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जीवन भक्षक अस्पताल-7: दिल्ली से सटे इस अस्पताल में भी सुरक्षित नहीं हैं बच्चे

राजधानी दिल्ली से सटे हुए फरीदाबाद के सिविल अस्पताल में हर तीसरे दिन एक बच्चे की मौत हो जाती है या तो बच्चों की हालत गंभीर होते देख दिल्ली रेफर कर दिया जाता है

By Shahnawaz Alam

On: Friday 07 February 2020
 
यह है फरीदाबाद का बादशाह खान अस्पताल। फोटो: शाहनवाज आलम
यह है फरीदाबाद का बादशाह खान अस्पताल। फोटो: शाहनवाज आलम यह है फरीदाबाद का बादशाह खान अस्पताल। फोटो: शाहनवाज आलम

दिसंबर 2019 में राजस्थान के कोटा स्थित जेके लोन अस्पताल में बच्चों की मौत के बाद देश में एक बार फिर से यह बहस खड़ी हो गई कि क्या बड़े खासकर सरकारी अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती हो रहे बच्चे क्या सुरक्षित हैं? डाउन टू अर्थ ने इसे न केवल आंकड़ों के माध्यम से समझने की कोशिश की, बल्कि जमीनी पड़ताल करते हुए कई रिपोर्ट्स की एक सीरीज तैयार की है। सीरीज की पहली कड़ी में आपने पढ़ा कि अस्पतालों में औसतन हर मिनट में एक बच्चे की मौत हो रही है। इसके बाद जमीनी पड़ताल शुरू की गई। इसमें आपने पढ़ा, राजस्थान के कुछ अस्पतालों की दास्तान कहती ग्राउंड रिपोर्ट । तीसरी कड़ी में आपने पढ़ा, मध्यप्रदेश के अस्पतालों का हाल। अगली कड़ी में आपने उत्तरप्रदेश के कुछ अस्पतालों की कहानी पढ़ी। इससे अगली कड़ी में आने गुजरात के दो अस्पतालों की दास्तान बताती कलीम सिद्दीकी की रिपोर्ट पढ़ी। इसके बाद उत्तराखंड के अस्पताल की रिपोर्ट पढ़ी। आज पढ़ें-   

 

केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय से करीब 30 किलोमीटर दूर फरीदाबाद के बादशाह खान नागरिक अस्‍पताल में हर तीसरे दिन एक नवजात की मौत होती है। एक जनवरी 2019 से लेकर 31 दिसंबर 2019 तक 125 मासूम बच्‍चों की मौत हो गई। ये सभी नवजात गहन चिकित्‍सा कक्ष (एसएनसीयू) में भर्ती थे। इस दौरान कुल 2177 बच्चे भर्ती हुए थे। वर्ष 2018 में इसी अस्‍पताल के एसएनसीयू में 109 नवजात की मौत हुई थी। 2019 में मरने वाले शिशुओं की संख्‍या में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।

हर वर्ष नवजात बच्‍चों की मौत के बावजूद हरियाणा स्‍वास्‍थ्‍य विभाग गंभीर नहीं है। संसाधनों की कमी से जूझ रहे अस्‍पताल ने कभी भी इसकी पूर्ति और माकूल बंदोबस्‍त की ओर अधिक ध्‍यान नहीं दिया। जिसकी वजह से आज भी अस्‍पताल के एसएनसीयू वार्ड संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। अब भी मौत का सिलसिला जारी है। मौत की जिम्‍मेवारी लेने से बचने के लिए बादशाह खान नागरिक अस्‍पताल में नवजात और 0-1 वर्ष के शिशुओं को दिल्‍ली के सफदरजंग अस्‍पताल या रोहतक स्थिति पीजीआई मेडिकल कॉलेज रोहतक भेज दिया जाता है। एक जनवरी 2018 से 31 दिसंबर 2019 तक 483 बच्‍चों को रेफर किया गया। वर्ष 2018 में 248 और वर्ष 2019 में 235 शिशुओं को दूसरे अस्‍पतालों में भेजा गया।

