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काेविड-19 वैश्विक आपदा: खाद्य नीतियां बदलने का वक्त

कोविड-19 ने वक्त की नजाकत को समझने तथा लचीली और टिकाऊ खाद्य प्रणाली की दिशा में नीतियों को दोबारा बनाने का मौका दिया है

On: Monday 31 August 2020
 
खाद्य नीतियां बदलने का वक्त
चावल और गेहूं की तुलना में ज्वार, बाजरा और दाल जैसी फसलों के लिए न केवल कम पानी की जरूरत होती है बल्कि इनमें अन्य पोषक तत्व और प्रोटीन भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। बाजरा में ग्लूकोस बहुत कम मात्रा में होता है, इसलिए डायबिटीज को नियंत्रण में रखने या इससे बचाव के लिए यह एक अच्छा विकल्प है (फोटो: विद्या सागर / इक्रीसैट) चावल और गेहूं की तुलना में ज्वार, बाजरा और दाल जैसी फसलों के लिए न केवल कम पानी की जरूरत होती है बल्कि इनमें अन्य पोषक तत्व और प्रोटीन भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। बाजरा में ग्लूकोस बहुत कम मात्रा में होता है, इसलिए डायबिटीज को नियंत्रण में रखने या इससे बचाव के लिए यह एक अच्छा विकल्प है (फोटो: विद्या सागर / इक्रीसैट)

अरबिंद के. पाढी 

दवाइयां हमें रोगों से लड़ने की ताकत नहीं दे सकतीं, बल्कि हमारी जीवन-शैली हमें बीमारियों से बचा सकती है। कोविड-19 के इस दौर में हमारी यह समझ सेहतमंद और पोषक खाने की मांग को बढ़ाने वाली है क्योंकि इस महामारी से बचने का सबसे सही तरीका अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को तत्काल बढ़ाना और स्वस्थ रहना है। पोषक तत्वों से युक्त खाद्य फसलों से संपन्न भारत में पहले ही प्राकृतिक और जैविक खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ रही है। यह बात देसी कंपनियों के प्राकृतिक और आयुर्वेदिक उत्पादों के बाजार में तेजी से हो रही बढ़ोतरी तथा उनकी प्रतिस्पर्धी अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में भी इसी प्रकार के रुझान देखकर पता चलती है। महत्वाकांक्षी उपभोक्ता स्वस्थ और लंबा जीवन जीने के लिए प्रकृति और प्राकृतिक उत्पादों की ओर लौट रहे हैं।

विश्व आर्थिक मंच द्वारा किए गए उपभोक्ता सर्वेक्षण में यह भविष्यवाणी की गई है कि वर्ष 2030 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को गरीब तबका नहीं बल्कि मध्यम वर्ग चलाएगा। उस समय तक लगभग 80 प्रतिशत भारतीय परिवार मध्यम वर्ग में शामिल हो जाएंगे (अभी लगभग 50 प्रतिशत हैं) और उपभोक्ताओं द्वारा किए जाने वाले कुल खर्च का 75 प्रतिशत इसी मध्यम वर्ग द्वारा किया जाएगा। इसके साथ ही, सरकार ने स्वस्थ और पोषक खाने की मांग को बढ़ाने के लिए “ईट राइट इंडिया” और “स्मार्ट फूड” जैसी पहलें शुरू की हैं। अब हमें यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि ऐसा खाना सुरक्षित हो और समाज के कमजोर तबके की पहुंच में व किफायती हो।

अनुभव आधारित अध्ययन दर्शाते हैं कि देश में बच्चों की अधिकांश मौतें और वयस्कों में अपंगता कुपोषण के कारण होती है। व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण (सीएनएनएस) के आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि अधिक वजन, मोटापा और यहां तक कि गैर-संचारी रोग (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) अब वयस्क आबादी तक ही सीमित नहीं रह गए हैं। आने वाले समय में अपनी कार्यशील आबादी को बचाने के लिए पोषण पर गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है।

