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कोरोना से विज्ञान बचाएगा, रूढ़िवादिता नहीं

ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान आए अकाल में क्लासिकल इकोनॉमिक्स लाखों लोगों की अकाल मौत का कारण बना। आर्थिक रूढ़िवाद आज भी उतना ही घातक साबित हो सकता है

On: Friday 22 May 2020
 

जस्टिन पोदुर

मैंने यह लेख उस वक्त लिखा था, जब दुनिया भर में कोरोना संक्रमितों की संख्या करीब 30 लाख से ऊपर पहुंच चुकी थी और दो लाख से अधिक मौतें हो चुकी थी (सोशल मीट्रिक उपकरण, वर्ल्डोमीटर के अनुसार)। केवल चीन और कोरिया इस पर कुछ हद तक नियंत्रण करते दिख रहे हैं। अमेरिकी सरकार ने 2 ट्रिलियन डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा तो की है, लेकिन इसमें अधिकांश लोगों के लिए नौकरी की सुरक्षा, किराए को स्थगित करने या सार्थक आय सहायता की बात कहीं नहीं दिखती। मौजूदा वक्त के संकट को हम किस अन्य संकट के साथ तुलनात्मक अध्ययन करके समझ सकते हैं? क्या वह एड्स का संकट है, 2008 का आर्थिक संकट है या सार्स महामारी का संकट?

हर संकट की तुलना मौजूदा स्थिति के एक हिस्से की कहानी बयान कर सकती है। 23 मार्च को ट्रम्प ने सार्वजनिक स्वास्थ्य वैज्ञानिकों की सलाह की अनदेखी करते हुए सभी लोगों को कुछ सप्ताह के भीतर काम पर वापस भेजने की बात कही। ब्राजील के राष्ट्रपति जेर बोल्सोनारो और बोरिस जॉनसन ने भी इसी तरह का रुख अपनाया। बोल्सोनारो तो ये नकारने में ही व्यस्त रहे कि ब्राजील में ऐसा कोई संकट है। वहीं, बोरिस जॉनसन बेवजह की बहादुरी प्रदर्शित करते हुए अपने लोगों की मजबूत प्रतिरोधक क्षमता का गुणगान करते रहे। यह अलग बात है कि कुछ ही दिन बाद उनके मंत्री इस बयान से पीछे हटते नजर आए। इस संकट को लेकर एक चीज स्पष्ट दिख रही है कि वैज्ञानिक तथ्यों के मुकाबले आर्थिक अनुमानों को प्राथमिकता दी जा रही है। मौजूदा संकट की कहानी दुनिया के अंतिम महान ब्रिटिश साम्राज्य के एक खास विचार की वजह से लाखों लोगों के भुखमरी के कगार पर पहुंचने की कहानी से मेल खाती है।

18वीं शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार होने के साथ ही यहां के बुद्धिजीवियों ने इस साम्राज्य के लिए एक विशेष विचार विकसित किए, जिसका नाम था क्लासिकल इकोनॉमिक्स। अमेरिका में स्वदेशी लोगों के खिलाफ कई नरसंहार युद्धों और भारत में साम्राज्य की शुरुआत के बाद 1776 में एडम स्मिथ की द वेल्थ ऑफ नेशंस प्रकाशित हुई थी। इस क्लासिकल थ्योरी में डेविड रिकार्डो, थॉमस माल्थस और जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपना योगदान दिया। जैसे ही साम्राज्यवादियों ने अपने नियंत्रण को मजबूत किया, उन्होंने बड़े पैमाने पर भुखमरी को रोकने के लिए स्थानीय सरकारी प्रणालियों को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद ही पूरे भारत में अकाल शुरू हो गया। शशि थरूर ने अपनी पुस्तक, इंग्लोरियस एम्पायर : व्हाट द ब्रिटिश डिड टू इंडिया में इन तथ्यों को संकलित किया है कि कैसे 1770 में बंगाल से शुरू होकर 1943 के दौरान मद्रास, दिल्ली और बॉम्बे में अकाल का कहर बरपा। सिर्फ 20वीं शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान भारत में अकाल से 3.5 करोड़ लोग मारे गए थे।

इसी सिद्धांत के नाम पर अंग्रेजों ने आयरिश लोगों को भी भूखा मारा। यहां 1845-49 के मध्य आलू अकाल (पोटैटो फेमाइन) पड़ा और आयरिश इसी सिद्धांत के शिकार बने। 2006 में एडवर्ड ओ बॉयल ने क्लासिकल इकोनॉमिक्स को आयरिश अकाल से जोड़ा और निम्न नियमों से क्लासिकल इकोनॉमिक्स की पहचान की:

1. स्व-हित का नियम,

2. मुक्त प्रतियोगिता का नियम

3. जनसंख्या का नियम

4. मांग और आपूर्ति का नियम

5. मजदूरी का लौह नियम

6. किराए का नियम

7. मुक्त व्यापार सिद्धांत

ये कानून, जैसा कि एक आलोचक के रूप में कार्ल पोलानी ने स्व-समायोजन बाजार के बारे में लिखा है, “मानव और समाज के प्राकृतिक तत्वों को नष्ट किए बिना ये लम्बे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकते, इसने मनुष्य को शारीरिक रूप से नष्ट किया है और उसके परिवेश को तबाह किया।” 1876-78 के बीच दक्षिणी भारत में आए एक अकाल के दौरान ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लिटन ने घोषणा की, “भोजन की कीमत को कम करने के लिए सरकार की ओर से किसी भी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।” जोहान हैरी एक ब्रिटिश अधिकारी सर रिचर्ड टेम्पल की कहानी कहते हैं। टेम्पल ने एक अकाल के दौरान भूखे लोगों के लिए कुछ खाने का इंतजाम किया था। द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने उनके इस कार्य की निन्दा करते हुए लिखा, “उन्हें (भारतीयों को) जीवित रखने का कर्तव्य सरकार का है।” उस साम्राज्य के दौरान क्लासिकल आर्थिक सिद्धांत और अकाल के साथ नस्लवाद का जहर भी जोड़ दिया गया। ओ बॉयल 1875 में क्लासिकल अर्थशास्त्री विलियम स्टेनली जेवन्स द्वारा दिए गए एक व्याख्यान का हवाला देते हैं, जिसमें स्टेनली ने कहा, “एक अकाल की शुरुआत प्राकृतिक घटनाओं के रूप में देखने को मिलती है। समाज की प्रारंभिक अवस्था में युद्ध सामान्य स्थिति है। उदाहरण के लिए उत्तरी अमेरिकी इंडियंस का एकमात्र गंभीर काम और मनोरंजन, युद्ध ही था। जिस तरह से आयरिश हमारे बड़े शहरों में और अपने देश के कुछ हिस्सों में रहते हैं, इस बात की संभावना है कि वे जल्दी मरे।” अंग्रेजों के पास अकाल का साम्राज्य था। आज हम प्रतिबंधों के साम्राज्य में रहते हैं। आज, ईरान, वेनेजुएला और गाजा महामारी और घेराबंदी का तनाव एक साथ झेल रहे हैं। ऐसे में उनके राजनयिक वर्तमान संकट से निकलने के लिए अमेरिका से भीख मांग रहे हैं कि उन पर लगे प्रतिबन्धों को हटाया जाए। लेकिन, इसका कोई फायदा नहीं हुआ है। रिमोट-कंट्रोल (दूर से नियंत्रित) सामूहिक हत्या अमेरिकी नीति का एक ऐसा ठोस हिस्सा है, जिसे वैश्विक महामारी के कारण अमेरिका स्थगित नहीं करेगा। सदियों से अर्थशास्त्र को किस हद तक परिष्कृत किया गया है? यह किस हद तक प्रमाणों से लैस है?

मुख्यधारा के अर्थशास्त्र से अलग विद्वानों का कहना है, “बहुत ज्यादा नहीं।” 2001 में अपरंपरागत अर्थशास्त्री जेम्स गैलब्रेथ ने आज के अर्थशास्त्र में व्यापक रूप से स्वीकृत पांच प्रस्तावों को सूचीबद्ध करते हुए एक लेख लिखा। ये पांच प्रस्ताव है, मुद्रास्फीति एक मौद्रिक घटना है, मुद्रास्फीति के बिना पूर्ण रोजगार असंभव है, तकनीकी परिवर्तन से वेतन वृद्धि असमानता बढ़ती है, न्यूनतम मजदूरी बढ़ने से बेरोजगारी बढ़ती है और निरंतर वृद्धि प्रति वर्ष 2.5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। अब ये देखना दिलचस्प है कि कैसे उनमें से प्रत्येक प्रस्ताव को आर्थिक सबूतों द्वारा अविश्वसनीय बनाया गया और सबूतों के बावजूद वे कैसे अभी तक जारी है। उसी वर्ष, अपरंपरागत ऑस्ट्रेलियाई अर्थशास्त्री स्टीव कीन ने मुख्यधारा के रूढ़िवाद की सैद्धांतिक और अनुभवजन्य विफलताओं को लेकर डिबंकिंग इकोनॉमिक्स: द नेकेड एम्पेरर ऑफ सोशल साइंसेज प्रकाशित किया। एक दशक बाद, इकोननेड किताब में यवेस स्मिथ ने उन तरीकों की एक सूची एकत्र की, जिन पर ऐसे आर्थिक मॉडल बनाए गए हैं, जिन्हें डेटा समर्थन तक नहीं है। वास्तविक अर्थव्यवस्थाओं को लेकर दिलचस्प दृष्टिकोण पैदा करने वाले इस तरह के कार्यों की संख्या बहुत अधिक है, लेकिन इन्हें अर्थशास्त्र की मुख्यधारा द्वारा खारिज कर दिया गया है।