सिर्फ दिसंबर 2019 के आंकड़ों को देखे तो अस्‍पताल के गंभीर स्थिति में 201 नवजात आए थे। जिसमें 16 की मौत हो गई, 16 नवजात को गंभीर हालत में दिल्‍ली के एम्‍स में रेफर किया गया, जबकि 12 नवजात के गंभीर स्थिति को देखते हुए उसके माता-पिता लामा (डॉक्‍टर के बगैर स्‍वीकृति) के तहत लेकर चले गए। अस्‍पताल के डॉक्‍टरों का कहना है‍ कि जिन शिशुओं की मौत हुई है, वह जन्‍म के समय ही बहुत गंभीर स्थिति में रही है। प्री-मैच्‍योर बच्‍चों के साथ अधिकांश यह दिक्‍कते आई है। अधिकांश मामलों में मौत की वजह श्‍वास में शिकायत, निमोनिया, ब्‍लड इंफेक्‍शन होता है। हरियाणा अधिकार मंच के अध्‍यक्ष रमेश यादव की मानें तो हरियाणा के सभी शहरों में स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की स्थिति खराब है। जिन लोगों के पास थोड़े पैसे है, वह सरकारी अस्‍पताल जाने से गुरेज करते है। निजी अस्‍पताल में चले जाते है। कई बार शिशुओं की हालत गंभीर देखते हुए उन्‍हें सरकारी अस्‍पताल से रेफर कराकर या लामा के तहत ले आते है और कई शिशुओं की रास्‍ते में मौत हो जाती है। जो सरकारी अस्‍पतालों के रिकॉर्ड में ही दर्ज नहीं है।

बादशाह खान नागरिक अस्‍पताल में 200 बेड हैं, जिसमें से 27 बेड का एसएनसीयू वार्ड है। यहां हर दिन दो दर्जन से अधिक डिलीवरी होने और गंभीर स्थिति में नवजात के आने के कारण बेड फुल रहता है। कई बार एक बेड पर दो-दो नवजात को लिटाया जाता है। केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय द्वारा तैयार किए इंडियन पब्लिक हेल्‍थ स्‍टैंडर्ड (आईपीएचएस) के मानक के अनुसार बादशाह खान नागरिक अस्‍पताल में नवजात के इलाज और उसके लिए जरूरी उपकरण भी अस्‍पताल में नहीं है। यहां स्‍वीकृत छह मेडिकल ऑफिसर की जगह अभी तीन कार्यरत है, ज‍बकि स्‍टाफ नर्स की 30 पदों के एवज में 20 नर्स काम कर रही है। यहां नवजात के लिए जरूरी तकनीक वेंटिलेटर और फोटो थैरेपी मशीन नहीं है। जबकि आईपीएचएस के मानक अनुसार, 200 बेड के एक जिला अस्‍पताल में 28 तरह के उपकरण होनी चाहिए। 12 बेड के एसएनसीयू के लिए कम से कम से चार मेडिकल ऑफिसर, 21 स्‍टाफ नर्स, प्रत्‍येक शिफ्ट के लिए एक नर्सिंग इन-चार्ज, एक पब्लिक हेल्‍थ नर्स होनी चाहिए। 

राजस्‍थान और गुजरात में बच्‍चों की मौत के मामले सामने आने के बाद हरियाणा स्‍वास्‍थ्‍य विभाग ने विभिन्‍न जिलों में मौजूद संसाधनों पर एक रिपोर्ट मांगी थी। हरियाणा स्‍वास्‍थ्‍य विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 09 जनवरी 2020 तक सभी जिलों में बाल रोग विशेषज्ञों की कमी के साथ जरूरी उपकरणों की भारी कमी थी। जिसकी मांग अलग-अलग जिलों के चीफ मेडिकल ऑफिसर ने की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, सोनीपत में 18 बेड के एसएनसीयू में एक भी वेंटिलेटर नहीं है। दो बेड पर वार्मर खराब है। एक फोटोथैरेपी मशीन खराब पड़ी है। बच्‍चों के लिए एक्‍सरे मशीन नहीं है। चार मेडिकल ऑफिसर के पद खाली है। वहीं, पानीपत में 11 बाल रोग विशेषज्ञ की जरूरत है, लेकिन मेडिकल सुप्रीटेंडेंट समेत दो ही डॉक्‍टर है। स्‍टाफ नहीं होने के कारण 14 में से सात वार्मर खराब पड़े है। जिला नागरिक अस्‍पताल में न वेंटीलेटर है और न ही डबल सरफेस फोटो थैरेपी मशीन। इसी तरह अन्‍य जिलों का हाल है। डॉक्‍टरों की कमी के साथ वहां एसएनसीयू के लिए तय मानक अनुसार मशीनें नहीं है। 

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