Sign up for our weekly newsletter

महामारियों के लिए जाना जाता है यह देश, अब कोविड-19 से निपट रहा है

अफ्रीकी देशों ने अतीत से सबक लेते हुए कई जानलेवा महामारियों से बेहतर बचाव किया है लेकिन कमजोर स्वास्थ्य तंत्र और उच्च मृत्युदर वाले ये देश कब तक ऐसा कर पाएंगे? दक्षिण अफ्रीका से एंजेला डुवनेज, नाइजीरिया से बेनेट ओगिफो और मैना वारूरू, केन्या से अगाथा नगोथो, सेनेगल से अडोल्फस मोवोलो, रवांडा से क्रिस्टोफ हितायेजू और डीआर कांगो से आंद्रे पेलिस नदीमुरुकुंडो की रिपोर्ट

On: Tuesday 02 June 2020
 
बदनसीब अफ्रीका की खुशकिस्मती
आधारभूत स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रहे अफ्रीकी देश कोरोनावायरस के मामलों से बेहद सावधानी बरत रहे हैं। जरा-सी चूक घातक हो सकती है आधारभूत स्वास्थ्य सुविधाओं से जूझ रहे अफ्रीकी देश कोरोनावायरस के मामलों से बेहद सावधानी बरत रहे हैं। जरा-सी चूक घातक हो सकती है

दक्षिण अफ्रीकी डेयरी चैंपियनशिप के 187 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत करने के लिए कोई रंगारंग कार्यक्रम नहीं हुआ और न ही इसमें लाखों दर्शकों की मौजूदगी रही। इस प्रतियोगिता के विजेताओं की घोषणा 26 मार्च, 2020 को फेसबुक लाइव के जरिए की गई। ऐसा कोई नई रिवायत शुरू करने के लिए नहीं किया गया, बल्कि कोविड-19 महामारी के डर के चलते ऐसा हुआ। प्रतियोगिता का आयोजन दक्षिण अफ्रीका में कोरोनावायरस के संक्रमण को रोकने के लिए शुरू होने वाले 21 दिनों के लॉकडाउन से महज 12 घंटे पहले किया गया था। 27 अप्रैल 2020 तक अफ्रीकी महाद्वीप में कोरोनावायरस के कुल 32,887 मामलों में सर्वाधिक 4,546 मामले दक्षिण अफ्रीका में थे। हालांकि मृत्यु के मामले में यह देश अलजीरिया, मोरक्को और इजिप्ट के बाद चौथे स्थान पर था। दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने लॉकडाउन के 4 दिन बाद ही एहतियातन घर-घर जाकर कोरोनावायरस को लेकर स्क्रीनिंग शुरू कर दी। करीब 10,000 कर्मचारियों को इस काम में लगाया गया।

दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा, “जिन लोगों में कोरोनावायरस संक्रमण के लक्षण नजर आ रहे हैं, उन्हें जांच के लिए लोकल क्लीनिक या मोबाइल क्लीनिक में भेजा जाएगा। जिनमें कोरोनावायरस का संक्रमण पाया जाता है लेकिन उनमें कोई लक्षण नहीं आता है या बिलकुल कम लक्षण दिखता है, उन्हें घरों में या सरकार निर्मित आइसोलेशन सेंटर में रखा जाएगा।” महामारी को लेकर अफ्रीकी देश अति सावधान रहे हैं। दक्षिण अफ्रीका की तरह केन्या ने 12 मार्च से दो हफ्ते के लिए स्कूल व अन्य शैक्षणिक संस्थानों को बंद करने से पहले ऑनलाइन पठन-पाठन की तैयारी कर ली थी। केन्या सरकार के एक अंग केन्या इंस्टीट्यूट ऑफ कैरिकुलम डेवलपमेंट ने रेडियो व टेलीविजन के माध्यम से स्कूल कार्यक्रमों की जानकारी देनी तेज कर दी। केन्या के शिक्षा मंत्री जार्ज मगोहा ने कहा, “बंदी के चलते 1.5 करोड़ स्कूली बच्चे (प्राथमिक व माध्यमिक) घरों में हैं और उन्हें घरों में पढ़ाई के लिए दिशानिर्देश की जरूरत है।”

पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल में साल 2014 में इबोला संक्रमण के एकमात्र मरीज की जांच की गई थी। इबोला ने लाइबेरिया, गिनी और सियरा लियोन को प्रभावित किया था। इसके 6 साल बाद अब कोविड-19 महामारी फैली है। साल 2014 की महामारी के अनुभवों से प्रशासन को मौजूदा महामारी से मुकाबला करने के लिए प्रभावी कदम उठाने में मार्गदर्शन मिला। स्वास्थ्य मंत्रालय के पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर के डायरेक्टर अब्दोलाय बोसो ने कहा, “इस महामारी से मुकाबले के लिए सबसे पहली प्रतिक्रिया सभी कार्रवाइयों का नेतृत्व और उनमें सामंजस्य बनाए रखने के लिए इमरजेंसी ऑपरेशंस सेंटर की स्थापना थी।” उन्होंने आगे कहा, “लोगों को जागरूक करने के लिए संदेश तैयार करने में हमें पूर्व के अनुभवों से सीख लेने की जरूरत थी।” संक्रामक रोगों जैसे खसरा-रूबेला, मैनिंजाइटिस, तपेदिक और रेबीज से सेनेगल ने बेहतर तरीके से निबटा है जिससे ये देश अपने पड़ोसियों से बेहतर स्थिति में है।

महामारी को लेकर लोगों की समझ बढ़ाने के लिए सरकार ने अहम सूचना को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक प्रसारित करने में समुदायों को एकजुट कर उनका सहारा लिया। इतना ही नही, सरकार समाज को प्रभावित करने वाले लोगों मसलन संगीतकारों और धार्मिक गुरुओं का भी सहारा ले रही है ताकि ये अपने फैन और अनुयायियों तक संदेश पहुंचा सकें। गिनी के जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ और एपिडेमियोलॉजिस्ट अल्पा बैरी ने कहा, “समुदाय आधारित निगरानी को शामिल करने के लिए देश के पास एक मजबूत एकीकृत रोग निगरानी व कार्य तंत्र है।” अल्पा बैरी ने 2014 में पश्चिमी अफ्रीका में आई इबोला महामारी से लड़ाई को नेतृत्व दिया था।

सक्रिय प्रतिक्रियाओं के बावजूद, अफ्रीका एक ऐसा महाद्वीप भी है जिसका स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा नाजुक हैं। ऐसे में उम्मीद रहती है कि वह अति चौकन्ना रहेगा। दूसरी तरफ, पिछले महीने की तुलना में हाल में कोविड-19 के संक्रमण की गति तेज रही है। 15 मार्च से लेकर महीने के अंत तक प्रभावित देशों की संख्या 9 से बढ़कर 41 हो गई। 6 अप्रैल तक अफ्रीकी महाद्वीप के सभी देशों से संक्रमण की खबरें आने लगीं और कोविड-19 के पॉजिटिव मामले 9,000 से ज्यादा हो गए। 27 अप्रैल तक कुल मामलों की संख्या 32,887 पहुंच गई, जबकि मौत का आंकड़ा 1,431 हो गया। अफ्रीकी देशों में एचआईवी/एड्स व कुपोषण को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 से घातक हालात बनने की चेतावनी दी थी। अफ्रीका में स्वास्थ्य का नाजुक बुनियादी ढांचे तो जगजाहिर है।

