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जर्दायुक्त मसाला और भारत में बचपन

अध्ययन से पता चला कि वंचित तबकों के लगभग 325 परिवारों वाले दो गांवों में एक साल में 50 लाख रुपये जर्दे, पान मसाले, बीड़ी व शराब पर खर्च किये जाते हैं 

By Sachin Kumar Jain

On: Friday 06 December 2019
 

 

राजस्थान के शुभग्रा (बदला हुआ नाम) गांंव में रामनिवास की दुकान है। और दूसरी दुकानों की तरह यहांं रंगबिरंगी खाद्य सामग्री के पाउच थे, जो प्रायः बच्चे खाते है जिसमेंं बिस्किट, कुरकुरे, स्थानीय चिप्स, और फ्रायम्स थे, ये सभी वस्तुएं एक रूपये से लेकर पांच रूपये तक उपलब्ध है और इनकी बहुत बिक्री होती है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात हमें गुटखा-तम्बाखू के बारे में लगी, जब पूछा तो पता चला कि विमल के अलावा भी तीन प्रकार के जर्दा पाउच उपलब्ध हैं और इनका बहुतायत में प्रयोग लोगों के साथ बच्चे कर रहे है। थोड़ा विस्तार से बात करने पर पता चला कि ब्रजमोहन की दुकान से रोज 900 रूपये के पाउच विमल और जर्दे के बिक जाते हैं। ज्यादातर बच्चे, किशोर और युवा भी इसका सेवन करते है, गांव में इस तरह की छह और दुकानें हैं जहां लगभग इसी मात्रा में शराब, विमल और जर्दे के पाउच बिकते हैं। यानी 1150 की आबादी वाले गांव 5940 रुपया गुटखा पाउच और नशे पर खर्च करता है।

यह बात भी उभर कर आती है कि बाजार में सहजता से और कानूनी तौर पर उपलब्ध पान मसालों और तम्बाकू का उपयोग वयस्क सहजता के साथ करते हैं और उन्हें इस बात का अहसास नहीं होता है कि उनकी इस लत का बच्चों के ऊपर गहरा असर पड़ रहा है। बच्चे अपने माता-पिता के पैकेट में से लेकर मसाला खाना शुरू कर देते हैं। जब लत लगने लगती है, तब बच्चे घर से ही सामान उठा कर गुटके से अदला बदली करने लगते हैं। गुटखा खाने से भूख खत्म होती है और इस तरह से समुदाय अपने बच्चों की भूख तो मिटा नहीं सकता पर गुटखे के रास्ते से भूख को धीरे-धीरे खत्म कर देता है।

गांव की दुकानों पर अधिकांश बच्चे गुटखा और पाउच नगद खरीदते हैं कभी मां के लिए, कभी जीजा के लिए, कभी दीदी के लिए और साथ में अपने लिए वे एक चाकलेट या मिठाई या छोटू-मोटू चिप्स ले लेते हैं। नौ-दस साल का किशोर बच्चा आमतौर पर दस का नोट लेकर आता है और दो विमल लेकर पूरे आत्मविश्वास से चला जाता है। लडकियां भी कम नहीं है वे भी गुटखा खाती है। जब जेब में रुपया नही होता तो घर से आठ नौ सौ ग्राम गेहूं लेकर दुकान पर आ जाते है जो ब्रजमोहन बारह रूपये प्रति किलो खरीदते है और तेरह से चौदह रूपये किलो बेचते है। मजेदार यह है कि बच्चे घर में कई बार बल्कि अक्सर घर में किसी से पूछते नहीं है और घर से गेहूं उठा लाते है गुटखे के लिए, जोकि बहुत ही चिंताजनक व्यवहार है। जब अभिभावकों से पूछा तो बोले कि जब हम सभी काम पर चले जाते हैं तो बच्चे अक्सर यह करते है हम कैसे रोक लगाएं?

