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रास्तों में चल रहे 30 प्रतिशत प्रवासी मजदूर हो सकते हैं वायरस से संक्रमित: केंद्र

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वो उन मजदूरों को रास्तों में ही भोजन और आसरा देकर बड़े स्तर पर संक्रमण फैलने से रोकेंगे

By Banjot Kaur

On: Wednesday 01 April 2020
 

रास्तों में चल रहे प्रत्येक 10 प्रवासी मजदुरों में से 3 में नोवेल कोरोना वायरस का संक्रमण हो सकता है। ये मजदूर 25 मार्च को राष्ट्रीय स्तर के लॉकडाउन की घोषणा के बाद अपने घरों की तरफ पैदल ही निकल गए। यह जानकारी भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 31 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में दी। 

कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में सरकार ने अनुमान लगाया है कि 5 से 6 लाख लोग लॉकडाउन की घोषणा के बाद पैदल ही अपने घरों की तरफ कूच कर रहे हैं। यह रिपोर्ट कहती है कि देशभर में प्रवासी मजदूरों की संख्या चार करोड़ 40 लाख के करीब है। 

केंद्र के मुताबिक इतनी संख्या में प्रवासी मजदूरों का निकलना सरकार के द्वारा उठाए गए बचाव के तरीकों को कमजोर करता है। इस समूहों को अगर यात्रा करते देने और गांवों तक पहुंचने दिया जाए तो सम्भव है कि इनके माध्यम से वायरस का प्रसार गांवों तक भी हो जाए। इससे संक्रमण से अछूते गांव भी खतरे में आ सकते हैं। 

केंद्र सरकार द्वारा बिना तैयारी के अचानक लॉकडाउन के फैसले की काफी आलोचना हो रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये प्रवासी सोशल मीडिया पर चल रहे बड़े पैमाने पर गलत खबरों की वजह से दहशत में आ गए। हालांकि, कुछ प्रवासी मजदूरों के पास रहने को घर और भोजन नहीं होने की वजह से उन्हें मजबूरी में यह फैसला लेना पड़ा। 

लॉकडाउन के 6 दिन बाद केंद्र ने राज्यों को अपनी सीमाएं सील करने के निर्देश दिए, ताकि संक्रमण के खतरे को देखते हुए मजदूरों को उनके गंतव्य तक पहुंचने से रोका जा सके। केंद्र ने प्रवासी मजदूरों को खाना और रहने का स्थान मुहैया कराने को भी कहा है। उन्हें 14 दिन तक क्वारंटाइन में रखा जाएगा और संक्रमण के लक्षण होने पर जांच भी की जाएगी। 

कोर्ट में केंद्र ने 30 मार्च को जानकारी दी थी कि 6,60,000 मजदूरों के लिए 2,10,000 घरों की व्यवस्था कर ली गई है। 

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई अब 7 अप्रैल को होगी।