अफ्रीका सबसे युवा महाद्वीप है और इसकी औसत आयु 19.7 वर्ष है (चीन में यह 38.4 वर्ष है)। कोविड-19 ने 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित किया है और उनके लिए घातक साबित हुआ है जिनका शारीरिक स्वास्थ्य नाजुक है। हालांकि, हमारे पास कोई स्पष्ट ट्रेंड नहीं है कि ये वायरस कैसा व्यवहार करता है, सिवाय इसके कि इस वायरस ने महिलाओं से ज्यादा पुरुषों की जान ली है। लेकिन, अफ्रीका की युवा आबादी स्वस्थ नहीं है बल्कि कुपोषण, एनीमिया, मलेरिया, एचआईवी/एड्स और टीबी की चपेट में है। कोविड-19 संक्रमण के गंभीर मामलों का इलाज वेंटिलेटर, बिजली और ऑक्सीजन पर निर्भर करेगा। प्रति व्यक्ति अधिकतम इंटेंसिव केयर बेड की उपलब्धता को लेकर किए गए एक वैश्विक विश्लेषण में अफ्रीका के एक भी देश को जगह नहीं मिली है।

मसलन लाइबेरिया में वेंटिलेटर के साथ एक भी इंटेंसिव केयर यूनिट नहीं है। युगांडा में 1,00,000 की आबादी पर 0.1 आईसीयू बेड है। इसके विपरीत संयुक्त राज्य अमेरिका में 1,00,000 की आबादी पर 34.7 बेड हैं। इसके अलावा अफ्रीकी देशों में लॉकडाउन के दौरान लाखों लोगों को भोजन उपलब्ध कराना तात्कालिक चिंता है। कांगो की डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ने कोविड-19 के हॉटस्पॉट किनशासा में 28 मार्च से तीन हफ्ते की गृहबंदी की घोषणा की है। गृहबंदी के बीच राशन वगैरह की आमद के लिए चार दिनों की ढील दी गई। लेकिन, गृहबंदी की घोषणा के साथ ही खाद्य पदार्थों को जमा कर रखने के लिए लोग बाजारों में टूट पड़े। दोपहर तक किनशासा के सेंट्रल मार्केट में कुछ चीजें मुश्किल से मिल पा रही थीं। किनशासा की रहने वाली मरियम ग्लाबिजे कहती हैं, “मैंने लगभग पूरी मार्केट घूम ली, लेकिन मुझे टॉयलेट पेपर नहीं मिला। पता नहीं आलू भी मिलेगा कि नहीं।” किनशासा निवासी व दिहाड़ी मजदूर मुगोली कमुनानी का कहना है, “हमें गृहबंदी के बारे में पहले आगाह नहीं किया गया था। हम लोग भूखे मर जाएंगे।” सड़क किनारे दुकान लगाने वाले चार्ल्स मुकेंदी म्वेंजेले ने कहा, “हम रोज की कमाई पर जिंदा हैं। दूसरी तरफ यूरोपियन यूनियन अपने नागरिकों को भोजन कराता है, लेकिन कांगो का उससे मतभेद है।”

सेनेगल में लोग एक अलग तरह की समस्या से भी जूझ रहे हैं। सेनेगल के ज्यादातर लोग दिन के पहले भोजन में तपालपा ब्रेड लेते हैं। ये ब्रेड कियोस्क में बिकती थे, लेकिन कोविड-19 की महामारी के चलते सरकार ने कियोस्क में इसकी बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। इसकी जगह सीधे बेकरी से ब्रेड खरीदने की अपील की है। कियोस्क में बिक्री पर प्रतिबंध के कारण सोशल डिस्टेंसिंग की अनदेखी करते हुए बेकरियों के बाहर लोगों की भारी भीड़ उमड़ने लगी। 34 वर्षीय मलिक बा पास की एक बेकरी से रोजाना अपने परिवार के लिए ब्रेड खरीदते हैं। उन्होंने कहा कि बेकरी में लोगों की अस्त-व्यस्त भीड़ से उन्हें चिंता होती है। वह बताते हैं, “भीड़ को श्रृंखलाबद्ध नहीं किया जाता है। मुझे डर है कि कुछ लोग बहुत आसानी से कोरोनावायरस के संक्रमण का शिकार हो सकते हैं या संक्रमण फैला सकते हैं।”

