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विलुप्त होने के कगार पर पहुंची चमत्कारी चिरौंजी

चिरौंजी खांसी, अतिसार और मधुमेह रोगियों के लिए फायदेमंद है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में संग्रहण और गलत तरीके से छंटाई के चलते चिरौंजी के पेड़ विलुप्ति के कगार पर पहुंचते जा रहे हैं

By Chaitanya Chandan

On: Saturday 20 April 2019
 
चिरौंजी का इस्तेमाल मेवे की तरह होता है और स्थानीय बाजारों में ऊंची कीमत पर इसे बेचा जाता है
चिरौंजी का इस्तेमाल मेवे की तरह होता है और स्थानीय बाजारों में ऊंची कीमत पर इसे बेचा जाता है (विकास चौधरी / सीएसई) चिरौंजी का इस्तेमाल मेवे की तरह होता है और स्थानीय बाजारों में ऊंची कीमत पर इसे बेचा जाता है (विकास चौधरी / सीएसई)

पिछले साल गर्मियों में जब रांची जाना हुआ तो वहां एक अलग तरह का फल बिकते देखा। पूछने पर पता चला कि उस फल को स्थानीय भाषा में पियार के नाम से जाना जाता है। पियार एक अंगूर के आकार का फल होता है जिसके बीज से चिरौंजी नामक मेवा निकलता है। पियार को स्थानीय बोलचाल की भाषा में पियाल भी कहते हैं। इसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है। इसे ताजा खाया जाता है या बाद में इस्तेमाल करने के लिए सुखाकर रखा जाता है।

चिरौंजी के पेड़ मुख्यतः ऊष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के शुष्क इलाकों में पाए जाते हैं। चिरौंजी के पेड़ समुद्र तल से 1,200 मीटर की ऊंचाई तक वाले क्षेत्रों में उगाए जा सकते हैं। सदाबहार श्रेणी के चिरौंजी के पेड़ मुख्यतः जंगलों में पाए जाते हैं और 18 मीटर तक ऊंचे हो सकते हैं। हालांकि भारत में बीजों के लिए इसके पेड़ बागानों में भी उगाए जाते हैं। चिरौंजी का इस्तेमाल मेवे की तरह होता है और स्थानीय बाजारों में ऊंची कीमत पर इसे बेचा जाता है। इसका निर्यात कम होता है।

चिरौंजी का वानस्पतिक नाम बुकानानिया लांजन है और अंग्रेजी में इसे ‘आमंडेट’ के नाम से जाना जाता है। बुकानानिया परिवार में करीब सात प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमे से सिर्फ दो प्रजातियों के फल ही खाने योग्य होते हैं। इनमें से एक बुकानानिया लांजन (पियार) और दूसरा बुकानानिया एक्जीलरीज है। चिरौंजी वाणिज्यिक रूप से बहुत उपयोगी मेवा है और भारत, म्यांमार एवं नेपाल में बहुतायत में पाया जाता है। यह झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के वाराणसी व मिर्जापुर जिलों में पाया जाता है।

चिरौंजी का फल पियार 4-5 महीने में पकता है और इसे अप्रैल-मई के महीने में तोड़ा जाता है। तोड़ने के बाद कुछ ही दिनों में हरे रंग का फल काला पड़ जाता है। चिरौंजी निकालने के लिए इस फल को रात भर पानी में डालकर रखा जाता है और इसके बाद जूट के बोरे से रगड़-रगड़कर बीज अलग कर लिया जाता है। इसके बाद इसे पानी से अच्छी तरह से धोकर धूप में सुखाया जाता है।

रिसर्च जर्नल ऑफ फार्मकॉलॉजी एंड फायटोकेमिस्ट्री में वर्ष 2015 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासी चिरौंजी का इस्तेमाल घाव के उपचार के लिए करते हैं। चिरौंजी इन आदिवासियों के जीवनयापन का एक बड़ा साधन भी है। उत्तर प्रदेश का एक पिछड़ा जिला सोनभद्र के आदिवासी समुदाय के लोग चिरौंजी के पेड़ से गोंद और लाख इकट्ठा करके बाजार में बेचकर आय कमाते हैं।

आदिवासी समुदाय के लोग चिरौंजी के फल और बीज को जंगल से इकट्ठा करके खाते भी हैं। आंध्र प्रदेश के कुछ आदिवासी समुदाय चिरौंजी के गोंद को गाय के दूध में मिलाकर पीते हैं। उनका मानना है कि इससे गठिया का दर्द दूर होता है। पिछले कुछ दशकों से चिरौंजी की मांग शहरी बाजारों में बढ़ने की वजह से जंगलों से इसका बड़ी मात्रा में संग्रह और पेड़ों की गलत तरीके से छंटाई की वजह से जंगलों में चिरौंजी के पेड़ तेजी से कम हुए हैं। यही कारण है कि इंटरनेशनल यूनियन फ़ॉर कॉन्सर्वेशन ऑफ नेचर एंड नैचरल रिसोर्सेस (आईयूसीएन) ने इसे रेड लिस्ट में रखा है।

प्राचीन चिकित्सा साहित्य में चिरौंजी को बहुत महत्वपूर्ण औषधि माना गया है। चरक संहिता, भाव प्रकाश, चक्रदत्त और चिरंजीव वनौषधि के अनुसार चिरौंजी का नियमित सेवन शरीर में कफ, वाट और पित्त को नियंत्रित रखता है और खून को भी साफ रखता है। आयुर्वेद में चिरौंजी के तेल से जो दवाई बनाई जाती है वह हृदय रोग और खांसी के उपचार में काम आता है। साथ ही मस्तिष्क के लिए टॉनिक का भी काम करता है।

वर्ष 1972 में प्रकाशित “अ मैन्यूअल ऑफ इंडियन टिम्बर्ज” के अनुसार चिरौंजी के पेड़ की छाल का इस्तेमाल चमड़े की सफाई के लिए किया जाता है। चिरौंजी का पेड़ बड़ी मात्रा में गोंद का उत्पादन करता है, जो पानी में कमोबेश अघुलनशील होता है। इसलिए इस गोंद का इस्तेमाल सस्ती औद्योगिक प्रक्रियाओं में किया जाता है। खराब गुणवत्ता के कारण इसकी लकड़ी का इस्तेमाल जलावन के तौर पर या चारकोल बनाने में किया जाता है। इंडोनेशिया के प्रोसिया फाउंडेशन द्वारा वर्ष 1999 में प्रकाशित एक रिपोर्ट “प्लांट रीसॉर्सेज ऑफ साउथईस्ट एशिया” के अनुसार पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली में चिरौंजी के पेड़ से निकलने वाली गोंद का इस्तेमाल कुष्ठरोग के उपचार के लिए किया जाता है।

औषधीय गुण

वर्ष 2010 में इंडियन जर्नल ऑफ ट्रेडिशनल नॉलेज में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, चिरौंजी का इस्तेमाल खांसी के उपचार के लिए और शक्तिवर्धक के तौर पर किया जाता है। चिरौंजी के तेल का उपयोग चर्मरोग के इलाज में भी कारगर है। वर्ष 2013 में ट्रॉपिकल जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि चिरौंजी का नियमित सेवन मधुमेह के रोगियों के रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित रखता है। एनल्स ऑफ बायोलॉजिकल रिसर्च नामक जर्नल में वर्ष 2011 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, चिरौंजी के फल और छाल से बना लेप सर्पदंश के उपचार में कारगर है। वहीं फार्माकॉलॉजी ऑनलाइन नामक जर्नल में वर्ष 2010 में प्रकाशित शोध चिरौंजी की जड़ से बनी दवा से अतिसार के उपचार की पुष्टि करता है।

व्यंजन
 

चिरौंजी के लड्डू


सामग्री
  • चिरौंजी: 250 ग्राम
  • खोवा (मावा): 100 ग्राम
  • चीनी: 150 ग्राम
  • देशी घी: 1 टेबल स्पून
  • दूध: 1 बड़े चम्मच
  • काजू: 8-10 नग
विधि: एक कढ़ाही में चिरौंजी को 3 मिनट तक भूनें, जिससे कि उसके अंदर की नमी निकल जाए। इसके बाद एक कढ़ाही में घी, मावा, चीनी और दूध डालकर तब तक गरम करें, जब तक कि मिश्रण गाढ़ा न हो जाए। अब इसमें भुनी हुई चिरौंजी डालकर अच्छी तरह मिलाएं। इसके बाद मिश्रण को थोड़ा ठंडा होने के लिए छोड़ दें। मिश्रण जब हाथ में उठाने लायक हो जाए, तो इसके लड्डू बनाना शुरू करें। अब इस लड्डू पर काजू का आधा टुकड़ा चिपकाएं और रेफ्रिजरेटर में दो घंटे तक ठंडा होने के लिए रख दें। लीजिए तैयार है चिरौंजी का स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक लड्डू।

एन इंडियन सेंस ऑफ सलाद: ईट रॉ, ईट मोर
लेखक: तारा देशपांडे टेनेबौम
प्रकाशक: ईबरी प्रेस
पृष्ठ: 232 | मूल्य: R599

इस किताब में घर के निकट मिलने वाले ताजे फल-सब्जियों को बिना पकाए स्वास्थ्यवर्धक तरीके से खाने की विधियां बताई गई हैं। कम लोकप्रिय खाद्य सामग्रियों से नए व्यंजन बनाना भी सिखाया गया है।