खानपान और दुरुस्त रहने के लिए युवाओं को महात्मा गांधी की सीख

 खानपान को लेकर गांधी के नजरिये का सार था- सादगी। उनके लिए खाने का मतलब ऐसी चीज से था जिससे शरीर को ऊर्जा मिले और जो दवाई की तरह कम मा़त्रा में लिया जाए

By Rajat Ghai

On: Saturday 02 October 2021
 

पिछली सदी के आखिरी दो दशकों में जन्मे युवा, जो आज 40 के करीब हैं, अपना काफी समय और एनर्जी वजन घटाने में खर्च करते हैं। वे जिम जाते हैं, डांस करते हैं और कठोर व्यायाम करते हैं। इसके साथ ही वे एवोकैडो और किन्वा जैसी विदेशी सलादों का इस्तेमाल भी करते हैं। हालांकि पिछली सदी के शुरुआती सालों में एक आदमी ऐसा भी था, जिसने हमारी खाने की मौजूदा सनक और इसकी निरर्थकता का पूर्वानुमान लगा लिया था। वह महात्मा गांधी थे, जिनका हम आज 152वां जन्मदिन मना रहे हैं।

महज दो साल पहले राष्ट्रीय पोषण संस्थान और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने गांधी के पोषण और खुराक संबंधी दर्शन पर एक पेपर लिखा था। उसी साल, 2019 में गांधी के जन्म को डेढ़ सौ साल पूरे हुए थे।

सुब्बाराव एम गवरावरापू और आर हेमलता द्वारा लिखे ‘थॉट फॉर फूड: महात्माज व्यूज ऑन न्यूट्रिशन, कंट्रोल्ड एंड बैलेंस्ड डाइट’ नाम के इस पेपर को इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने प्रकाशित किया था। पेपर लिखने का मकसद गांधी के खाने, पोषण, खाने को लेकर उनके प्रयोगों और उनकी प्रासंगिकता का समग्र मूल्यांकन करना था। उस पेपर के कुछ मुख्य बिंदु  यहां दिए जा रहे हैं -

व्यक्ति की खुराक

लेखक ने लिखा है कि गांधी का मानना था कि व्यक्ति को कम से कम खुराक लेनी चाहिए। उनका मानना था, ‘खाना हमारा शरीर को एनर्जी देता है और वह शरीर को स्वस्थ और  दुरुस्त रखने के लिए दवाई का काम भी करता है। इसलिए एक व्यक्ति को उतना ही खाना चाहिए जितनी उसको जरूरत है, उसे केवल स्वाद के लिए ज्यादा खाने से परहेज करना चाहिए।’  

उनकी मान्यता इस बयान में स्पष्ट होती है: ‘हमारा शरीर किसी कूड़ेदान की तरह नहीं है, जिसमें स्वाद-कलिकाओं को तुष्ट करने के लिए कुछ भी भर लिया जाए।’

उन्होंने यह भी कहा था - ‘खाना धीरे -धीरे खाना शुरू करना चाहिए और बाद में गति बढ़ानी चाहिए। ज्यादा खाने की बजाय कम खाना चाहिए।’

एक धार्मिक व्यक्ति होने के चलते गांधी ने ‘शरीर को भगवान का मंदिर’ माना था। ऐसा उन्होंने 8 अगस्त, 1929 के ‘यंग इंडिया’ में लिखा था। उन्होंने लिखा था कि शरीर को भगवान का मंदिर मानने की बजाय हम उसे अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम समझने लगते हैं और फिर उसके बाद बीमार होकर डॉक्टर के पास जाने पर भी हम लज्जित नहीं होते।

महात्मा गांधी गेहूं और चावल जैसे अनाजों की पॉलिश करने या उन्हें रिफाइन करने के खिलाफ थे। उनका मानना था - ‘अनाज को अच्छी तरह से साफ किया जाना चाहिए, उसके बाद पीसने वाले पत्थर पर उसे पीसना चाहिए, और उससे निकलने वाले आटे का इस्तेमाल करना चाहिए। आटे को छानने से बचना चाहिए। छानने से उसमें से भूसी या उपरी सतह निकल जाने की संभावना रहती है जो कि लवण और विटामिन का समृद्ध स्रोत है, ये दोनों ही पोषण के दृष्टिकोण से सबसे मूल्यवान हैं। अनाज की उपरी सतह, शरीर को फाइबर की आपूर्ति करती है, जो आंतों की क्रिया में मदद करता है।’

आज पोषण से जुड़े कई अध्ययन इसकी पुष्टि करते हैं कि अनाजों की पॉलिशिंग या रिफाइनिंग करने से उनसे फाइबर निकल जाता है, जिससे उनमें पोषक-तत्व कम हो जाते हैं।

गांधी शक्कर, विशेषकर रिफाइंड शक्कर को लेकर सजग रहते थे। उनका मानना था कि इसकी आदत पड़ जाती है और फिर इससे शरीर पर बुरा असर पड़ता है।

हालांकि गुड़ को वह इसका अपवाद मानते थे। उनका कहना था: खाने की शुद्धता के लिहाज से गुड़, रिफाइंड शक्कर से कहीं बेहतर है। अगर गांववाले इसका इस्तेमाल बंद कर देते हैं, जैसा करना उन्होंने शुरू कर दिया है, तो वे अपने बच्चों को एक महत्वपूर्ण चीज से दूर कर देंगे। आज की पीढ़ी गुड़ के बिना काम चला सकती है, लेकिन आने वाली पीढ़ियों की शक्ति के लिए यह जरूरी होगा। गुड़, बाजार की मिठाईयों और रिफाइंड शक्कर से कहीं बेहतर है। अगर गांवों के लोग गुड़ का इस्तेमाल जारी रखते हैं तो वे करोड़ों रुपये भी बचा सकते हैं।’