प्रयत्न संस्था के सामाजिक कार्यकर्ता ताराचंद जी बताते हैं कि “हाल ही में गांव की मां वाड़ी के सामने सन 1955-56 में खोदा गया कुआं पूर दिया गया क्योकि एक माह पूर्व एक जवान लड़ाका शराब पीकर इसमे गिर गया। कुआं पूर दिया गया, पर शराब बंद न की जा सकी। लोगों ने बताया कि बदहाली, गरीबी और सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा के दबाव में शराब पीकर लोग आते है और घर में जाकर झगड़ा करते है, बाद में कुएं में कूद जाने की धमकी देते हैं और कुछ वास्तव में भी कूद जाते हैं। यहां लोगों ने पहल की और गैर-कानूनी तरीके से बिकने वाली शराब पर रोक लगा ली, तस्वीर का दूसरा पहलू अब भी दुखद है। लोग करीबी कस्बे शाहबाद से शराब पीकर आने लगे।“

राजस्थान में कहीं सहरियाओं की एक बस्ती है गरारा (बदला हुआ नाम)। लगभग 86 परिवार और 350 लोग रहते हैं इस बस्ती में। बच्चों की स्थिति को जानने और समुदाय को समझने की इच्छा इस बस्ती तक ले गयी। अक्सर हम बच्चों में कुपोषण, चेचक, पोषण आहार, शिक्षा के अधिकार सरीखे मुद्दों पर लड़ते-बहसबाजी करते रहे हैं। दो दशक गुजर गए। बहुत कुछ देखा, जो देखा उसे आधार पर दृष्टिकोण और नजरिए बनाए। इस मर्तबा गरारा में जो देखा, वह झकझोरने वाला था। लोगों से बातचीत करने के लिए हम गांव के लोगों के एक समूह में बैठे थे। एक नजारा देखा। समूह में बैठे एक सदस्य शिवराम ने पान मसाले की एक पुडिया फाड़ी। उसमें से पान मसाला अपनी हथेली पर रखा। एक दूसरी छोटी पुडिया खोली, उसमें से मसला हुआ जर्दा निकाल कर पान मसाले में अच्छे से मिला दिया। शिवराम के साथ उसका पांच-छह साल का लड़का भी बैठा था। शिवराम की हथेली में से उसने भी एक चुटकी ली और मुंह में डाल ली। वहां बैठे लगभग सभी लोगों ने देखा, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

तम्बाकू के नशे का अर्थशास्त्र

नशा भी हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बड़ा योगदान करता है। सब जीडीपी को बढ़ता देख कर खुश होते हैं। इसका मतलब है कि उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि बच्चे नशे, बीमारी और असुरक्षा के कितने खतरनाक चक्र में फंस रहे हैं?

हम ग्रामीण बस्ती में दिनेश की किराना दुकान पर पंहुचे, जिसे खुले एक महीना भी नहीं हुआ है। दिनेश की दुकान में बिस्कुट, गेहूं, नमकीन, टोस्ट के कुछ-कुछ पैकेट रखे हुए हैं। स्थानीय बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था का अध्ययन करने के मकसद से हम वहां पंहुचे थे। दिनेश ने जी बताया वह चौंका देने वाला था। अपनी इस नयी दुकान से वह हर रोज लगभग 70 पैकेट तम्बाकू सहित पान मसाला बेचते हैं। खाने के तेल, टोस्ट, बिस्कुट की कुल बिक्री 200 रुपये की पर पान मसाले की बिक्री 600 रुपये की। यहां 20 साल का युवा सुखराम की भी दुकान है। थोड़ी बड़ी है। सुखराम दिन में 220 पान मसाला पाउच बेचता है। इस तरह गरारा गांव में स्थित चार छोटी-छोटी दुकानें एक दिन में लगभग 425 पान मसाले के पाउच बेंच रही हैं। यह एक काल्पनिक संख्या नहीं है। 12 साल का सुनील भी मुंह में मसाला दबाये दुकान पर खड़ा था, और तभी लगभग 8 साल की लक्ष्मी भी सुखराम की दुकान पर आई और 10 रुपये देकर विमल के दो पाउच लिए। जरा गौर से देखने पर पता चला कि उसके मुंह में भी मसाला भरा हुआ है। तभी लगभग 7-8 साल का रवि आया। उसने गमछे में गेहूं बांध रखा था। पोटली लाया और सुखराम की दुकान के तराजू में उड़ेल दिया। सवा किलो गेहूं की कीमत 15 रुपये हुई। इस राशि के बदले रवि ने विमल मसाले के जर्दे के साथ तीन पैकेट लिए। जब हमने पूछा कि ये गेहूं किसने दिए तो वह थोडा शरमाया। धीरे से बोला कि मां से पूछा था, जबकि गांव की महिला रामवती बाई कहती हैं कि जब हम घर से काम के लिए बाहर निकलते हैं तो बच्चे चुपचाप से घर का गेहूं यूं ही बेंच कर विमल खरीद लेते हैं। चूंकि भारत में छोटे बच्चों की देखरेख के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं यानी प्रारंभिक बाल विकास केंद्र नहीं हैं, इसलिए बच्चों के नशे के जाल में फंसने का भी बड़ा खतरा बना हुआ है।

