Environment

गांधी, 21वीं सदी का पर्यावरणविद -5: नदियों में बढ़ती गंदगी से नाराज थे गांधी

गांधी ने नदी प्रदूषण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए मानव मल-मूत्र को नदियों में बहाने की बजाय उससे खाद तैयार करने पर जोर दिया था 

 
By Shubhneet Kaushik
Last Updated: Tuesday 01 October 2019
उपभोक्तावाद के खतरे
इलेस्ट्रेशन: तारिक अजीज इलेस्ट्रेशन: तारिक अजीज

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर डाउन टू अर्थ द्वारा श्रृखंला प्रकाशित की जा रही है। इस कड़ी में प्रस्तुत है बढ़ते उपभोक्तावाद, औद्योगिकीकरण, नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर गांधी के विचारों से रूबरू कराता विशेष लेख- 

महात्मा गांधी 1931 में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने जब इंग्लैंड पहुंचे, तब उनकी मुलाकात प्रसिद्ध अभिनेता चार्ली चैपलिन से हुई। 22 सितंबर 1931 को दोनों लंदन में केनिंगटाउन स्थित डॉ. कटियाल के घर पर मिले। गांधी, चैपलिन के नाम से परिचित नहीं थे, लेकिन चैपलिन को गांधी के कार्यों और विचारों में गहरी दिलचस्पी थी। इंग्लैंड की अर्थव्यवस्था के शोषक चरित्र के बारे में गांधी ने चैपलिन से कहा, “इंग्लैंड को बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण बाजार की तलाश रहती है। हम इसे शोषण कहते हैं और शोषक इंग्लैंड दुनिया के लिए खतरा है। यदि यह बात ठीक है तो सोचिए कि भारत जब मशीनों को अपनाकर अपनी आवश्यकताओं से कई गुना अधिक कपड़ा तैयार करने लगेगा तो वह कितना बड़ा खतरा होगा।”

चैपलिन से इस मुलाकात से तीन साल पूर्व “यंग इंडिया” में 20 दिसंबर 1928 को प्रकाशित एक चर्चा में भी महात्मा गांधी ने इसी बात पर जोर देते हुए कहा, “भगवान न करे कि भारत कभी पश्चिमी देशों के ढंग का औद्योगिक देश बने। अकेले इतने छोटे-से द्वीप (इंग्लैंड) का आर्थिक साम्राज्यवाद ही आज संसार को गुलाम बनाए हुए है। अगर 30 करोड़ की आबादी वाला हमारा समूचा राष्ट्र भी इसी प्रकार के आर्थिक शोषण में जुट गया तो वह सारे संसार पर एक टिड्डी दल की भांति छाकर उसे तबाह कर देगा।” यंग इंडिया में ही 7 अक्तूबर, 1926 को छपे एक लेख में महात्मा गांधी ने उस पत्र का जवाब दिया, जिसमें पत्र लिखने वाले ने लिखा था कि “हिंदुस्तान अब आधुनिक सभ्यता से जिसमें रेल, मशीनें और बड़े पैमाने पर उत्पादन शामिल है, बच नहीं सकता। इसलिए हिंदुस्तान को आधुनिक सभ्यता अपना लेनी चाहिए।” महात्मा गांधी ने अपने जवाब में कहा, “पत्र लिखने वाले सज्जन यह बात भूल जाते हैं कि हिंदुस्तान को अमेरिका और इंग्लैंड की तरह बनाने के लिए यह जरूरी है कि शोषण करने के लिए हम कोई अन्य जातियां और देश खोजें। जाहिर है कि अब तक पश्चिमी राष्ट्रों ने यूरोप के बाहर संसार के सभी देश शोषण के लिए आपस में बांट रखे हैं और यह भी स्पष्ट है कि अब खोजने के लिए कोई नए देश भी बाकी नहीं हैं।”

अंधाधुंध औद्योगिकीकरण का दुष्प्रभाव आज नदी, पहाड़, जंगल समेत समूची प्रकृति के ह्रास के रूप में हमारे सामने आ रहा है। उल्लेखनीय है कि बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भारत की नदियों में बढ़ती गंदगी और उनके प्रदूषण को लेकर जिन भारतीय नेताओं व विचारकों ने अपनी चिंता लगातार प्रकट की, उनमें महात्मा गांधी प्रमुख थे। 17 नवंबर 1929 को इलाहाबाद नगरपालिका व जिला बोर्ड द्वारा दिए गए मानपत्रों का उत्तर देते हुए महात्मा गांधी ने अपने भाषण में इलाहाबाद में नदियों में नालों का पानी डालने पर चिंता जाहिर की।

उन्होंने कहा “मुझे यह जानकर बड़ा धक्का लगा है कि हरिद्वार की तरह प्रयाग की पवित्र नदियां भी नगरपालिका के गंदे नालों के पानी से अपवित्र की जा रही हैं। इस खबर से मुझे अत्यंत दुख हुआ है। इस प्रकार बोर्ड पवित्र नदियों के पानी को गंदा ही नहीं करता बल्कि हजारों रुपया नदी में फेंकता है। नालियों के पानी को लाभप्रद ढंग से अन्यथा उपयोग किया जा सकता है। इस संबंध में कुछ कर सकने में बोर्ड की असमर्थता देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य होता है।”

1929 में ही यंग इंडिया में प्रकाशित अपने एक लेख में गांधी ने हरिद्वार में गंगा के प्रदूषण पर गहरा दुख प्रकट किया। गांधी ने धर्म और विज्ञान दोनों ही दृष्टि से नदियों को गंदा करने पर मनाही की बात कही। उन्होंने लिखा, “लोगों का ऐसा करना प्रकृति, आरोग्य तथा धर्म के नियमों का उल्लंघन करना है।” मानव मल-मूत्र को नदियों में बहाने की बजाय उससे खाद तैयार करने पर भी गांधी ने जोर दिया। दिसंबर 1926 में यंग इंडिया में छपी एक टिप्पणी में नदियों में बढ़ती गंदगी की चर्चा करते हुए गांधी ने लिखा, “आधुनिक व्यस्त जीवन में तो हमारे लिए इन नदियों का मुख्य उपयोग यही है कि हम उनमें गंदी नालियां छोड़ते हैं और माल से भरी नौकाएं चलाते हैं। हम इन कार्यों से इन नदियों को मलिन से मलिनतर बनाते चले जा रहे हैं।”

गांधी ने उद्योगवाद और उपभोक्तावाद की संस्कृति का पुरजोर विरोध किया क्योंकि वह इनके खबरों से परिचित थे। अपने दूसरे समकालीनों की तरह गांधी ने औद्योगिकीकरण को अपरिहार्य ऐतिहासिक आवश्यकता नहीं माना। “सादा जीवन, उच्च विचार” दर्शन पर यकीन करने वाले गांधी आज इक्कीसवीं सदी के विश्व के सामने अंधाधुंध और अविवेकी औद्योगिकीकरण के बरक्स एक वैकल्पिक रास्ता खोलते हैं, और वह रास्ता है स्थायी समाज-व्यवस्था का। जल संकट, पर्यावरण संकट व प्रदूषण के भयावह खतरों से जूझती हुई दुनिया को यदि अपने अस्तित्व को बचाना है, तो आज उसे गांधी के दर्शन और विचार को अपनाना ही होगा।

(लेखक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

Subscribe to Weekly Newsletter :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.

  • बहुत शानदार व ज्ञानवर्धक लेख शुभनित।

    Posted by: Rajaram Yadav | one month ago | Reply