महामारी के दौरान और उसके बाद भोजन एक मुद्दा रहेगा। कृषि प्रधान देश रवांडा में प्रतिबंध के चलते किसानों को बहुत मुश्किल हो रही है। अधिकारियों की तरफ से यह कहने के बावजूद कि कृषि कार्यों पर प्रतिबंधों का कोई असर नहीं पड़ेगा, कृषि उत्पाद के डीलर जेरेमी रूहिरवा को फर्टिलाइजर खरीदने में दिक्कत आ रही है। रूहिरवा गसाबो जिले के नतुंगा सेक्टर के गांवों में खेतीबाड़ी में इस्तेमाल होने वाले उत्पादों की बिक्री करते हैं। उन्होंने बताया कि वह थोक विक्रेता से डीएपी नहीं खरीद पा रहे हैं। उन्होंने बताया, “कृषि इनपुट की खरीद के लिए पहले पेमेंट करना पड़ता है। मैंने बैंक जाकर पेमेंट कर दिया और मोटरसाइकिल से लगभग एक घंटे सफर कर स्टोर तक पहुंचा, लेकिन ऑफिस और स्टोर बंद था। वहां मेरे कुछ साथी मौजूद थे। हम लोगों ने मिलकर स्टोर के कर्मचारी को फोन किया, तो उसने आने में असमर्थता जाहिर की। उसने हमें बताया कि 21 मार्च से बंदी के कारण वाहन नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में जिन किसानों को डीएपी की जरूरत है, उन्हें डीएपी नहीं दे पा रहा हूं। इस सूरत में किसान डीएपी की जगह दूसरे फर्टिलाइजर का इस्तेमाल करेंगे। इससे उत्पादन पर असर पड़ेगा।” अर्थव्यवस्था के विश्लेषक टेडी कबेरुका कहते हैं, “ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो गैर-कृषि व्यवसायों से कमाई करते हैं और वही पैसा खेती में लगाते हैं। लेकिन, गैर-कृषि व्यवसाय ठप पड़ा हुआ है। इनमें से ज्यादातर व्यवसाय शहरों में हैं। मगर, इन व्यवसायों से जुड़े लोगों का परिवार गांवों में रहता है और जीवनयापन के लिए इन्हीं व्यवसायों पर निर्भर है।”

अफ्रीका एग्रीकल्चर स्टेटस रिपोर्ट 2018 के मुताबिक, महाद्वीप की आबादी का 70 प्रतिशत हिस्सा खेतीबाड़ी पर निर्भर है। इनमें से बड़े तबके के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। ये तबका ही बंदी से सबसे अधिक प्रभावित है। न्याबिहु जिले में जमीन के छोटे से टुकड़े पर खेती करने वाले किसान रियोजेने बहानुगिरा ने कहा, “मैं एक स्कूल में पढ़ाता हूं और उसकी कमाई से ही खेती करता हूं। लेकिन स्कूल बंद है। अभी बुआई का सीजन है, लेकिन पूंजी नहीं होने से बीज और फर्टिलाइजर नहीं खरीद नहीं पा रहा हूं।” इम्बरागा फार्मर्स ऑर्गनाइजेशन के महासचिव और किसान जोसेफ गफरांगा ने कहा, “हम लोग खेती में दैनिक मजदूरों की मदद लेते हैं, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग को बरकरार रखने के लिए जरूरत से काफी कम मजदूर लगाने पड़ रहे हैं। इस वजह से बहुत वक्त लग रहा है। दूसरी तरफ, हाल ही में मैं वाहन से सेम की ढुलाई करना चाहता था‌। मुझे बताया गया कि लॉकडाउन के चलते वाहनों के परिचालन के लिए आदेश लेना होगा। लेकिन, मुझे पता चला कि आदेश लेने की प्रक्रिया काफी लंबी चलती है, इसलिए मैंने इसकी ढुलाई के लिए मजदूरों को लगाया। इससे उत्पादन लागत बढ़ जाएगी।”

