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आहार संस्कृति: यह साग है कुछ खास

अगर चने का नर्म साग सर्वसुलभ हो जाए तो इस पौष्टिक आहार को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी

By Vibha Varshney

On: Friday 12 March 2021
 
उत्तर प्रदेश में चने के साग में अक्सर दाल मिलाकर बनाया जाता है (फोटो: विभा वार्ष्णेय / सीएसई)
उत्तर प्रदेश में चने के साग में अक्सर दाल मिलाकर बनाया जाता है (फोटो: विभा वार्ष्णेय / सीएसई) उत्तर प्रदेश में चने के साग में अक्सर दाल मिलाकर बनाया जाता है (फोटो: विभा वार्ष्णेय / सीएसई)

सर्दियों के दौरान दिल्ली में हरी पत्तेदार सब्जियों से भरी गाड़ियों के नजारे आम हैं। फेरी वाले सरसों, पालक और मेथी जैसे तरह-तरह के साग बेचते दिखते हैं। हमेशा तो नहीं लेकिन कभी-कभार उनके पास चने का साग भी मिल जाता है। चना (साइसर एरीटिनम) दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फली है, जिसकी खेती इसके प्रोटीन से भरपूर बीजों के लिए की जाती है न कि हरी पत्तियों के लिए। यही वजह है कि इसका साग हमें बाजार में बहुत मुश्किल से मिलता है।

चने की पैदावार को बढ़ाने के लिए इसकी कोमल पत्तियों को बढ़ रहे पौधों से तोड़ लिया जाता है। इससे पौधा घनी झाड़ीनुमा और पौधा अधिक बीज पैदा करने में सक्षम हो जाता है। ऑक्सैलिक और मैलिक एसिड की उपस्थिति की वजह से इसकी पत्तियों में थोड़ी खटास होती है। हालांकि, पत्तियों को धो देने से उनकी खटास चली जाती है। गांवों में बच्चों को स्नैक्स की तरह इन पत्तियों का लुत्फ उठाते देखना आम है। बच्चे केवल शीर्ष पर मौजूद नई पत्तियों को ही तोड़ते हैं, इसलिए किसान भी इससे नाराज नहीं होते।

यह साग बाजार में बमुश्किल ही मिल पाता है। लेकिन, अगर दुकानदार के पास आपको यह पत्तियां न मिलें, तो उसके लिए दुखी होने की जरूरत नहीं है। आप उन्हें घर पर ही उगा सकते हैं। इसके लिए आपको बस माइक्रोग्रीन्स को उगाने के तौर-तरीकों को सीखने की जरूरत है। बस पहली दो पत्तियों के आने के तुरंत बाद ही पौधों की छंटाई कर देने की जगह उसे कुछ समय तक बढ़ने देना चाहिए, जब तक टहनियों में और भी पत्तियां न निकल आएं। करीब 10 दिनों में पर्याप्त संख्या में पत्तियां निकल आती हैं।

माइक्रोग्रीन्स उगाने के लिए छोटे, भूरे बीजों वाली देसी किस्म बढ़िया होती है। बीज को एक दिन के लिए पानी में भिगोएं, फिर उन्हें रोप दें और मिट्टी की एक पतली परत से ढंक दें। उन्हें सूरज की रोशनी में बढ़ने दें और पौधों को नियमित तौर पर पानी देते रहें। ये काफी तेजी से बढ़ते हैं, इसी वजह से स्कूलों में बच्चों को चने के बीजों से ही अंकुरण के बारे में पढ़ाया जाता है।

पौष्टिक तत्वों से भरपूर

अध्ययनों से पता चला है कि चने की पत्तियां बहुत पौष्टिक होती हैं। ये मैक्रोन्यूट्रिएन्ट मिनरल्स (कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, फास्फोरस) और माइक्रोन्यूट्रिएन्ट मिनरल्स (आयरन, जिंक, मैंग्नीज, कॉपर और बोरोन) दोनों का बहुत अच्छा स्रोत हैं। यही नहीं, साल 2003 में द जर्नल ऑफ द साइंस ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि इनमें से अधिकतर मिनरल्स का स्तर इस साग में पत्तागोभी और पालक से कहीं अधिक है।

पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना के शोधार्थियों के मुताबिक, 100 ग्राम सूखी पत्तियों में 93 मिलीग्राम आयरन होता है। उन्होंने सुझाव दिया कि पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इन पत्तियों के पाउडर का इस्तेमाल चपाती और पूरी जैसे पारंपरिक खाने में किया जाना चाहिए।

