बरसात के दिनों में खाएं चकुंडा, होंगी बीमारियां दूर

चकुंडा के पत्तों, बीजों और जड़ों के चिकित्सीय उपयोग को आयुर्वेद, यूनानी और चीन की चिकित्सा पद्धति में मान्यता मिली है

By Shalini Dhyani

On: Wednesday 04 August 2021
 

उम्रदराज महिलाएं चकुंडा के साग को चाव से खाती हैं (फोटो: शलिनी ध्यानी)भारत में मॉनसून की बारिश भीषण गर्मी से ही राहत नहीं देती, बल्कि सूखी जमीन पर नई जान फूंक देती है। बारिश में घास और हरी-भरी जंगली झाड़ियों की चादर सी बिछ जाती है। मॉनसून की बारिश जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, पीले रंग के फूलों से अधिकांश खाली जमीन गुलजार हो जाती है और उन पर मधुमक्खियों और तितलियों के झुंड मंडराने लगते हैं। सिकल सेना (कैसिया तोरा) के फूल भी इस दौरान मुख्य रूप से देखे जाते हैं। लगभग हर खाली भूखंड, सड़क के किनारे, बंजर भूमि और नदी के किनारे इससे भर जाते हैं। हालांकि कई, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में लोग इसे एक खरपतवार मानते हैं और इससे छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं। सिकल सेना महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, बिहार, गोवा, छत्तीसगढ़ और झारखंड में कई समुदायों के लिए भोजन और पोषण का एक उत्कृष्ट स्रोत है। इसे चकुंडा, चकवड़, चाकोड, चक्रमर्द साग, तगराई और सोरू मेडेलुआ जैसे नामों से जाना जाता है।

पुणे की रहने वाली स्वाति सरगांवकर कहती हैं, “मॉनसून के दौरान हम आमतौर पर बाजार में मिलने वाली हरी पत्तेदार सब्जियां खाने से बचते हैं, लेकिन इस पीले फूल वाले पौधे की पत्तियों के साथ ऐसा नहीं होता।” वह आगे बताती हैं कि चकुंडा की मुलायम पत्तियां इस मौसम में मिलने वाला एक स्वादिष्ट और पौष्टिक साग होता है। इसका खूब आनंद लिया जाता है। हालांकि बहुत-सी जंगली पत्तेदार सब्जियों की तरह चकुंडा संगठित सब्जी बाजारों में मुश्किल से ही पहुंच पाता है। हो सकता है कि मॉनसून में प्रचुर मात्रा में इसकी उपलब्धता के कारण व्यापारी इसे लेकर उत्साहित न होते हों। फिर भी इसे चाहने वालों की कमी नहीं है।

उम्रदराज महिलाएं इस जंगली साग और उसकी फलियों को विशेष रूप से पसंद करती हैं। आंध्र प्रदेश के अमरावती में रहने वाली पी अनुराधा कही हैं, “मेरी मां चाकोड़ तोड़ने में माहिर हैं। वह बहुत सावधानी से इसकी पत्तियां तोड़ती हैं ताकि कीड़ों के अंडे और लार्वा पत्तियों के साथ न आ जाएं।” अधिकांश लोग पौधे की मुलायम पत्तियों और अपरिपक्व फली को सब्जियों के रूप में उपभोग करते हैं, लेकिन इसे बनाने की विधि अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न है।

कर्नाटक में लोग चकुंडा के पत्तों का उपयोग वड़ा (मसूर के पकोड़े) बनाने में करते हैं। साथ ही सूखे नारियल और कटहल के बीज के साथ सब्जी भी बनाते हैं। आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र में लोग मूंगफली के पाउडर के साथ इसे मिलाते हैं और रागी भाखरी (बाजरे के आटे से बनी रोटी) के साथ बस तली हुई पत्तियों का स्वाद लेते हैं। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में आदिवासी समुदाय विशेष रूप से परिपक्व रवादार फलियों को भूनकर स्वास्थ्यवर्धक पेय बनाते हैं।

