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बजट 2020-21: आवंटन में बिना इजाफे के कैसे बढ़ेगा आयुष्मान भारत

वित्त मंत्री ने सामाजिक व आर्थिक रूप से कमजोर जिलों में पीएमजेएवाई को बढ़ावा देने के लिए पीपीपी मॉडल की घोषणा की, लेकिन निजी अस्पतालों को रुचि नहीं  

By Banjot Kaur

On: Saturday 01 February 2020
 
Photo: Vikas Choudhary
Photo: Vikas Choudhary Photo: Vikas Choudhary

एक फरवरी को पेश किए गए आम बजट में सरकार ने अपनी महात्वाकांक्षी प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना-आयुष्मान भारत (पीएमजेएवाई) के लिए फंड आवंटन में किसी तरह का इजाफा नहीं किया है। वित्त वर्ष 2019-2020 में इस योजना के लिए 64000 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। वित्त वर्ष 2020-2021 के लिए भी इतनी ही राशि आवंटित हुई है।

पीएमजेवाई के अंतर्गत योजना के लाभार्थियों को 5 लाख रुपए तक का बीमा मिलता है और साल 2022 तक इस योजना के तहत 1.5 लाख हेल्थ व वेलनेस सेंटर (एचडब्ल्यूसी) स्थापित किया जाना है। अब तक 28000 सेंटर स्थापित हो चुके हैं।

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष के. श्रीनाथ रेड्डी का अनुमान है कि अगर ये स्कीम पूरी तरह से लागू हो जाए, तो इसके लिए पिछले वित्त वर्ष के आवंटन की तुलना में 10 गुना अधिक फंड की जरूरत पड़ेगी। स्वास्थ्य अर्थशास्त्री शक्ति सेलेवाराज ने डाउन टू अर्थ को बताया, “इस स्कीम के लिए आवंटित फंड का इस्तेमाल बहुत कम रहा है और सरकार ये समझ रही है। शायद ये एक वजह हो सकती है।”

सच बात तो ये है कि नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के नीति दस्तावेज में इस स्कीम के लिए आवंटित फंड के इस्तेमाल में खामियों को उजागर किया गया है। खासकर वे राज्य जो ज्यादा गरीब हैं, वहां फंड का बेहतर इस्तेमाल होना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

नीति दस्तावेज में लिखा गया है, “जिन राज्यों में ज्यादा गरीबी है , वहां बहुत कम दावे आए। बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में गरीबी ज्यादा है, लेकिन फंड का इस्तेमाल कम हुआ। समृद्ध राज्य केरल में भारत में सबसे ज्यादा फंड का इस्तेमाल किया गया।”

जिन राज्यों में कम गरीबी है, उन राज्यों में पीएमजीएवाई स्कीम के फंड का अधिक इस्तेमाल हुआ। नागालैंड में गरीबी कम है और यहां अधिक दावे निबटाए गए. इसी तरह गुजरात में तुलनात्मक रूप से कम गरीबी है, जबकि वहां अब तक प्रति लाभार्थी अधिक खर्च किया गया।

हालांकि, ये विपरित संबंध अत्यधिक गरीबी और कम दावे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बीमारी के अधिक दबाव में भी देखा जा सकता है। जिन राज्यों पर बीमारियों का ज्यादा बोझ है, वहां फंड का कम इस्तेमाल हुआ है।

जिन राज्यों पर बीमारियों का अत्यधिक बोझ है, वहां इस स्कीम के तहत आवंटित फंड का इस्तेमाल कम हुआ है। नीतिगत रूप से देखें, तो फंड का अधिक इस्तेमाल लंबी अवधि में राज्यों पर बीमारियों का बोझ कम करने में मदद कर सकता है, लेकिन ये राज्य में इस स्कीम का दोहन नहीं कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर बिहार, उत्तर प्रदेश और असम को लिया जा सकता है। इन राज्यों पर बीमारियों का बोझ ज्यादा है, लेकिन दूसरे राज्यों की अपेक्षा इन राज्यों में इस स्कीम का इस्तेमाल बहुत कम हुआ।

नीति दस्तावेज में साफ तौर पर लिखा गया है कि जहां स्कीम की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वहां ही ये बेटपरी हो गई। दस्तावेज कहते हैं, “संक्षेप में आर्थिक जोखिम से राहत और स्वास्थ्य में सुधार दोनों की जरूरतों के मद्देनजर भी जरूरतमंद राज्यों में पीएमजेएवाई लागू करने के पहले साल इसके इस्तेमाल में कमी रही।”

वित्तमंत्री निर्मला सीतारामण ने भी अपने बजट भाषण में कहा कि बहुत सारे सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े जिलों में एक भी अस्पताल इस स्कीम में सूचीबद्ध नहीं है। भारत में 115 ऐसे जिले हैं, जिनका सामाजिक-आर्थिक सूचक अन्य जिलों की तुलना में बेहद दयनीय हैं, इसलिए इन जिलों को प्राथमिकता दी जाएगी।

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा, निजी व सार्वजनिक साझेदारी से अस्पताल बनाने के लिए वायब्लिटी गैप फंडिग विंडो स्थापित करने का प्रस्ताव दिया जाता है। पहले चरण में उन जिलों को शामिल किया जाएगा, जहां आयुष्मान स्कीम से एक भी अस्पताल सूचीबद्ध नहीं है।

हालांकि, सरकार प्रायोजित एक शोध पत्र में कहा गया है कि पिछड़े जिलों के निजी अस्पताल आयुष्मान स्कीम में खुद को सूचीबद्ध करने के इच्छुक नहीं हैं।

शोध पत्र में लिखा गया है, “9 राज्यों के किसी भी पिछड़े जिले में निजी अस्पताल सूचीबद्ध नहीं हैं। इसमें विशेषज्ञता में बड़ी असमानता साफ दिखती है। तृत्तीयक देखभाल (टर्शियरी केयर) के मामले में पिछड़े जिलों में अस्पतालों की तरफ से सेवा देने की हिस्सेदारी अन्य जिलों की तुलना में आधे से भी कम है।”

शोध पत्र में ये भी लिखा गया है कि सामान्य जिलों के बनिस्पत पिछड़े जिलों में निजी अस्पतालों की दिलचस्पी कम रही है।

शोधपत्र के अनुसार, महाराष्ट्र और उत्तराखंड को छोड़ कर सभी राज्यों के पिछड़े जिलों के निजी अस्पताल में सबसे ज्यादा भर्ती होती है। जबकि झारखंड को छोड़कर देश के सभी राज्यों के पिछड़े जिलों में औसत दावा कम रहा