गांधीजी, घी के भी पक्षधर थे। आज तमाम भारतीय आहर-विशेषज्ञ यह सलाह देते हैं कि सीमित मा़त्रा में लेने से घी शरीर को नुकसान पहुंचाने की बजाय उसे फायदा पहुंचाता है। अगर हम घी का प्रयोग करते हैं तो तेल हमोर लिए गैर-जरूरी हो जाता है। तेल, पचाने में मुश्किल होता है और इसमें घी की तुलना में पोषण भी नहीं होता। अगर एक व्यक्ति दिन में डेढ़ चम्मच घी लेता है तो यह उसके शरीर के लिए काफी है। जो लोग घी नहीं खरीद पाते, उन्हें अपने शरीर में इसकी भरपाई के लिए तेल का काफी सेवन करना पड़ता है।

दूसरी ओर गांधीजी हाइड्रोजनीकृत वनस्पति तेल के सख्त खिलाफ थे, जैसा कि उन्होंने हरिजन अखबार में लिखा था:  वनस्पति तेल पूरी तरह से अनावश्यक है। वनस्पति तेल को रिफाइंड करने में उसमें हानिकारक तत्व मिलाए जा सकते हैं, जो शरीर के लिए घी की तरह फायदेमंद नहीं होते। नकली सिक्कों पर हम भारी दंड देते हैं, तो फिर नकली घी पर क्यों नहीं ?

उन्होंने महसूस किया था कि निष्क्रिय रहने वाले लोगों के लिए दालें ठीक नहीं रहतीं। अपनी किताब आरोग्य की कुंजी में उन्होंने लिखा: मैं बिना हिचक के कह सकता हूं कि वे लोग जो शरीरिक श्रम कम करते हैं, जैसे - क्लर्क, व्यापारी, वकील, शिक्षक और जो इतने गरीब नहीं हैं कि दूध न खरीद सकें, उन्हें दालों की जरूरत नहीं होती। दालें आमतौर पर मुश्किल से पचती हैं और उन्हें अनाज की तुलना में काफी कम मा़त्रा में खाना चाहिए।
हेनरी साल्ट की किताब प्ली फॉर वेजेटेरेनिअज्म पढ़ने के बाद गांधी 1880 मे पूरी तरह शाकाहारी बन गए थे।

उनके मुताबिक,: आदमी का जन्म मांसाहारी के रूप में नहीं होता है, और इसलिए उसे धरती पर उगने वाले पौधों और फलों के सहारे जीना चाहिए।

हालांकि अपनी किताब आरोग्य की कुंजी में आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने अंडे खाने की वकालत की है। वह लिखते हैं: वास्तव में अंडे सजीव (मांस के खाद्य पदार्थ) नहीं हैं ... निर्जीव अंडे भी पैदा होते हैं। मुर्गी को मुर्गा देखने की इजाजत न होने पर भी वह अंडे देती है। एक निर्जीव अंडा कभी भी चूजे में विकसित नहीं होता है। इसलिए जो दूध ले सकता है उसे निर्जीव अंडे लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

गांधी शरीर के लिए पोषण और स्वास्थ्य के लिए ग्रामीण भारतीयों के आत्मनिर्भर होने में यकीन करते थे, जिससे वे स्थानीय खाद्य और फलों का अपने लिए उत्पादन कर सकें। उनका मानना था कि दुनिया में इतने भूखे लोग हैं, जिनके लिए भगवान, रोटी की बजाय किसी और शक्ल में प्रकट नहीं हो सकता।

चलना, चलना, चलना

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के एक पेपर के मुताबिक, राष्ट्रपिता लगभग 40 सालों तक रोजाना करीब 18 किलोमीटर चलते थे। लेखकों ने अपने पेपर में लिखा है कि अपने 1913 से 1948 के अभियान के दौरान गांधी लगभग 79,000 किलोमीटर पैदल चले, जो दो बार दुनिया के चक्कर लगाने के बराबर है।

गांधी के लेखन में व्यायाम को बहुत महत्व दिया गया है। उदाहरण के लिए ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में उन्होंने लिखा: मैं जानता हूं के मानसिक प्रशिक्षण के पाठ्यक्रम में शारीरिक प्रशिक्षण की क्या जगह होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी लिखा: स्वास्थ्य सुधार के प्रयासों में आलस, एक अपराध है। मनुष्य का शरीर एक कुरूक्षेत्र भी है और धर्मक्षेत्र भी। कुरूक्षेत्र, इस अर्थ में कि यह क्रियाआंे और अंतर्द्वंद का क्षेत्र है और धर्मक्षेत्र इस संदर्भ में कि शरीर को सही आकार में रखना हमारा धर्म है।

वह आगे कहते हैं: मेरा मानना है कि जहां व्यक्तिगत, घरेलू और सार्वजनिक स्वच्छता के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है और आहार और व्यायाम के मामले में उचित देखभाल की जाती है, वहां बीमारी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। जहां आंतरिक और बाहरी दोनों तरह की परम पवित्रता है,, वहां रोग असंभव हो जाता है।  अगर गांवों के लोग इस बात को समझ लेते हैं, तो उन्हें डॉक्टरों, हकीमों या वैद्यों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

अहमदाबार में गुजरात विद्यापीठ के पूर्व उपकुलपति और गांधीवादी सुदर्शन अयंगर ने डाउन टू अर्थ से कहा था, ‘गांधीजी का खाने के लिए एक ही मंत्र था कि इसे सादा, बिना तेल और मसालों का होना चाहिए। खाओ पर उसे पचाने की क्षमता भी बनाए रखो। कैलोरी कम करो। ’ खाने के संबंध में उनका समग्र संदेश, जीवन शैली में सादगी है।