2019 में केन्या की 26 काउंटी में टिड्डी दल का हमला हुआ। अब कोविड-19 के चलते कीटनाशकों का आयात कम होने से किसानों की दिक्कत बढ़ गई है

जो इलाके टिड्डी के हमले से प्रभावित रहे हैं, वहां कोविड-19 महामारी के कारण चीजें और भी मुश्किल हो गई हैं। गौरतलब हो कि केन्या में टिड्डी के बारे में पहली जानकारी 28 दिसंबर 2019 में मिली थी, जब टिड्डी दल सोमालिया से सीमा पार कर आ गया था। अब तक ये टिड्डी दल केन्या के 47 में से 26 काउंटी के कृषि उत्पादों को बर्बाद कर चुका है। कृषि, पशुपालन, मंत्रालय और सहकारी के कैबिनेट सेक्रेटरी पीटर मुन्या ने 15 जनवरी को एक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि रेगिस्तानी टिड्डी को नियंत्रित करने के लिए नेशनल ट्रेजरी से मंत्रालय को 530 शिलिंग (सोमालिया की करेंसी) मिली है। उन्होंने कहा, “हम उन क्षेत्रों में ज्यादा फोकस कर रहे हैं, जिन क्षेत्रों में टिड्डी ने अधिक नुकसान पहुंचाया है। प्रभावित क्षेत्रों में हवा से कीटनाशक का छिड़काव किया जा रहा है। हालांकि, मौजूदा कोविड-19 महामारी के कारण इस काम में सुस्ती आई है क्योंकि कीटनाशक व मशीन की पर्याप्त सप्लाई नहीं हो रही है। जब टिड्डी का हमला होता है, तो उनके ठिकाने का पता लगाया जाता है और उसके प्रजनन स्थल पर नजर रखी जाती है।

फरवरी में फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेश (एफएओ) ने 600 नेशनल यूथ सर्विसमैन को प्रशिक्षित किया, जिन्हें टिड्डी नियंत्रण अभियान पर लगाया गया। टिड्डी पर काबू करने के केन्या सरकार के उपायों को और मजबूत करने की योजना थी। इसके तहत प्रशिक्षितों में से 30 को दोबारा प्रशिक्षित किया जाना था, जो प्रभावित देशों की 900 स्थानीय टीमों को प्रशिक्षित करते। ये टीम ग्राउंड पर जाकर निगरानी और टिड्डियों की गतिविधियों को नियंत्रित करती है। ये टीम टिड्डी पर नियंत्रण करने के लिए डेटा उपलब्ध कराने में भी अहम भूमिका निभाएगी। लॉकडाउन से किसानों को भी नुकसान हो रहा है क्योंकि वे अपना उत्पाद नहीं बेच पा रहे हैं। कृषि मंत्रालय से मिले आंकड़ों के मुताबिक, सब्जी और फल बाजार में व्यापारिक गतिविधियां कम हो रही हैं, क्योंकि निर्यातक अपनी क्षमता का महज 25-30 प्रतिशत माल ही खरीद रहे हैं। जिन किसानों से माल खेत में खरीद लिया जाता था, उनके खेतों से अभी माल नहीं उठाया जा रहा है। इससे किसानों को क्षति हो रही है। केन्या से फूलों का निर्यात यूरोपीय देशों में होता है, लेकिन यूरोप में लॉकडाउन के कारण पिछले महीने केन्या के फूल किसानों की कमाई में 70 प्रतिशत का नुकसान हो चुका है।