वैकल्पिक विचारों को लेकर मुख्यधारा का अर्थशास्त्र इतना अधिक सख्त है कि विश्वविद्यालयों के अपरंपरागत अर्थशास्त्रियों को पॉलिटिकल इकोनॉमी ऐट स्टैनफोर्ड या इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल स्टडीज ऐट नोट्रे डैम जैसे विभिन्न कार्यक्रमों में भेज दिया गया। इन कार्यक्रमों को 2003 में अर्थशास्त्र विभाग से अलग कर दिया गया था और फिर 2010 में बंद ही कर दिया गया। यूनिवर्सिटी ऑफ मैनिटोबा में रूढ़िवादी और अपरंपरागत अर्थशास्त्र के बीच संघर्ष इतना नाटकीय हो गया था कि कैनेडियन एसोसिएशन ऑफ यूनिवर्सिटी टीचर्स को 2015 में विभाग की जांच तक करनी पड़ी। विज्ञान अलग तरह से काम करता है। जैसा कि आइंस्टीन ने कहा था, विज्ञान रोजमर्रा की सोच का परिशोधन है। मेरे लिए विज्ञान मानव जिज्ञासा का व्यवस्थित उपयोग है। ऐसे कई विद्वान हैं, जो वैज्ञानिक रूप से सोचते हैं। जो अर्थव्यवस्था के बारे में पारदर्शी धारणाओं का उपयोग करते हैं और साक्ष्य व तर्क के जरिए निष्कर्ष निकालने के लिए एक व्यवस्थित दृष्टिकोण का उपयोग करते हैं। लेकिन इन विद्वानों को अर्थशास्त्र के पेशे से बाहर रखा गया है। और यही अर्थशास्त्र का काम है कि वह वास्तविक धारणाओं और आर्थिक वास्तविकताओं को नकारते हुए, उन मॉडलों का निर्माण करता है, जो आपदाओं और महामारी के दौरान नीति निर्धारित करते हैं।

ट्रम्प ने घोषणा की कि वह कुछ हफ्तों के भीतर फिर से कारोबार शुरू करवाना चाहते हैं। इस घोषणा पर यह चर्चा हुई कि अर्थशास्त्रियों की बात सुनी जाए या डॉक्टरों की। यह दो विज्ञानों के बीच कोई विवाद नहीं है। यहां विज्ञान का काम केवल डॉक्टर कर रहे हैं। पूर्व के वायरस और संकट हमें केवल संकेत दे सकते हैं। इस संकट को लेकर हमारे पास जो सबसे सार्थक आंकड़े हैं, वे उन देशों से आते हैं, जो इस संकट से बुरी तरह ग्रसित है, जैसे, चीन, कोरिया, इटली, ईरान आदि। कोई भी सांख्यिकी प्रयोग हमें इसी डेटा से शुरू करना होगा और किसी भी समाधान को तलाशने के लिए हमें इन्हीं उदाहरणों का अध्ययन करना होगा। ट्रम्प और वैसे वैश्विक दक्षिणपंथी, जो उनका अनुसरण करते हैं (बोल्सोनारो, जॉनसन, आदि) महामारी विज्ञान से उसी तरह घृणा करते हैं, जैसे वे जलवायु विज्ञान का तिरस्कार करते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि विज्ञान उन वास्तविकताओं की बात करता है, जो सीधे-सीधे उनकी विचारधाराओं को चुनौती देते हैं और उनकी विचारधाराओं के प्रचार-प्रसार में व्यावधान पैदा करते हैं। विज्ञान इस बात को लेकर स्पष्ट है कि जीवन बचाने का काम, सुपर-रिच देशों द्वारा समाज और पर्यावरण के विनाश के लिए किए जा रहे कार्यों में बाधा उत्पन करेगा।

जलवायु विज्ञान के बारे में एक दशक पहले विज्ञान गल्प कथा (साइंस फिक्शन) लेखक किम स्टेनली रॉबिन्सन ने जो कहा था, वह इस वक्त सच होता दिख रहा है। उन्होंने कहा था, “इस वक्त जो हो रहा है, वह विज्ञान और पूंजीवाद के बीच एक बहुत बड़ा वैश्विक ऐतिहासिक युद्ध है। विज्ञान हर दिन और जोरदार तरीके से कह रहा है कि यह एक वास्तविक और वर्तमान खतरा है। पूंजीवाद कह रहा है कि यह खतरा नहीं है, क्योंकि अगर यह सच है तो इसका अर्थ होगा अर्थव्यवस्थाओं पर अधिक सरकारी नियंत्रण, अधिक सामाजिक न्याय (जलवायु स्थिरीकरण तकनीक के रूप में) आदि।”अगर हम विज्ञान को सुन सकें, तो विज्ञान इस वक्त हमारी मदद कर सकता है। दूसरी ओर रूढ़िवादी आर्थिक मॉडलों का अनुसरण जारी रहा तो लोगों को निश्चित रूप से उसी तरह मार दिया जाएगा जैसाकि एक सदी पहले मारा जाता था।

(लेखक यॉर्क यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ एनवायरमेंट स्टडीज में असोसिएट प्रोफेसर हैं। लेख प्रेसेंजा से साभार)