चकौडा के पौधों में लगा विचित्र रोग, काली पड़ रही हैं पत्तियां

आदिवासियों की आय का स्रोत है पौधा, स्थानीय लोगों में प्रचलित है भाजी

By Bhagirath Srivas

On: Thursday 05 August 2021
 

मध्यप्रदेश के मंडला और उसके आसपास के जिलों में चकौडा (वैज्ञाानिक नाम कैसिया तोरा) के पौधों में अजीबोगरीब रोग लग गया है। इस रोग के कारण पौधे की पत्तियां काली पड़ रही हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने क्षेत्र का मुआयना कर जांच के लिए पौधों के नमूने एकत्र कर लिए हैं।

स्थानीय पर्यावरणविद रमण भास्कर पौधों में लगे इस रोग को जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि इस वर्ष मई में मंडला जिले में बारिश होने के बाद चकौड़ा के पौधे अपने सामान्य समय से करीब दो महीने पहले उग आए थे। हो सकता है कि रोग समय से पूर्व बारिश और गर्मी का नतीजा हो। रमण भास्कर बताते हैं, “पहली बार चकौडा के पौधों में इस प्रकार का रोग लगा है। सूर्यास्त के बाद पौधे के पत्ते आपस में चिपक जाते हैं और हराभरा दिखने वाला पूरा इलाका काले पत्तों के कारण काला दिखाई देने लगता है।” उनका कहना है कि मंडला जिले के नैनपुर इलाके में यह समस्या काफी गंभीर है। आसपास के बालाघाट, जबलपुर, छिंदवाड़ा जिले में भी यह रोग फैला हुआ है।

मंडला कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक विशाल मेश्राम ने चकौडा में लगे रोग को गंभीरता से लेते हुए जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर को पत्र लिखकर जांच का आग्रह किया है। उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया कि पौधों के नमूनों को जांच के लिए भेजा गया है। एक या दिन में रिपोर्ट आने की उम्मीद है। उसके बाद ही रोग के कारणों का पता चल सकेगा।

चकौडा के पौधे मध्य प्रदेश के आदिवासी समुदाय की आय का स्रोत है। समुदाय के लोग चकौडा के बीजों को 20-70 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करते हैं। हालांकि ऑनलाइन खरीदारी पर इसके बीज 800-900 रुपए प्रति किलो के भाव पर बिक रहे हैं। स्थानीय लोगों में इस पौधे की भाजी काफी प्रचलित है। यह भाजी पोषण के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है।

चकौडा में लगे रोग का निरीक्षण करते कृषि वैज्ञानिकशालिनी ध्यानी ने डाउन टू अर्थ में लिखे लेख में कहा है कि चकुंडा के पत्तों, बीजों और जड़ों के चिकित्सीय उपयोग को आयुर्वेद, यूनानी और चीन की चिकित्सा पद्धति में मान्यता मिली है। आयुर्वेद में इसे चक्रमर्द, यूनानी में पवांर और चीन की चिकित्सा पद्धति में इसे ज्यू मिंग जी के रूप में जाना जाता है। तीनों पद्धतियों में इसके पौधे को महत्वपूर्ण रेचक औषधि माना गया है जो पाचन तंत्र को दुरुस्त करने में मददगार है।

शालिनी लिखती हैं कि चकुंडा की पत्तियों का उपयोग कुष्ठरोग, दाद के संक्रमण, त्वचा की बीमारियों और लिवर के विकारों को दूर करने में किया जाता है। चुकंडा के पके बीज भी शीतल गुण वाले माने जाते हैं। कोरिया में इसके गर्म बीजों का रस पीकर लिवर से अतिरिक्त गर्मी बाहर निकाली जाती है। यह पौधा आंखों की रोशनी बढ़ाने और नेत्र रोगों को दूर करने वाला भी माना गया है।

पर्यावरणविदों की चिंता है कि चकौडा में लगा रोग कहीं इन लाभों से लोगों को वंचित न कर दे। रमण भास्कर भी इसे लेकर चिंतित हैं। उन्हें डर है कि यह रोग कहीं लोगों और पशुओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न डाल दे। उन्हें यह भी डर है कि यह रोग बीजों के माध्यम से कहीं दूसरी फसलों में चला जाए। अगर ऐसा हो गया गया तो आने वाले समय में हालात नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे। उनका कहना है कि जब तक बीमारी की प्रकृति और उसके प्रभाव का पता न चल जाए, तब तक लोगों को इसके पत्तों को खाने से रोकना चाहिए। हालांकि वैज्ञानिक इस संबंध कुछ भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं।