Climate Change

उत्तराखंड के हर्षिल सेब को लगी बीमारी, 80 प्रतिशत सेब खराब

राज्य सरकार किसानों का दर्द समझने की बजाय आयोजित कर रही सेब महोत्सव राज्य की सबसे बड़ी सेब पट्टी हर्षिल में किसानों के बगीचे बीमारी की चपेट में आ चुकी है 

 
Last Updated: Friday 18 October 2019
उत्तराखंड के हर्षिल में बीमारी लगने से सेब खराब हो गए हैं। फोटो: मनमीत सिंह
उत्तराखंड के हर्षिल में बीमारी लगने से सेब खराब हो गए हैं। फोटो: मनमीत सिंह उत्तराखंड के हर्षिल में बीमारी लगने से सेब खराब हो गए हैं। फोटो: मनमीत सिंह

मनमीत सिंह

उत्तराखंड में सेब के काश्तकारों को भारी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है। लगभग छह माह पूर्व उद्यान निदेशालय ने संभावना जताई थी कि इस बार राज्य में सेब का उत्पादन 25 फीसदी ज्यादा होगा, लेकिन ये संभावना अक्टूबर माह आते ही धरी रह गई। राज्य की सबसे बड़ी सेब पट्टी हर्षिल और उससे लगते नौ गांवों में काश्तकारों का पचास फीसद सेब स्कब बीमारी की चपेट में आ गया है। वक्त से पहले सेब के पेड़ों से पत्ते झड़ गये और उसके बाद जब अक्टूबर में सेब तोडऩे की बारी आई तो उनमें गंभीर बीमारी पाई गई। मंडी व्यापारियों ने सेब लेने से हाथ खड़े कर दिये हैं। काश्तकारों के बीच नाराजगी है कि जो दवा सरकार ने वितरित करवाई थी, वो मिलावटी निकली।

उत्तराखंड में पिछले साल तक 62,407 मीट्रिक टन सेब उत्पादन हुआ था, लेकिन इस बार अस्सी हजार मीट्रिक टन पैदावार की उम्मीद थी। यानी राज्य में अभी तक के उत्पादन में इस बार सेब का उत्पादन लगभग 25 फीसद ज्यादा था। वहीं कश्मीर में अनुच्छेद ३७० लगने के बाद से सबसे बड़े उत्पादक राज्य से सेब आना बंद हो गया।

काश्तकारों को इस बार उम्मीद थी कि उनका रॉयल डिलिसियस का ज्यादा उत्पादन इस बार कुछ हद तक कश्मीर के रेड डिलिसियस को टक्कर दे सकता है। लेकिन सितंबर में मानसून की विदाई के दौरान औसत से ज्यादा बारिश होने से हर्षिल, मुखवा, दराली, बगोरी, झाला, जसपुर, पुराली और सुखी गांव में सेब के पेड़ों में नमी आ गई। जिससे सितंबर आखिरी में अचानक पेड़ों से सभी पत्ते झड़ गये और अक्टूबर शुरूआत में जब सेब तोड़ने का वक्त था। उस वक्त सेबों में स्केब (एक तरह की फफूंद) लग गई। जिससे किसानों की खड़ी फसल बर्बाद हो गई। यह बीमारी 11 साल पहले भी हर्षिल के सेबों में लगी थी, लेकिन तब इतना असर नहीं हुआ था।

मुखवा गांव के काश्तकार सोमेश सेमवाल बताते हैं कि उनकी अस्सी फीसद फसल चौपट हो गई है। इस फसल से उनकी अजीविका चलनी थी। लेकिन अब मुश्किल हालातों का सामाना करना होगा। सेमवाल बताते हैं कि उद्यान विभाग ने जो दवा दी थी, वो बेकार निकली। समस्या ये भी है कि जो कर्मचारी उद्यान विभाग की तरफ से आते हैं वो प्रशिक्षित नहीं होते। इसलिये उनसे हमें कोई तकनीकी फायदा नहीं मिलता।

दराली गांव के काश्तकार और कनिष्ठ ब्लॉक प्रमुख संजय सिंह पंवार बताते हैं कि उनकी पचास फीसद खड़ी फसल चौपट हो गई है। पंवार बताते हैं कि उद्यान विभाग की तरफ से दी गई दवा मिलावटी थी। जिससे हमारी फसल बर्बाद हो गई। जबकि जो काश्तकार हिमाचल और देहरादून से दवा लेकर आये। उनकी फसल सलामत है। लेकिन एेसे काश्तकार बहुत कम है।

झाला में स्थित 12,000 मीट्रिक टन क्षमता वाले कोल्ड स्टोरेज के कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इस बार यहां कम सेब आ रहे हैं। कई काश्तकारों ने सेब नहीं भेजे है। उन्होंने बताया है कि उनका सेब खराब हो गया है।

स्थानीय काश्तकार सोमेश्वर सेमवाल बताते हैं कि हमारे परिवार की अकेले दस हजार पेटी होनी थी। हर पेटी एक हजार रुपये में बिकती। लेकिन मंडी वाले अब खरीदने को तैयार ही नहीं है। उनका कहना है कि सेब में बीमारी है। पहले सरकार खराब सेब को खरीद लेती थी। जिससे बाद में जेम या चटनी बनाई जाती थी।

बीमारी लगने के कारण पेड़ों के पत्ते झड़ गए हैं। फोटो: मनमीत सिंह

काश्तकार चाहते हैं कि सरकार उनका सेब खरीदे और जो कंपनी फूड प्रोसेसिंग का काम करती है। उन्हें बेच दे। सरकार ये काम कर सकती है। काश्तकार के लिये ये मुश्किल है। उद्यान विभाग के निदेशक आरसी श्रीवास्तव बताते हैं कि विभाग ने पूरे हर्षिल फल पट्टी में दवा वितरित कराई थी। अगर दवा में मिलावट की शिकायतें आ रही हैं तो इसकी जांच होगी।

23 और 24 को हर्षिल में सेब महोत्सव
राज्य सरकार 23 और 24 अक्टूबर को हर्षिल में सेब महोत्सव आयोजित करने जा रही है। जिसके लिये देश भर में इसका प्रचार किया जा रहा है। खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ङ्क्षसह रावत और आला नौकरशाह इस महोत्सव में शामिल होंगे। लेकिन स्थानीय काश्तकार कह रहा है कि ये सब उनके साथ मजाक जैसा है। हमारी खड़ी फसल खराब हो गई और सरकार सेब महोत्सव बना रही है। स्थानीय काश्तकारों ने बताया कि वो महोत्सव में जाकर मुख्यमंत्री के समक्ष सच्चाई पेश करेंगे और मुआवजे की मांग करेंगे।

सेब में उत्तराखंड का तीसरा नंबर
भारत में तीन राज्यों में सेब का उत्पादन होता है। इसमें कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड है। नॉथ ईस्ट के भी कुछ राज्यों में सेब होता है, लेकिन वो बहुत कम है। कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में भी सबसे ज्यादा सेब जम्मू कश्मीर में होता है। भारत का कुल 24 लाख टन सेब उत्पादन का साठ फीसद कश्मीर में होता है। उसके बाद हिमाचल का नंबर आता है। जहां हर साल ढाई करोड़ पेटी सेब देश और विदेश की मंडियों में जाता रहा है। उसके बाद उत्तराखंड हैं। जहां मुख्य रूप से चार जिलों देहरादून, उत्तरकाशी, अल्मोड़ा और नैनीताल में सेब के बगीचे हैं। इनमें सबसे ज्यादा उत्तरकाशी की हर्षिल सेब पट्टी है।

जिला-------क्षेत्रफल--------उत्पादन

उत्तरकाशी---9372.59-------20529

अल्मोड़ा----------1577------14137

नैनीताल----------1242--------9066

देहरादून-----------4799--------7342
चमोली------------1064--------3354

पौड़ी----------------1123---------3057

पिथौरागढ़----------1600-------3012

टिहरी----------3820.34----1910

-क्षेत्रफल हेक्टेयर और उत्पादन मीट्रिक टन में, आकंड़ा 2018 )

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