photo: Flickr

इस वर्ष विश्व मोटापा दिवस (4 मार्च) के उपलक्ष्य में आयोजित हुए एक ग्लोबल सेमिनार में विशेषज्ञों  ने मोटापे से जुड़े एक बेहद गंभीर विषय पर चर्चा की। यह विषय है, खाद्य पदार्थों के लेबल पर सही और पढ़ने योग्य चेतावनी का लिखा होना अनिवार्य करना। 'फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग ऑन पैकेज्ड फूड्स' विषय पर आयोजित इस वेबिनार में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा कि जब भारत गैर-संक्रामक रोगों से बुरी तरह ग्रसित होता जा रहा है, ऐसे समय में सरकार की तरफ से ढिलाई भारी पड़ेगी। 

सुनीता नारायण ने कहा कि आज से सात साल पहले 2013 में  भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की ओर से गठित की गई एक एक्सपर्ट कमिटी ने सबसे पहले कुछ सुझाव पेश किये थे, जिनका उद्देश्य था जंक फूड का नियमन करना और पैकेट पर सामने की तरफ सरल और प्रभावी लेबल लगाकर उपभोक्ताओं को उनकी सामग्री के बारे में सूचित करना। इसमें सीएसई की भी भूमिका थी। तब से लेकर यह सुझाव कमेटियों के फेर में उलझकर रह गया है और इसमें देरी और ढिलाई ही हो रही है, जबकि भारत गैर-संक्रामक रोगों के टाइम-बम पर बैठा है, जो कभी भी फट सकता है। 

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सीएसई के शोधकर्ताओं का कहना है कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद् के 2017 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में होने वाली कुल मौतों में गैर-संक्रामक रोगों की हिस्सेदारी 1990 में 38 फीसदी से बढ़कर 1990 में 62 फीसदी हो गई। पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक, देश की पुरुष आबादी में से तकरीबन 17 फीसदी और महिला आबादी में से 14 फीसदी से अधिक मधुमेह के शिकार हैं। चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे आंकड़ों में यह हिस्सेदारी क्रमशः 8 फीसदी और 6 फीसदी थी।

वहीं, 2020 में आई भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद् और राष्ट्रीय रोग सूचना विज्ञान और अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट बताती है की 28 फीसदी से ज्यादा भारतीय उच्च-रक्तचाप से ग्रसित हैं। शहरी आबादी में 42 फीसदी से अधिक और ग्रामीण आबादी में 18 फीसदी लोग अधिक वजन के हैं। पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे में इस बात की तरफ भी ध्यान दिया गया है कि, सर्वे किये गए 22 में से 16 राज्यों की महिलाओं में मोटापे के बढ़ते मामले देखे गए। पुरुषों के सन्दर्भ में राज्यों की संख्या 19 रही। इतना ही नहीं, 22 में से 20 राज्यों में बड़ी संख्या में बच्चे तेज़ी से मोटापे का शिकार बनते जा रहे हैं।

बढ़ रही प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत 

सीएसई की फूड सेफ्टी एंड टॉक्सिन्स यूनिट के प्रोग्राम डायरेक्टर अमित खुराना ने कहा, "हम देश में खान-पान की आदतों में बड़ा बदलाव देख रहे हैं। प्रोसेस्ड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत ऊपर जा रही है। अल्ट्रा प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ भोजन नहीं बल्कि फैक्ट्री का उत्पाद लगते हैं। उनमे नमक, चीनी, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट्स, रसायन और रिक्त कैलोरीज अत्यधिक मात्रा में होती हैं। उन्हें जबरदस्त बढ़ावा दिया जाता है और वे आसानी से सभी जगह उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे में ये बेहद जरूरी है कि ऐसे प्रोडक्ट्स पर पैक के पीछे लगे हुए न्यूट्रिशनल इनफार्मेशन लेबल के अलावा फ्रंट ऑफ पैक (FoP) लेबलिंग की जाए।

उन्होंने बताया कि FoP लेबल कंस्यूमर फ्रेंडली होते हैं। उन्हें पैक के सामने आसानी से देखा जा सकता है, आसानी से समझा जा सकता है और ये लोगों में खान-पान की अच्छी आदतें डालने में मददगार हो सकते हैं। सुनीता नारायण ने कहा कि उपभोक्ताओं को पता होना चाहिए कि कौन सा खाद्य पदार्थ खराब है और कितना खराब है। FoP लेबल का प्रमुख उद्देश्य उपभोक्ताओं को इसी जानकारी देने का है। 

पैकिंग पर आसान शब्दों में लिखी हो अंदर की सामग्री 

सीएसई शोधकर्ताओं का कहना है कि भारत में FoP लेबल पर लिखा जाना चाहिए कि खाद्य पदार्थ 'टोटल फैट', 'टोटल शुगर' और 'सॉल्ट' है, बजाय 'सैचुरेटेड फैट', 'एडेड शुगर' या 'सोडियम' लिखने के। खुराना ने कहा, "2018 के अपने ड्राफ्ट में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने ये प्रस्ताव रखे थे, जिसे बाद में फूड इंडस्ट्री के दवाब में दरकिनार कर दिया गया। FoP लेबल उपभोक्ताओं को जानकारी देने के लिए होना चाहिए जबकि, पैक के पीछे वाला लेबल वैज्ञानिक समझ के लिए। दोनों एक दूसरे के पूरक होने चाहिए। FoP पर सोडियम लिख देने से उपभोक्ता की मदद नहीं होगी।" 

विदेश में कारगर रही FoP वार्निंग 

वेबिनार में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ नार्थ कैरोलिना के गिल्लिंग्स स्कूल ऑफ़ ग्लोबल पब्लिक हेल्थ के पोषण विभाग के प्रोफेसर बैरी पॉप्किन ने बताया कि कई अध्ध्यनों में देखा गया है कि FoP लेबल कारगर है। लेकिन सिर्फ अनिवार्य वार्निंग लेबल ही दुनिया में असली बदलाव लेकर आए हैं। कनाडा में वार्निंग लेबल को अनिवार्य बनाने के अभियान में शामिल रहने वाली मैरी लाब्बे ने बताया कि, कनाडा में खाद्य पदार्थों पर इन लेबल के होने से लोग आठ सेकंड से भी कम समय में तय कर लेते हैं कि उन्हें क्या खरीदना है। 

कंपनियों से कराया जाए कड़ाई से पालन 

सुनीता नारायण ने सरकार से अनुरोध किया कि FoP नियमन को लागू किया जाए। उन्होंने कहा, वैश्विक समझ में इजाफा हुआ है, चार साल पहले हमें लगा था कि पैकेजिंग पर लाल, हरे रंग की बिंदु सबसे प्रभावी FoP प्रणाली है, लेकिन अब हम देख रहे हैं कि चेतावनी के लेबल वाकई काम करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि, कंपनियों को यह छूट नहीं होनी चाहिए कि वे अपनी मर्जी के मुताबिक इस प्रणाली को अपनाएं या नहीं, इसे अनिवार्य करना चाहिए और सभी उत्पादों पर लगातार लगाया जाना चाहिए। भारतीय संदर्भ में डब्लूएचओ-सीएरो के मानकों की उपयुक्तता को लेकर कोई सवाल ही नहीं है। अगर कोई बदलाव होता भी है, तो उनमे छूट देने की बजाय उन्हें और कड़ाई से लागू किया करना चाहिए।

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