यह बदलाव कैसे आएगा? वह भी तब जबकि हरित क्रांति की प्रौद्योगिकियों के कारण कृषि की अधिकता जल संसाधनों का अधिकाधिक दोहन कर रही है, जैव-विविधता पर दुष्प्रभाव डाल रही है, मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को खराब कर रही है और भूमि को बंजर बना रही है। कृषि पर जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव भी जगजाहिर है। सार्वजनिक नीतियां प्राकृतिक संसाधनों के दीर्घकालीन इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए पोषक और सुरक्षित खाद्यान्नों की पैदावार को किस प्रकार सुनिश्चित करेंगी? खाद्य प्रणाली में इस बदलाव को बढ़ावा देने का क्या उपाय हो सकता है?

कोविड-19 ने वक्त की नजाकत को समझने तथा लचीली और टिकाऊ खाद्य प्रणाली की दिशा में नीतियों को दोबारा बनाने का मौका दिया है। उपभोक्ताओं की संस्कृति, स्वाद और भोजन संबंधी प्राथमिकताओं का सम्मान करते हुए जागरुकता कार्यक्रमों के जरिए स्वास्थ्य के लिए बेहतर और पोषक खाने की मांग को बढ़ाए जाने की जरूरत है। लेबलिंग और प्रोत्साहनों के जरिए सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों में खाद्य सुरक्षा संबंधी मानदंडों का निर्माण किया जाना चाहिए। पोषण अभियान, ईट राइट इंडिया अभियान, मिलेट मिशन और स्वस्थ भारत अभियान की तरह ही पोषण के अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए संगत गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं। कारोबारियों को भी प्रोत्साहित करने की जरूरत है ताकि वे खाद्य प्रणाली में बदलाव के लिए जिम्मेदारी के साथ निवेश करें।

हालांकि मुख्य खाद्य फसलों और सहायक खाद्य फसलों को व्यक्ति के विकास के लिए पोषक और बेहतर माना जाता रहा है, फिर भी दुनियाभर में खाद्य और कृषि नीतियां तीन मुख्य खाद्यान्न-चावल, गेहूं और मक्का तक ही सीमि‍त हैं। भारत में, दशकों तक न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक खरीद संबंधी नीतियों में खाद्य फसलों की विविधता को अनदेखा किया गया और इस संबंध में नीतियां चावल तथा गेहूं के पक्ष में ही रहीं। इन फसलों की उपज में बढ़ोतरी से कैलोरी संबंधी जरूरतें तो पूरी हुईं लेकिन देश पर पोषण और अन्य पोषक तत्वों की कमी का बोझ बढ़ गया।

चावल और गेहूं की तुलना में ज्वार, बाजरा और दाल जैसी फसलों के लिए न केवल कम पानी की जरूरत होती है बल्कि इनमें अन्य पोषक तत्व और प्रोटीन भी प्रचुर मात्रा में होते हैं। बाजरा में ग्लूकोस बहुत कम मात्रा में होता है, इसलिए डायबिटीज को नियंत्रण में रखने या इससे बचाव के लिए यह एक अच्छा विकल्प है। इनके पोषक तत्वों की प्रचुरता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें से कुछ खाद्यान्न पोषक तत्वों की कमी को दूर करने का प्राकृतिक जरिया बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, रागी में दूध से तीन गुणा ज्यादा कैल्शियम होता है, बाजरा में सबसे ज्यादा फॉलेट पाया जाता है और कोदरा (कोदो) में गेहूं या मक्का से तीन गुणा और चावल से 10 गुणा ज्यादा रेशे (फाइबर) होते हैं।

इसी तरह, ज्वार और बाजरा में ग्लुटन नहीं होता। आपके लिए, पृथ्वी के लिए तथा किसानों के लिए फायदेमंद होने के कारण इन्हें “स्मार्ट फूड” कहा जाता है। इस वजह से ये महत्वाकांक्षी तथा स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं, खासतौर पर शहरी क्षेत्रों के उपभोक्ताओं की पहली पसंद बनते जा रहे हैं।