महामारी से मुकाबले की तैयारी

ऐसा पहली बार नहीं है कि अफ्रीकी देशों में महामारी फैली है। कुछ हद तक महामारी के फैलाव को देखते हुए यहां इस बीमारी से लड़ने के लिए बेहतर तैयारी है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में हाल में इबोला का एक भी केस सामने नहीं आया है और यहां के डॉक्टर समस्या की गंभीरता से बखूबी वाकिफ हैं। कांगो के डॉक्टर और नर्स लाइबेरिया, सिएरा लियोन और गिनी में इबोला की रोकथाम में शामिल थे। यहां जागरुकता संदेश लोगों तक पहुंचाना आसान है क्योंकि लोग हाल ही में इबोला से उभरे हैं। लोग अभी एकजुट हैं। यह बात व्यवहार बदलाव और सामुदायिक सहभागिता के कम्युनिकेशन एक्सपर्ट रोड्रिगेज कसांडो ने कही। उन्होंने आगे बताया, “गृहबंदी और सोशल डिस्टेंसिंग कांगो के लिए नया एहतियाती कदम है और यहां के लोग इबोला‌ से बचाव को लेकर साफ-सफाई के आदी हो गए हैं। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग पर ज्यादा फोकस की जरूरत है। इसके साथ ही साफ-सफाई के उपायों पर भी जोर दिया जाना चाहिए क्योंकि कोविड-19 का संक्रमण हवा के जरिए होता है। इबोला के मामले में ऐसा नहीं था।” कसांदो कहते हैं, “इबोला से मुकाबले में खर्च का हमारा अनुभव बताता है कि कोविड-19 से निबटने के लिए आकस्मिक प्लान के तहत दिए जा रहे 135 मिलियन यूएस डॉलर में जागरुकता की जरूरत, सुरक्षात्मक और स्क्रीनिंग उपकरणों की खरीद, दवाओं की खरीद और कर्मचारियों के भुगतान खर्च नहीं किया जा सकता है। कसांदो ने मशविरा दिया है कि कांगो की सरकार को चाहिए कि वह आधारभूत ढांचा मजबूत करने और सहायक उपकरण खरीदने के लिए जरूरी आर्थिक मदद लेने में सहयोगी देशों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की मदद ले क्योंकि मौजूदा आर्थिक मदद अपर्याप्त है।

एएलआईएमए (द अलायंस फॉर इंटरनेशनल मेडिकल एक्शन) ने संक्रामक रोग के संदिग्ध और पुष्ट मामलों की जांच व परीक्षण में फन्न यूनिवर्सिटी अस्पताल की संक्रामक रोग इकाई को सहयोग करने के लिए इंस्टीट्यूट पास्चर ऑफ डकर के साथ समझौता किया है। इस संस्थान ने अफ्रीका में स्वास्थ्य विशेषज्ञों, दवाओं और जरूरी मेडिकल आपूर्ति कराने को कहा है। संगठन चेतावनी दे रहा है कि बहुत सारे अफ्रीकी देश जहां की स्वास्थ्य व्यवस्था दुनिया के सबसे नाजुक स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में शामिल हैं और जहां यूरोप, चीन व अमेरिका के मुकाबले बेहद कम संसाधन उपलब्ध हैं, उन देशों में तबाही संभावित है। संगठन के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर आगस्टीन आगियर ने कहा, “सब-सहारन अफ्रीका में स्वास्थ्य सिस्टम पहले से ही बेहद नाजुक है। ऐसे में इन क्षेत्रों में महामारी के फैलाव से दुनिया के बाकी हिस्सों के मुकाबले मृत्यु दर ज्यादा होगी।” आगियर कहते हैं, “चूंकि मानव संसाधन और भौतिक संसाधन मसलन हॉस्पिटलाइजेशन और बेड अपर्याप्त हैं, इसलिए यहां कोविड-19 से संबंधित मृत्यु बाकी दुनिया के मुकाबले 3-5 गुना ज्यादा होगी।” उन्होंने कहा कि अफ्रीकी देशों ने अब तक जो निवारक कदम उठाए हैं, वे वैध व स्वागतयोग्य हैं। हालांकि, इनमें से कुछ कदम मानवीय कर्मियों के संचलन और सामान की डिलीवरी से संबंधित हैं। ये कदम मानवीय मदद के लिहाज से आवश्यक हैं क्योंकि जब कोविड ​​-19 से लड़ने की जरूरत बढ़ेगी, तो ऐसा करना असंभव होगा। दक्षिण अफ्रीका भी अपने पूर्व के अनुभवों से सीख रहा है। स्टेलेनबोस्च विश्वविद्यालय से जुड़े जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ और वेस्टर्न केप प्रोविंस आउटब्रेक रिस्पांस टीम के सदस्य केरिन बेग ने खुलासा किया कि देश के सभी 9 प्रांतों की आउटब्रेक रिस्पॉन्स टीम मेडिकल स्टाफ को वायरस के फैलाव को रोकने व वेंटिलेटर तथा अन्य उपकरणों को किटाणुरहित करने के लिए आपातकालीन ट्रेनिंग दे रही है।

ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) भी हवावाहित और खांसते या छींकते वक्त निकलने वाली तरल बूंदों से फैलता है। अफ्रीका के पास टीबी से निबटने में मिली सीख भी है। बेग विस्तार से बताते हैं, “दक्षिण अफ्रीका के टीबी अस्पतालों में या बहुत सारे टीबी मरीजों के साथ काम करने वाले स्टाफ इस संकट से निबटने में संभवतः सबसे ज्यादा सक्षम होंगे। वे मास्क पहनना, नियमित हाथ धोना, कमरों में हवा की मौजूदगी सुनिश्चित करने और मरीजों को आइसोलेट करने की जरूरत के बारे में जानते हैं। वे ये भी जानते हैं कि पर्सनल प्रोटेक्टिव क्लोथिंग (पीपीसी) को कैसे निकाला और सुरक्षित ठिकाने लगाया जाता है। वे जानते हैं कि किसी नए मरीज को लगाने से पहले वेंटिलेटर की पूरी सफाई क्यों जरूरी है।” डरबन में अफ्रीका स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान के सब-सहारन अफ्रीकन नेटवर्क फॉर टीबी/एचआईवी रिसर्च एक्सिलेंस (एसएएनटीएचई) के प्रोग्राम एग्जिक्यूटिव मैनेजर वायरोलॉजिस्ट डेनिस चोपेरा ने कहा, “रणनीतिक तौर पर हमारी सरकार की तारीफ की जानी चाहिए, क्योंकि हमने जो रुख अपनाया है, वह इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशों के शुरुआती चरणों से अधिक मजबूत है।” उन्होंने नब्बे के दशक के शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहा, “साल 1980 में जब दक्षिण अफ्रीका में एचआईवी के मामले आने शुरू हुए, तो बहुत सक्रियता नहीं थी क्योंकि उस वक्त नेतृत्व कमजोर था और कुछ अलग मान्यताएं थीं। हम लोगों ने लंबे समय तक कुछ भी नहीं किया। लेकिन, जब हमने पुरजोर तरीके से निबटना शुरू किया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।”

उन्हें उम्मीद है कि किए गए मजबूत उपाय और इसके साथ गर्म जलवायु व युवा आबादी जैसे कारक मददगार होंगे और इस महामारी के जरिए दुनिया दक्षिण अफ्रीका की तैयारी की हकीकत देखेगी। चोपेरा ने कहा, “हमने पूर्व के कठिन अनुभवों से सीखा कि वायरस को नियंत्रित करने के लिए हमें सामने रहकर लड़ाई लड़नी होगी। कठोर उपायों पर होने वाला खर्च अर्थव्यवस्था की कीमत पर ही क्यों न हो, वह कुछ नहीं करने की कीमत से कम ही होती है।”