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अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद 10 में से 1 कोविड-19 का मरीज फिर से भर्ती हो रहा है: अध्ययन

अध्ययन में कहा गया है कि बीमारी का मुकाबला करने के बाद भी हफ्तों तक यह समस्या बनी रह सकती है

By Dayanidhi

On: Thursday 17 September 2020
 
Photo: wikimedia commons
Photo: wikimedia commons Photo: wikimedia commons

दुनिया भर में लगातार इस बात की जानकारी मिल रही है कि कोविड-19 संक्रमण से रिकवरी के बाद भी, लोगों को विभिन्न प्रकार की शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कई लोगों में कुछ विशिष्ट लक्षण सामने आ रहे है - जैसे कि खांसी, गले में खारिश और थकान आदि।

बीमारी का मुकाबला करने के बाद भी हफ्तों तक यह समस्या बनी रह सकती है। कई मरीजों को अस्पतालों में वापस लौटना पड़ रहा है। लोग हृदय की समस्याएं, मानसिक संकट और भी बहुत कुछ की शिकायत कर रहे हैं। इस सब को देखते हुए अमेरिका के शोधकर्ताओं ने इस पर एक अध्ययन किया है।

मोटे तौर पर कोविड-19 से ठीक होने वाले 10 रोगियों में से 1 को फिर से एक सप्ताह के अंदर अस्पताल लौटने की जरुरत पड़ रही है। अमेरिका के फिलाडेल्फिया इलाके में कोरोना प्रकोप के पहले तीन महीनों मार्च, अप्रैल और मई 2020 के आंकड़ों के अनुसार ऐसा पाया गया है।

पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के पेरेलमैन स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने पाया कि कम पल्स ऑक्सीमेट्री स्तर और बुखार जैसे लक्षण सबसे अधिक बताए गए हैं। जिसके परिणामस्वरूप अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मरीजों को दोबारा भर्ती होना पड़ रहा है। एकेडमिक इमरजेंसी मेडिसिन में प्रकाशित यह जानकारी किसी बीमारी से लड़ने के लिए काम करने वाले चिकित्सकों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

अध्ययनकर्ता ऑस्टिन किलरू ने कहा कि इस बात का पता लगाना मुश्किल है कि कौन सा मरीज ठीक होने के बाद फिर से बीमार हो जाएगा। इस तरह किन मरीजों को घर भेजा जाय इसका निर्णय लेना मुश्किल हो जाएगा। यह अध्ययन चिकित्सकों को यह बताने के लिए कुछ संकेत देता है कि मरीजों को कितनी बार और कब लौटना पड़ सकता है, और किन कारकों पर ध्यान देना चाहिए।

अध्ययन में 1,419 रोगियों को देखा गया। जो 1 मार्च से 28 मई, 2020 के बीच आपातकालीन विभाग (ईडी) में भर्ती किए गए थे। कुछ समय बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। इस दौरान सात दिनों के अंदर इनका कोविड-19 परीक्षण पॉजिटिव निकला। आंकड़ों से पता चला कि 4.7 फीसदी मरीज फिर से अस्पताल लौट आए और उन्हें ईडी में सिर्फ तीन दिनों के भीतर भर्ती कराया गया था। एक सप्ताह के भीतर अतिरिक्त 3.9 फीसदी मरीज अस्पताल में भर्ती हुए। कुल मिलाकर, इसका मतलब है कि 8.6 फीसदी मरीज कोविड-19 के कारण पहली बार ईडी में भर्ती होने के बाद वे वापस अस्पताल रहे थे।

किलरू ने बताया कि हम इस पूरे दर को देखते हुए आश्चर्यचकित थे कि जिन मरीजों को छुट्टी दे दी गई थी, उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता पड़ रही थी, जिसकी दर अन्य बीमारियों से दोगुना थी। चिंता का विषय यह नहीं था कि आपातकालीन चिकित्सक गलत निर्णय ले रहे हैं, बल्कि यह कि कोविड का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है यह कितनी जल्दी खतरनाक हो सकता है।

अध्ययन में बताया गया है कि ऐसी आबादी जिन मरीजों की उम्र 60 वर्ष से अधिक थी वे कोविड के लिए अधिक कमजोर माने गए थे। 18 से 39 वर्ष की आयु सीमा के रोगियों की तुलना में, 60 से अधिक उम्र के लोगों को अपनी प्रारंभिक आपातकालीन विभाग से छुट्टी मिलने के बाद अस्पताल में फिर से भर्ती होने की संभावना पांच गुना से अधिक थी। 40 से 59 आयु वर्ग के लोगों को युवा समूह की तुलना में अस्पताल में भर्ती होने की संभावना तीन गुना अधिक पाई गई।

जहां व्यक्तिगत लक्षणों की बात आती है, तो अध्ययन से पता चला कि कम पल्स ऑक्सीमेट्री रीडिंग वाले किसी भी उम्र के रोगियों को उच्च रीडिंग वाले लोगों की तुलना में वापस अस्पताल में भर्ती होने की आशंका लगभग चार गुना थी, जबकि बुखार के रोगियों की आशंका तीन गुना से अधिक थी।

चिकित्सा और महामारी विज्ञान के आपातकाल के सहायक प्रोफेसर और अध्ययनकर्ता एम.किट डेलगाडो ने कहा यदि रोगी में अन्य कारक हो जैसे कि छाती के एक्स-रे का असामान्य होना, जिसके कारण अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता और भी अधिक बढ़ जाती है।

अध्ययन में रोगियों के जनसांख्यिकीय आंकड़ों को एकत्र किया गया, जिसमें जातीय या लिंग के आधार पर कोई अंतर नहीं था।

इस उम्मीद के साथ कि अध्ययन के निष्कर्ष डॉक्टरों को बेहतर तरीके से जानकारी दे सकते हैं कि घर पर रिकवरी के लिए क्या सबसे उपयुक्त है। शोधकर्ताओं ने कोविड-19 के रोगियों की देखभाल के लिए एक उपयोगी उपकरण बनाया है जिसकी मदद से दूर रहकर भी मरीजों की निगरानी की जा सकती है।

इसका एक उदाहरण पेन मेडिसिन का कोविड वॉच सिस्टम है, जो एक टेक्स्ट-मैसेज-आधारित प्रणाली है। जो घर पर रहने वाले  कोविड-19 रोगियों की दैनिक जांच भेजती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उनके लक्षण बिगड़ तो नहीं रहे हैं। आज तक इस प्रणाली में 5,500 से अधिक रोगियों को नामांकित किया गया है, जो एक नए रोगी-केंद्रित परिणाम अनुसंधान संस्थान (पीसीओआरआई) के अध्ययन का विषय है।