Sign up for our weekly newsletter

कोरोनावायरस: खतरे में है महिलाओं-बच्चों का जीवन, स्वास्थ्य सेवाओं में 20 फीसदी की कमी: यूएन

संयुक्त राष्ट्र संघ की नई रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना महामारी के चलते महिलाओं, नवजात शिशुओं, बच्चों और किशोरों तक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंच रही हैं

By Lalit Maurya

On: Monday 13 July 2020
 

कोरोनावायरस के कारण महिलाओं और नवजातों का जीवन खतरे में पड़ गया है। स्वास्थ्य सुविधाओं से बढ़ती दूरी इस खतरे को और बढ़ा रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट से पता चला है कि इस महामारी के चलते महिलाओं, नवजात शिशुओं, बच्चों और किशोरों तक स्वास्थ्य सुविधाओं और सामाजिक सेवाओं की पहुंच में 20 फीसदी की कमी आई है। ऐसे में जो देश पहले ही खस्ता-हाल स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रहे थे, उन देशों में महिलाओं और बच्चों पर इस महामारी का असर कुछ ज्यादा ही पड़ रहा है।

अनुमान है कि इस महामारी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं में जो अवरोध आया है, उसके कारण 5 वर्ष से कम आयु के करीब 400,000 या उससे अधिक बच्चों की जानें गई हैं| जबकि यदि 2018 के आंकड़ों को देखें तो इस वर्ष में जन्म के पहले महीने में ही 25 लाख नवजातों की मृत्यु हो गई थी, पर अनुमान है कि इस महामारी के कारण यह आंकड़ा बढ़कर 26,68,000 पर पहुंच जाएगा।

महामारी के कारण अर्थव्यवस्थाओं को जो नुकसान पहुंचा है, उसके कारण रोजगार की भारी कमी उत्पन्न हो गई थी। घटती आय और बढ़ती गरीबी ने पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित आबादी के लिए समस्याओं को और बढ़ा दिया है। अनुमान है कि 6.6 करोड़ बच्चों को यह महामारी इतना गरीब कर देगी कि उनके लिए दो वक्त का भोजन मिलना भी मुश्किल हो जाएगा| स्वास्थ्य सेवाएं तो बहुत दूर की बात है।

37 करोड़ बच्चे रह जाएंगे मिड डे मील से वंचित 

पोषक आहार और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं का जीवन और कष्दायक हो गया है| अनुमान है कि यह महामारी हर साल होने वाली मातृत्व मौतों में 24,400 का और इजाफा कर देगी| जब किसी महिला की गर्भावस्था में होने वाली किसी बीमारी, पोषण, खून की कमी आदि कारणों के कारण या प्रसव होने के 42 दिनों के अंदर मौत हो जाए, तो उसे मैटरनल डेथ (मातृ मृत्यु) कहते हैं। गौरतलब है कि हर साल प्रसव और उसके बाद करीब 295,000 महिलाओं की मौत हो जाती है| जिसका बड़ा कारण पोषण की कमी है| भारत सहित कई देशों में स्कूलों में दिया जा रहा मिड डे मील, यानी दोपहर का भोजन बच्चों के पोषण का एक जरुरी हिस्सा है| पर अनुमान है कि इस महामारी के चलते करीब 37 करोड़ बच्चे इस मिड डे मील से वंचित रह जाएंगे|        

1.35 करोड़ बच्चे को नहीं लग पाए जीवन रक्षक टीके

संयुक्त राष्ट्र से जुडी एलिजाबेथ मेसन के अनुसार इस महामारी के कारण विकसित और विकासशील दोनों ही देशों में स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं और लगातार इससे जूझ रही हैं| ऐसे में महिलाओं, नवजात शिशुओं, बच्चों और किशोरों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा चुकी हैं| यदि आंकड़ों को देखें तो इस दौरान करीब 1.35 करोड़ बच्चे जरुरी जीवन रक्षक टीकों से वंचित रह जाएंगे| 

महामारी के कारण जो लॉकडाउन किया गया था, उस दौरान इन जीवन रक्षक टीकों से जुड़ी सेवाओं को लगभग बंद कर दिया गया था| साथ ही इसमें लगे स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को हटाकर कोविड-19 की रोकथाम में लगा दिया गया था| यह समस्या केवल एक देश की नहीं है| 20 से अधिक देशों ने माना है कि उनके देशों में इस बीमारी के कारण जरुरी जीवन रक्षक टीकों की कमी पैदा हो गई है|