चिकित्सीय गुण

चकुंडा के पत्तों, बीजों और जड़ों के चिकित्सीय उपयोग को आयुर्वेद, यूनानी और चीन की चिकित्सा पद्धति में मान्यता मिली है। आयुर्वेद में इसे चक्रमर्द, यूनानी में पवांर और चीन की चिकित्सा पद्धति में इसे ज्यू मिंग जी के रूप में जाना जाता है। तीनों पद्धतियों में इसके पौधे को महत्वपूर्ण रेचक औषधि माना गया है जो पाचन तंत्र को दुरुस्त करने में मददगार है। महाराष्ट्र के नागपुर में रहने वाले आयुर्वेदिक चिकित्सक विभास देशकर कहते हैं, “चकुंडा की पत्तियों का उपयोग कुष्ठरोग, दाद के संक्रमण, त्वचा की बीमारियों और लिवर के विकारों को दूर करने में किया जाता है। आयुर्वेद मानता है कि यह पौधा आंतों को शीतल रखने में मदद करता है। चुकंडा के पके बीज भी शीतल गुण वाले माने जाते हैं। कोरिया में इसके गर्म बीजों का रस पीकर लिवर से अतिरिक्त गर्मी बाहर निकाली जाती है। यह पौधा आंखों की रोशनी बढ़ाने और नेत्र रोगों को दूर करने वाला भी माना गया है।

हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी पौधे की जैविक क्षमताओं का पता लगाया है। इसके पत्ते, बीज और जड़ें न्यूट्रास्युटिकल्स का भंडार हैं। वैज्ञानिकों ने चकुंडा के विभिन्न हिस्सों से महत्वपूर्ण रासायनिक यौगिकों जैसे एन्थ्राक्विनोन ग्लाइकोसाइड्स, नेफ्थोपाइरोन ग्लाइकोसाइड्स, फेनोलिक यौगिकों और फ्लेवोनोइड्स को अलग किया है।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल साइंसेज एंड रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन में चकुंडा के कई स्वास्थ्य लाभों पर रोशनी डाली गई है। कुछ महत्वपूर्ण गुण हैं- हेपेटोप्रोटेक्टिव गतिविधि अथवा लिवर की रक्षा करना, ट्यूमर रोधी, एंटीबैक्टीरियल और एंटिफंगल प्रभाव। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि पौधे के पत्ते यदि भोजन के रूप में उपयोग किए जाते हैं तो मोतियाबिंद को ठीक करने में मदद मिल सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2014-2023 में 2020 तक विकासशील देशों में पारंपरिक दवाओं के उपयोग में 20 प्रतिशत तक सुधार करने का आह्वान किया गया है। हालांकि चकुंडा में दृष्टि में योगदान करने की क्षमता है, फिर भी इसके चिकित्सीय गुणों को अब तक पूरी तरह नहीं खोजा गया है। देश में किसान लंबे समय से विभिन्न उद्देश्यों के लिए इस पौधे का उपयोग कर रहे हैं।

यह जैविक किसानों के लिए एक पसंदीदा प्राकृतिक कीटनाशक है। इसके सूखे बीजों का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों में पक्षियों और पशुओं को खिलाने के लिए किया जाता है। फलीदार खरपतवार होने के कारण इसका उपयोग पशुओं के लिए हरे, पौष्टिक चारे के रूप में भी किया जाता है। पौधे के बीज का इस्तेमाल जैविक प्राकृतिक डाई में किया जाता है। अत: कह सकते हैं कि यह पौधा गुणों की खान है।

व्यंजन - तला चकुंडा
सामग्री:

  • चकुंडा के पत्ते: 500 ग्राम
  • तेल: 1 बड़ी चम्मच
  • सरसों के बीज: 1 छोटी चम्मच
  • चना दाल : 1 छोटी चम्मच
  • प्याज: 1 (मध्यम आकार का)
  • लहसुन (वैकल्पिक): कुछ कलियां
  • हरी मिर्च (तली हुई): 2
  • नमक स्वादानुसार
  • मूंगफली (पाउडर) : 2 बड़े चम्मच

विधि: पत्तों को अच्छी तरह धो लें और पानी निकल जाने दें। एक लोहे की कड़ाही में तेल गर्म करें। इसमें चना दाल और राई डालें और उन्हें चटकने दें। अब कटा हुआ प्याज और यदि आप चाहें तो लहसुन की कुछ कलियां डालें। इसके बाद चकुंडा के पत्ते डालें और पांच मिनट से अधिक न पकाएं। आंच बंद करने से पहले इसमें मूंगफली का पाउडर डालें। स्वाद बढ़ाने के लिए ज्वार भाकरी (ज्वार के आटे से बनी रोटी) और तली हुई हरी मिर्च के साथ परोसें।