आर्थिक रूप से गरीब माने गए 350 लोगों की इस बस्ती में एक दिन में जर्दा युक्त पान मसाले के लगभग 425 पाउच बिकते हैं, जिनकी कीमत होती है लगभग 2100 रुपये। बात यहीं खत्म नहीं होती है। इस छोटे से गांव में तीन दुकानों से लगभग शराब की छोटे आकार की 45 रुपये की कीमत की औसतन 120 बोतलें बिकती हैं।  गणित का छोटा सा हिसाब लगाने से पता चला कि गरारा बस्ती में हर रोज औसतन 8000 रुपये के पान मसाले, गुटके और मदिरा (सालाना लगभग 28.80 लाख रुपये) खरीदे-बेचे जाते हैं। एक गांव, जिसमें एक परिवार की सभी स्रोतों से सालाना आय लगभग 50 से 70 हजार रुपये होती है, वहां लगभग 9 से 12 हजार रुपये की शराब और तम्बाकू का इस्तेमाल हो जाता है। कुछ परिवारों में यह खर्चा 20 हजार रुपये तक होता है। यह जरूरी नहीं कि उनके पास नकद राशि हो, वे उधारी का खाता भी चलाते हैं और जब खेती या मजदूरी या पत्थर की ट्राली से आय होती है, तब वे इसके लिए बड़ी राशि चुकाते हैं। नशे के लिए शोषण भी हो रहा है और बच्चे स्कूल जाने के बजाये मजदूरी की तलाश करते हैं, ताकि कुछ रुपये कमा सकें।

एक और गांव है शुभ्ग्रा (बदला हुआ नाम)। यहां 4-5 साल पहले इतनी शराब बिकती थी कि लोगों में झगडे़ हुए, युवक गांव के कुएं में गिर गए। मौतें हुईं, तब लोगों नें गांव शराब बिकना बंद करवा दी, पर अब जिन्हें पीना होती है, वे पास के कसबे की सेवाएं पा लेते हैं। यहां कोई 264 परिवार रहते हैं। गांव में किराने की छह दुकानें हैं। ये मिलकर जर्दा मसाले के हर रोज लगभग 590 पाउच बेचते हैं। एक युवा दुकानदार किशन बताता है कि यहां तो 5 साल का बच्चा भी विमल खाता है। जब माता-पिता-चाचा-ताऊ-ताई सभी खाते हैं, तो बच्चे कितने दिन बच सकते हैं। उन्हें यह लत लगाई जा रही है। लोगों को लगता है कि जर्दे का सुरूर एक किस्म का आनंद है और यह आनंद बच्चों को भी मिलना चाहिए; जबकि वास्तविकता यह है कि जर्दे वाले मसाले से बच्चों को नशा हो जाता है और उनकी भूख दब जाती है। पान मसाले के इस बुरे असर से हर व्यक्ति वाकिफ है, और वे एक रणनीति के तहत इसका उपयोग करते हैं ताकि बच्चे उनके कामों में बाधा पैदा न करें। बच्चों की शिथिलता उन्हें सहूलियत देती है। गांव का लगभग हर दूसरा बच्चा कुपोषित है। अध्ययन के दौरान यह जानकर हम भौचक्क थे कि यह गांव हर रोज लगभग 6 हजार रुपये (लगभग 21 लाख रुपये सालाना) पान मसाले और शराब सहित सभी तरह के नशे पर खर्च करता है।

मौजूदा स्थिति में वह नशे को अपनी सीमाओं को लांघने का माध्यम मानने लगा है। रोजगार का अभाव है, बारिश नहीं हुई, तो खेत सूखे हैं, उसके हिस्से का राशन भ्रष्टाचार में चला जा रहा है, उसके नाम पर किसी और व्यक्ति ने किसान क्रेडिट कार्ड बनवाकर 40-50 हजार रुपये का ऋण निकाल लिया है, बीमारी पर अब खूब खर्चा हो रहा है; इन स्थितियों में उसनें नशे को अपना लिया है, क्योंकि यही विकल्प उन्हें उपलब्ध करवाया गया है।