महिलाओं के खिलाफ बढ़ रहे हैं हिंसा के मामले

वहीं गर्भनिरोधक उपायों की कमी के चलते गरीब और मध्यम आय वाले देशों में 1.5 करोड़ से ज्यादा अनवांटेड प्रेगनेंसी हो सकती है। जबकि दूसरी ओर इस बीमारी के बढ़ते दबाव के कारण अवसाद, चिंता और अनिश्चितता बढ़ रही है| इस महामारी ने महिलाओं के खिलाफ हो रहे हिंसा के मामलों को भी बढ़ा दिया है| अनुमान है कि लॉकडाउन के हर तीन महीनों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा और प्रताड़ना के करीब 1.5 करोड़ अतिरिक्त मामले सामने आ रहे हैं| जबकि इमरजेंसी कॉल्स में 30 फीसदी की वृद्धि देखी गई है|     

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार 2000 के बाद से मातृ और बाल मृत्यु दर में उल्लेखनिय कमी आई है| आंकड़ें दिखाते हैं कि पिछले बीस सालों में इनमें लगभग 40 फीसदी की कमी आई है| और यह कमी केवल अमीर देशों में ही नहीं बल्कि गरीब देशों में भी रिकॉर्ड की गई है|

आम आदमी के लिए लक्ज़री बन चुकी हैं बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं

आज बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं एक आम आदमी के लिए लक्ज़री बन चुकी हैं| जबकि समझना होगा कि यह कोई लक्ज़री नहीं बल्कि जीवन बचाने का जरुरी साधन है| ऐसे में इस महामारी ने इस स्थिति को बद से बदतर बना दिया है| इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करने वाले पैनल की सह-अध्यक्ष और डब्ल्यूएचओ की  पूर्व सहायक महानिदेशक जॉय फुमापी के अनुसार “इस रिपोर्ट के निष्कर्ष से पता चलता है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था नवजात शिशुओं, महिलाओं और बच्चों के लिए कितनी कमजोर है। इस महामारी ने हमें उस स्थिति में ला दिया है जिसमें इस दिशा में की गई हमारी दशकों की मेहनत बर्बाद हो सकती है|” रिपोर्ट के अनुसार सेवाओं के अतिरिक्त यदि हम संयुक्त राष्ट्र के महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य सम्बन्धी 2030 के लक्ष्य से 20 फीसदी पीछे हैं, जोकि एक बड़ा अंतर है|

आज भी जो अमीर और गरीब के बीच की जो खाई है वो जस की तस है, जिसे भरना जरुरी है| रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य संसाधनों की 20 फीसदी की कमी के बावजूद हर साल करीब 150,39,100 करोड़ रुपए (2,00,000 करोड़ डॉलर) भ्रष्टाचार, सही उपयोग की कमी और बर्बादी के चलते बेकार चले जाते हैं और जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाते हैं| इस बर्बादी को रोकना होगा| इससे निपटने के लिए सरकारों को  ज्यादा जिम्मेवार बनना होगा| ऐसे समय में स्वास्थ्य पर खर्च किया जाने वाला हर रुपया महत्वपूर्ण है| इसलिए इस बर्बादी पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।

दुनिया भर में करीब 1.8 करोड़ स्वास्थ्य कर्मियों की कमी है, जिस भरना जरूरी है। आंकड़ों की पारदर्शिता महत्वपूर्ण है। साथ ही स्वास्थ्य सम्बन्धी आंकड़ों में जो कमी है उसे पूरा करना जरूरी है। हर किसी को जिम्मेदार बनना होगा| सरकारों को भी अपनी जिम्मेवारी तय करनी होगी| दुनिया के 90 करोड़ लोग आज भी स्वास्थ्य सम्बन्धी खर्चों के बोझ तले दबे हुए हैं, जिन्हें उबरना जरुरी है| ऐसे में कमजोर और गरीब देशों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च को बढ़ाना जरुरी है| आज भी दुनिया में 300 करोड़ से ज्यादा लोग हाथ धोने के साफ़ पानी और साबुन जैसी बुनियादी साफ़ सफाई की सुविधाओं से दूर हैं| जिसे पूरा करना स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती है।