भारत में मछली और मांस के अलावा, दालें भी प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं। फलियां भी प्रोटीन की किफायती स्रोत हैं। हालांकि इनमें से कई फलियां प्रोटीन की पूर्ण स्रोत नहीं हैं क्योंकि इनमें अनिवार्य अमीनो एसिड में से एक- मेथियोनाइन नहीं पाया जाता। हाल में किया गया एक अध्ययन दर्शाता है कि यदि दालों और फलियों का एक साथ सेवन किया जाए तो यह पूरा प्रोटीन प्रदान कर सकता है तथा पूरी तरह से पचने योग्य और पोषण तत्वों से भरपूर भोजन बन सकता है। हाल के समय में दालों के उत्पादन में हुई बढ़ोतरी वाकई एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। सरकार को चाहिए कि वह विशेष नीतियों और अनुसंधान के जरिए इस स्थिति को बनाए रखे जो हमें आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही है।

भारत में फलों, सब्जियों और डेरी उत्पादों का उपभोग भी बढ़ रहा है। यह भारतीय कृषि की पोषण संबंधी संवेदनशीलता का अच्छा संकेतक है। देश में फसलों में पोषक तत्वों को बढ़ाने के लिए अब बायो-फोर्टिफिकेशन का इस्तेमाल किया जा रहा है। कृषि अनुसंधान परिषद ने जिंक और प्रोटीन की अधिकता वाले चावल और मक्के की उच्च प्रोटीन और विटामिन-ए युक्त किस्मों को विकसित तथा जारी किया है। इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर दि सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (आईसीआरआईएसएटी) ने भी महाराष्ट्र में भारत की ज्वार की पहली बायो-फोर्टिफाइड किस्म परभानी शक्ति को विकसित और जारी किया है।

कोविड-19 के इस समय में इस क्षेत्र में अनुसंधान और नवप्रयोग पर किया गया अधिक निवेश नागरिकों के स्वास्थ्य को बेहतर करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने का अहम जरिया साबित हो सकता है। सहायक खाद्यान्न फसलों सहित प्रमुख फसलों में किए गए अनुसंधान प्रयास जनता में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने का किफायती और टिकाऊ माध्यम बन सकते हैं। सरकारी कार्यक्रम जैसे, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मध्याह्न भोजन योजना और शिशुओं का एकीकृत विकास योजना, भारत में स्वस्थ और पोषक खाने को बढ़ावा देने का सबसे अच्छा जरिया बन सकते हैं। हाल ही में किया गया अध्ययन दर्शाता है कि जिन बच्चों को मध्याह्न भोजन में बाजरे से बना खाना खिलाया गया उनकी वृद्धि चावल आधारित भोजन खाने वाले बच्चों की तुलना में 50 प्रतिशत ज्यादा तेज हुई है।

जैसा कि अर्थशास्त्री भोजन और पोषण के बारे में बात करते हुए आमतौर पर जिक्र करते हैं, बेनेट का नियम अब अधिकांश भारतीयों के लिए काफी हद तक लागू होता है। इसके अनुसार जैसे-जैसे लोगों की आमदनी बढ़ रही है, उनके खाने में स्टार्च युक्त भोजन की मात्रा कम होती जा रही है। पोषक और टिकाऊ खाद्य प्रणाली व मूल्य श्रृंखला को बढ़ावा देने तथा लोगों के व्यवहार में बदलाव लाकर स्वस्थ, पोषक, गुणवत्तापूर्ण एवं सुरक्षित भोजन की मांग में बढ़ाने संबंधी नीतियां बनाने का यह सही समय है।

(अरबिंद के. पाढी वर्तमान में इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स के भारत निदेशक हैं। जोआना केन-पोटाका आईसीआरआईएसटी में सहायक महानिदेशक और कार्यकारी निदेशक हैं। यहां व्यक्त लेखकों के विचार निजी हैं)