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नए दशक की चुनौतियां: मलेरिया और एएमआर के प्रकोप से जूझना होगा!

स्वास्थ्य की दृष्टि से अगली सदी में भारत ही नहीं दुनिया के सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी, जिनसे निपटना पूरी दुनिया के लिए दुरुह साबित होगा

By Banjot Kaur

On: Wednesday 01 January 2020
 
Measles. Photo: Getty Images

स्वास्थ्य जगत के लिए बीता हुआ वर्ष खसरा एक बड़ी चुनौती बन कर सामने आया, जिस पर हमने काफी पहले अंकुश लगा दिया था। वर्ष 1847 के करीब खसरा के मामले सामने आए थे और यह प्रकोप काफी फैल गया था। उस वक्त इसे खत्म मानते हुए पूरी तरह से खसरा की समाप्ति का प्रमाणपत्र भी विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जारी कर दिया था। 21वीं शताब्दी के शुरू होने के साथ ही इस संक्रामक रोग ने दुनिया भर की संस्थाओं के लिए फिर से विकराल रूप धारण कर लिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है, "प्रारंभिक वैश्विक डेटा से पता चलता है कि वर्ष 2018 के पहले तीन महीनों की तुलना में वर्ष 2019 के तीन महीनों में खसरा के मामलों में 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह पिछले दो वर्षों में लगातार बढ़ रही है।" विश्वभर के मामलों का संकलन करने वाली एजेंसी विश्व बैंक ने अपने साल के अंत में होने वाले रिव्यू में पाया कि 4,13,308 मामले पूरे विश्व से सामने आए हैं, इसके अतिरिक्त 2,50,000 मामले कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य के हैं। इसके मुकाबले वर्ष 2018 में 3,33,445 मामले पूरे विश्व से सामने आए हैं। इसके साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी अस्वीकरण में यह कहना कि वैश्विक स्तर पर सामने आए मामलों से असल में हुए मामले कहीं अधिक होंगे, इस विषय की गंभीरता को और अधिक बढ़ा देता है। डब्ल्युएचओ का अनुमान है कि 10 में से सिर्फ एक मामला ही एजेंसियों के संज्ञान में आता है।

सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) ने 30 मई 2019 को घोषणा की कि खसरा के मामले महज पांच महीने में इतने आए हैं कि अमेरिका में पिछले 25 वर्ष में नहीं आए। चार यूरोपियन देश अल्बानिया, चेकिया, ग्रीस और यूनाइटेड किंगडम ने खसरा उन्मूलन की स्थिति को बताते हुए कहा कि उन्होंने 'प्रकोप के कारण खत्म कर दिया'। यह तब होता है जब खसरा किसी देश में समाप्त होने के बाद फिर से प्रवेश करता है, और अगर एक वर्ष से अधिक समय तक देश में इसका लगातार संचरण होता है।

दुनियाभर के विशेषज्ञ मानते हैं कि खसरे से निपटने के लिए कोने-कोने तक टीकाकरण की सुविधा न होना इस रोग के फैलने का एक बड़ा कारण है। सीडीसी की माने तो खसरा के टीका का पहला और दूसरा डोज रोग के रोकथाम की दर और मृत्यु में कमी की दर वर्ष 2000 से 2019 तक 63 से 73 प्रतिशत तक बढ़ा देती है। 

डब्ल्यूएचओ और सीडीसी की संयुक्त रिपोर्ट कहती है कि इस रफ्तार से आगे बढ़ने के बावजूद वर्ष 2015 के लिए तय किए गए मील के पत्थर को पार नहीं किया जा सका। रिपोर्ट कहती है कि एमसीवी1 कवरेज लगभग एक दशक से स्थिर है और एमसीवी2 कवरेज केवल 69% है। संज्ञान में आए खसरा के मामलों में वर्ष 2016 के बाद बढ़ोतरी आई है और इसकी वजह से मृत्यु के दर में 2017 के बाद वृद्धि दर्ज की गई है।