परंपरागत रूप से साग केवल उन राज्यों में ही भोजन का हिस्सा है, जहां चने की खेती की जाती है। इनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, तमिलनाडु, झारखंड और बिहार शामिल हैं। हालांकि, पत्तियों को सुखाकर उनका भंडारण किया जा सकता है, लेकिन सहजन की पत्तियों के विपरीत अभी तक इसके लिए कोई औपचारिक बाजार मौजूद नहीं है। चना उत्पादन में अग्रणी भारत जैसे देश के लिए यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि पूरी दुनिया का 65 फीसदी चना यहीं पैदा होता है। उत्तर प्रदेश में दाल में साग डालकर पकाया जाता है और इसे बनाना बहुत आसान है। इसमें बहुत कम मसालों का उपयोग किया जाता है, ताकि साग की खटास का लुत्फ उठाया जा सके (देखें रेसिपी)।

बीते कुछ वर्षों के दौरान पाया गया है कि यह फलीदार प्रजाति खतरे में है। पश्चिमी ईरान से दक्षिण पूर्व तुर्की तक फैले अर्द्धचंद्राकार उपजाऊ क्षेत्र में चने की फसल के तौर पर खेती (गृहीकरण) शुरू की गई थी। अध्ययनों से पता चलता है कि 10 हजार से अधिक वर्षों में चने के गृहीकरण की इस प्रक्रिया के दौरान इसकी 80 फीसदी आनुवांशिक विविधता खो गई।

इसने बीमारियों, सूखे और वैश्विक तापमान के प्रति पौधे को अतिसंवेदनशील बना दिया है। अप्रैल 2019 में नेचर जेनेटिक्स में प्रकाशित एक पेपर में इंटरनैशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (इक्रिसैट), हैदराबाद ने अनुमान जताया है कि वैश्विक तापमान बढ़ने की वजह से उपज को 70 फीसदी तक नुकसान पहुंच सकता है। यह एक विरोधाभास ही है कि ग्रीनहाउस गैसों में प्रमुख नाइट्रोजन के प्रबंधन में चने की फसल अहम भूमिका निभाती है, उसके उत्सर्जन को नियंत्रित करती है।

इक्रिसैट गर्मी और सूखे को सहन कर सकने वाली चने की प्रजातियों को विकसित करने का प्रयास कर रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो सकेगा कि यह प्रोटीन युक्त फलियां जलवायु परिवर्तन से बच पाने में सक्षम हैं। संस्थान ने इस पौधे में ऐसे जींस की पहचान की है, जो 38 सेल्सियस तक तापमान को सहने में फसल की मदद कर सकता है।

चने में 23 फीसदी प्रोटीन पाया जाता है। ऐसे में दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका के विकासशील देशों में पोषण सुरक्षा के लिहाज से यह फसल बहुत महत्वपूर्ण है। इस गुणकारी, बहुउपयोगी और पौष्टिक फसल की रक्षा के लिए इक्रिसैट के प्रयास महत्वपूर्ण हैं।

दाल के साथ चने का साग

सामग्री:

चने का साग : 250 ग्राम
चने की दाल : 50 ग्राम
मिर्च पाउडर : 1 चम्मच
पि सी हल्दी : 1 चम्मच
धनि या पाउडर : 1 चम्मच
गरम मसाला : 1 चम्मच
जीरा : 1 चम्मच
हींग : 1 चुटकी
अदरक मिर्च का पेस्ट : 1 चम्मच
मक्के का आटा : 1 चम्मच
घी : 2 चम्मच
नमक : स्वादानुसार

विधि: चने के साग से कठोर तने और पुरानी पत्तियों को हटा दें। साग को धोकर बारीक काट लें। अब कटे हुए साग और दाल को हल्दी पाउडर, नमक, 1 चम्मच घी और 2 कप पानी के साथ प्रेशर कुकर में डाल दें। अब इसे करीब 10 मिनट यानी 5 सीटि यां आने तक पकाएं। अब कुकर खोलें, उसमें मिर्च, धनि या पाउडर और गरम मसाला डाल दें। फिर इसमें अदरक मिर्च का पेस्ट मिलाकर कुकर को दोबारा आंच पर चढ़ा दें, लेकि न ढक्कन को बंद न करें, खुला ही रहने दें। अब एक कप पानी में मक्के का आटा अच्छी तरह से मिलाएं। दाल जब तक गाढ़ी न हो जाए, इसे धीरे-धीरे मिलाते रहें। आखि र में तड़का पैन को आंच पर रखें और उसमें घी के साथ जीरा, हींग डाल दें और मसालों को चटकने दें। अब इसे दाल में डालकर तुरंत ढक्कन बंद कर दें। इसे अच्छी तरह से मिलाकर मक्के और बाजरा की रोटि यों के साथ परोसें।