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“भारत को तत्काल कुपोषण मूल्यांकन की आवश्यकता है”

दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ में सहायक प्रोफेसर विलियम जो और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (यूएस) में प्रोफेसर एसवी सुब्रमणियन ने कोविड19 के दौरान कुपोषण के जोखिम पर एक शोधपत्र तैयार किया है। उनका मानना है कि देश में कुपोषण को दूर करने की रणनीति बनाए जाने की आवश्यकता है। इस संबंध में डाउन टू अर्थ ने उनसे बातचीत की

On: Thursday 05 November 2020
 

आपके शोध में कहा गया है कि बच्चे कुपोषण की दहलीज पर खड़े हैं। क्या आपको लगता है कि हमें उनकी आबादी पर ताजा आंकड़ों की आवश्यकता है?

अभी हमारे पास 2016 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) द्वारा उपलब्ध कराए गए बच्चों की ऊंचाई/ वजन के आंकड़े हैं। अतः पोषण की स्थिति का तत्काल तेजी से मूल्यांकन किए जाने की आवश्यकता है। यहां हम यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि पोषण संबंधी विफलताओं के पारंपरिक परिणाम वर्गीकरण पर आधारित हैं। वे “कट ऑफ” रेखा के ठीक ऊपर या नीचे स्थित बच्चों के स्वास्थ्य का अनुमान लगाने में विफल रहते हैं। हमें समझना होगा कि यह छोटा सा “शॉक” किसी बच्चे को चिकित्सकीय रूप से कुपोषित श्रेणी में भेज सकता है। हमने पुराने एनएफएचएस डेटा का उपयोग किया है लेकिन यदि स्वास्थ्य, आर्थिक और खाद्य प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ा तो वास्तविक स्थिति अधिक गंभीर हो सकती है। इसी तरह का मुद्दा गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों के लिए भी लागू होता है। इसलिए, नीतिगत स्तर पर तेजी से सर्वेक्षण और मूल्यांकन के माध्यम से इन बच्चों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

क्या वर्तमान काेविड-19 संकट और लॉकडाउन इन बच्चों को और अधिक खतरे में डाल देगा?

गरीब परिवारों के बच्चों के बीच वर्तमान समय में कुपोषण का खतरा अधिक है। ऐसा आर्थिक गतिविधियों (मुख्यतः श्रम आधारित) में आई गिरावट की वजह से है जो अचानक लगाए गए लॉकडाउन के फलस्वरूप हुआ है। यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रीय लॉकडाउन रणनीति कोविड-19 को शामिल करने में प्रभावी थी भी या नहीं। लेकिन यह स्पष्ट है कि इस रणनीति के परिणामस्वरूप एक समाज के रूप में हमने जानमाल की भारी हानि सही है और मरने वालों में कमजोर लोग और बच्चे अधिक संख्या में हैं।

लॉकडाउन ने सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों में अचानक रुकावट पैदा कर दी है, इनमें मुख्यतः स्कूलों में मिलने वाला मिड-डे मील हो या आंगनवाड़ी केंद्रों में गर्म पकाया भोजन हो या इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज के तहत अन्य पूरक पोषण कार्यक्रम हो। देश के कई परिवार इन कार्यक्रमों पर आश्रित थे, यह कहना गलत नहीं होगा। स्पष्ट रूप से, वैसे घरों के बच्चे जो सामान्य दिनों में भी किसी तरह गुजर-बसर करते हैं, उनके सामान्य आहार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा और इसलिए उनका वजन कम होगा। सेवाओं को फिर से शुरू किया जा रहा है लेकिन प्री-लॉकडाउन स्तरों को फिर से प्राप्त करने में कुछ समय लग सकता है। लेकिन, आमतौर पर यह कहा जा सकता है कि ये बच्चे सामान्य समय में भी उच्च जोखिम की स्थिति में होते हैं। इस संबंध में जैसा कि अध्ययन में उल्लेख किया गया है, हम इस तथ्य पर जोर देना चाहेंगे कि ऐसे बच्चों की संख्या (मानक कट ऑफ के आसपास) सामान्य आहार, आहार विविधता, सामाजिक आर्थिक वातावरण, मातृ स्वास्थ्य, पोषण की स्थिति, पोषण के प्रति संवेदनशीलता और पोषण संबंधी कार्यक्रमों तक पहुंच द्वारा निर्धारित की जाती है। इसलिए, सामान्य समय में भी, कार्यक्रम बनाते समय इन बच्चों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। अभी हमें कुपोषण जैसी समस्याओं को काबू करने के लिए नए कार्यक्रम लाने की आवश्यकता है। नकदी हस्तांतरण के अलावा अन्य मदद की भी जरूरत पड़ सकती है।

पिछले एक दशक में कुपोषण का उन्मूलन करने में भारत ने जो प्रगति की है, क्या वह मौजूदा संकट के कारण व्यर्थ हो जाएगी?

पिछले कुछ महीनों के दौरान कई मीडिया रिपोर्टें सामने आ रही हैं जो विशेष रूप से गरीबों के बीच भोजन और पोषण संबंधी समस्याओं को उजागर करती हैं। लॉकडाउन की वजह से हुए व्यवधानों के कारण गरीब बच्चों के वजन में मामूली कमी (0.5 प्रतिशत भी) इस लाभ को कम कर देगा। यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों में, भारत में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तरों पर बाल पोषण की स्थिति में सुधार के लिए एक ठोस और वास्तविक नीति कार्यरत थी। पोषण अभियान के अंतर्गत चलाए गए कार्यक्रमों जैसे ग्राम और स्वास्थ्य पोषण दिवस को अवश्य ही झटका लगा होगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि गरीब घरों की गर्भवती महिलाओं को होने वाली आहार संबंधी दिक्कतें पहले 1,000 दिनों में नवजात बच्चों और अन्य बच्चों में पोषण संबंधी समस्याएं पैदा कर सकती हैं।