हालांकि, इसकी वजह महज खराब टीकाकरण का कवरेज ही नहीं है। यह संयुक्त रिपोर्ट कहती है कि अलग-अलग देश में इसकी वजह अलग-अलग है।

पूरक टीकाकरण गतिविधि ने कई देशों में बड़े बच्चों और वयस्कों के बीच खराब प्रतिरक्षा को जन्म दिया है। एक अन्य कारण बताया गया कि खसरे का 'आयात' हुआ। रिपोर्ट के मुताबिक उदाहरण के लिए, 2018 में, इज़राइल ने फिलीपींस, यूक्रेन और यूनाइटेड किंगडम सहित कई देशों ने लगभग 100 खसरा आयात का अनुभव किया। इजरायल और यूक्रेन से आयात की वजह से संयुक्त राज्य अमेरिका में यह फैला। 2018 में 100 से अधिक आदान-प्रदान देखने के बाद यूनाइटेड किंगडम में एक स्थानीय खसरा वायरस संचरण संस्था को फिर से स्थापित किया।

ऐसे समय में जब दुनिया के वैज्ञानिक इस नए दुश्मन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, एक और दुश्मन उनकी नींद हराम करने के लिए तैयार है। और यह दुश्मन है रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर)। इससे निपटने के तरीकों और साधनों को खोजने के लिए एक तरफ चिकित्सा बिरादरी की हठधर्मिता का परीक्षण किया जा रहा है, और दूसरी ओर, चिकित्सकों के सामने एंटीबायोटिक्स और एंटीवायरल के उपयोग को निर्धारित करने से इस बीमारी को आगे न पनपने देने की चुनौती रहेगी।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को एक रिपोर्ट सौंपी। इसका शीर्षक है, एएमआर- एक वैश्विक समस्या जो शतकों में हुए चिकित्सा के विकास और उपलब्धियों को चुनौती देती है और टिकाऊ विकास के लक्ष्य को भी प्रभावित करती है और हाथ पर हाथ धरे बैठने के बजाए त्वरित और जरूरी कदम उठाने की जरूरत को दर्शाती है। यह रिपोर्ट आगाह कर रही है कि सभी आय वर्ग के देशों में एएमआर की समस्या सामान रूप से सामने आ रही है और यह बीमारी लाईलाज होने के साथ ही जीवनरक्षक दवाओं के प्रभाव को भी खत्म करती दिख रही है।

संख्या के बारे में बताते हुए यह रिपोर्ट कहती है कि दवाओं से प्रतिरोध की बीमारी की वजह से अब तक कम से कम 7,00,000 जान विश्वभर में जा चुकी है, इसमें 2,30,000 प्रतिरोधी टीबी से हुई मृत्यु भी शामिल है। यह एक ऐसा आंकड़ा है जो कि कोई उपाय न करने की स्थिति में 2050 तक एक करोड़ तक भी पहुंच सकता है। अधिक आय वाले देश में भी 2,40,000 लोगों की मौत 2015 से 2050 के बीच होने की आशंका है।

"द लांसेट इंफेक्शियस डिजीज में, एलेसेंड्रो कैसिनी और साथियों ने यूरोपीय संघ और यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र (ईएए) में आठ तरह के स्वास्थ्य संबंधी बोझ का जिक्र किया है जो कि एंटीबायोटिक के प्रतिरोध की वजह से उत्पन्न बोती है। इसमें आठ बैक्टेरिया के साथ 16 तरह के प्रतिरोधी लक्षण का भी जिक्र किया गया है। शारीरिक अक्षमता की दर 170 व्यक्ति प्रति एक लाख की जनसंख्या है, जो कि संयुक्त रूप से एचआईवी, इंफ्लुएंजा (एक तरह का बुखार), टीबी जैसी बीमारियों के बराबर है। जनवरी 2019 के लांसेट में छपे एक लेख में कहा गया है कि बीमारी का यह बोझ 2007 की तुलना में सीधा दोगुना हो गया है और शिशुओं (एक से कम उम्र) और बुजुर्गों (65 से अधिक उम्र) वर्ग में बहुतायत देखा जा रहा है।