यह बहुत विरोधाभासी स्थिति है। ये दो ऐसे गांव हैं, जहां के रहवासी गरीबी में हैं पर एक साल में लगभग 50 लाख रुपये नशे पर खर्च कर रहे हैं। यह राशि शोषण, कर्जे, भोजन और जरूरी सेवाओं पर व्यय में कटौती, छोटे-मोटे अपराध करके जुटाई जाती है, जबकि कुपोषण दूर कर पाने में उपयोगी दाल, सब्जियों, अण्डों और मांसाहार पर सभी स्रोतों से ये दो गांव सालाना 14 लाख रुपये का खर्चा करते हैं।

भारत की नशायुक्त व्यवस्था

अपने यहां भारत सरकार ने तम्बाकू बोर्ड बनाया हुआ है क्योंकि हम बहुत सारा तम्बाकू उगाते हैं। इस बोर्ड के मुताबिक सरकार को इससे 20 हजार करोड़ रुपये की आय होती है, 5 हजार करोड़ की विदेशी मुद्रा भी मिलती है। सब जानते हैं कि तम्बाकू जहर है, जीवन लील जाता है। बच्चों के नाजुक मुंह और खाने की नली को आसानी से कैंसर की चपेट में ले सकता है; फिर भी समाज जहर की इस पुड़िया को खोल कर बच्चों को परोस रहा है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, तम्बाकू से होने वाली बीमारियों के इलाज पर लगभग 1040 अरब रुपये खर्च होते हैं।

इन्डियन पीडियाट्रिक्स में दिल्ली में स्कूल जाने वाले बच्चों में में तम्बाकू के उपयोग पर किये गए एक अध्ययन से पता चला कि अध्ययन के वक्त 10 से 18 साल की उम्र के 5.4 प्रतिशत बच्चे तम्बाकू का उपयोग कर रहे थे और उन्होंने 12.2 साल की उम्र में इसका सेवन शुरू किया था। 84 प्रतिशत बच्चों को आसानी से बाजार में यह उपलब्ध हो रहा था; ताजा अध्ययन "ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे (2009-10)" के मुताबिक़ भारत में 15 साल या इससे ज्यादा उम्र के एक तिहाई लोग तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं। इस वर्ग में 47.9 प्रतिशत पुरुष और 20.3 प्रतिशत महिलायें हैं।

जिन गावों में हम गए वहां तो 4 साल की उम्र से जर्दा मसाला खाना शुरू कर दिया जा रहा है और 11-12 साल की उम्र के लगभग 85 फीसदी बच्चे नियमित रूप से हर रोज दो पाउच यानी 10 ग्राम मसाला खा रहे हैं, जो उनके मुंह में लगभग 100 मिनिट तक रहता है जबकि नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ के मुताबिक, मुंह में 30 मिनिट तम्बाकू रखना 3 सिगरेट पीने के बराबर का असर दिखाता है।

सरकार ने नीति बना दी है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों को तम्बाकू और धूम्रपान की सामग्री नहीं बेचीं जायेगी, पर राजस्थान के गावों में इसकी निगरानी कौन करेगा? इन दोनों गावों में हमनें पान मसाले के पाउच पर छपे चित्र के बारे में पूछा; सब जानते हैं कि इससे कैंसर होता है और दांत-मसूड़े खराब होते है; पर 11 साल का किशोर कहता है कि इसे खाए बिना भूख नी लगती है; इसे खाने से अच्छा लगता है; इसके लिए पैसे कहां से मिलते हैं; 14 साल का सुनील गांव के पास के जंगल में पत्थर तोड़कर ट्राली में भरता है। इसके एवज में उसे लगभग 120 रुपये मिल जाते हैं। परिजन भी उसे "श्रम" करने से नहीं रोकते हैं क्योंकि वह अपने खर्चे के लिए खुद आय अर्जित कर रहा है। कैंसर के जाल में फंसाने के साथ साथ आसानी से हर तरफ उपलब्ध यह नशा बच्चों को "अनावश्यक श्रम" की तरफ भी ले जा रहा है और शिक्षा से भी दूर कर रहा है।  इसका उपाय इतना सहज है कि मैं बताना नहीं चाहता। आप भी सोचिये!

आखिर में एक सूचना - भारत में वर्ष 1990 में मुंह के कैसर के 55480 मामले हुए थे, जो वर्ष 2013 में दो गुने से ज्यादा बढ़कर 127,168 हो गए। हर एक लाख लोगों में से 20 को मुंह का कैंसर होता है। इनमें से 90 प्रतिशत का कारण तम्बाकू होता है। हर एक घंटे में 5 लोगों की इसके कारण मौत होती है। भारत में पूरे मामले दर्ज नहीं होते हैं, इसलिए प्रभावितों और मरने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है।