भारत पर भी खतरा

अब अपने घर की तरफ देखें तो भारत में एएमआर लोक स्वास्थ्य के एक बड़े खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। अनुमान है कि 2050 तक यह एक करोड़ लोगों को ग्रसित कर लेगा और लोक स्वास्थ्य पर वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा बोझ बन जाएगा।

दुनिया भर में बढ़ते एएमआर बोझ के लिए विभिन्न कारणों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। इन कारणों में एंटीबायोटिक दवाओं का तर्कहीन और अति प्रयोग सबसे महत्वपूर्ण है। पिछले एक महीने में भारत, ब्रिटेन और अमेरिका में एंटीबायोटिक की खपत पर तीन रिपोर्टें सामने आई है, जिनमें वैश्विक रुझान को व्यापक रूप से बताया गया है। यूरोपीय देशों की तुलना में भारत में एंटीबायोटिक के उपयोग की दर कम है। हालांकि जब बात तीसरे और चौथे चरण के एंटीबायोटिक के उपयोग की बात आती है तो PLosS का शोध कहता है कि भारत इसमें सभी देशों को मात देता है। बीएमजे शोध ने आगाह किया है कि लगभग 43 फीसदी एंटीबायटिक का उपयोग अमेरिका के लिए गैर जरूरी हो सकता है। इन 43 फीसदी में से 24 मिलियन प्रिस्क्रिप्शन बिना किसी दस्तावेजीकरण के किया जाता है जिससे यह गैरजरूरी प्रतीत होता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन में वर्ष 2017 में एंटीबायोटिक को तीन वर्गों में विभाजित किया। पहला वर्ग है अवेयर का जिसमें कम प्रतिरोधक क्षमता है और दूसरा वर्ग है वाच और तीसरा है रिसर्व। एत डब्लूएचओ रिपोर्ट कहती है कि इस वर्गीकरण के बाद वाच क्षेणी की दवाओं के प्रयोग में काफी विविधता देखी गई और और इस वर्ग की दवाओं का प्रयोग कुछ देशों में 20 प्रतिशत से कम होता है, हालांकि कई दूसरे देशों में 50 फीसदी से अधिक उपयोग होता है। हालांकि, इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए सिर्फ 16 देशों ने अपने आंकड़े उपलब्ध कराए और डब्लूएचओ का कहना है कि इस कार्यक्रम का जारी रखने में यह सबसे बड़ी कमी रही।

एएमआर के अन्य कारणों में समय की अवधि में स्वयं माइक्रोबियल के भीतर आए बदलावों से बढ़ते प्रतिरोध शामिल हैं। यह समस्या तब और जटिल हो जाती है, जब हमें पता हो कि वैज्ञानिकों ने दशकों तक एंटीबायोटिक दवाओं के किसी भी नए वर्ग का आविष्कार नहीं किया है। इसका नतीजा यह है कि सभी चार प्रमुख बीमारियों- टीबी, एचआईवी, मलेरिया और इन्फ्लूएंजा में सभी दवा प्रतिरोधों का बोझ बढ़ता जा रहा है। 

ज्यादातर देश एएमआर के लिए नेशनल एक्शन प्लान लेकर आए हैं, लेकिन इसका कार्यान्वयन एक चुनौती बनी हुई है। इस बारे में डब्लूएचओ कहती है कि रोगाणुरोधी प्रतिरोध या एएमआर एक जटिल समस्या है जो समाज के सभी वर्गों को प्रभावित करती है और इसके लिए एक दूसरे से जुड़े कई कारण हैं। इसपर पार पाने के लिए कोई एक अकेला उपाय कारगर साबित नहीं होगा। रोगाणुरोधी प्रतिरोध के उद्भव और प्रसार को कम करने के लिए समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता होगी। अनुसंधान और नई रोगाणुरोधी दवाओं, टीकों और इसको खत्म करने के साधनों के विकास में अधिक शोध और विकास की जरूरत है।