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कोरोनावायरस: क्या भारत में सामुदायिक प्रसार शुरू हो गया है?

भारत फेज 3 में, सरकार का इंकार लेकिन विशेषज्ञ इस दावे को ले कर आश्वस्त नहीं

By Banjot Kaur

On: Monday 23 March 2020
 
Coronavirus. The novel coronavirus has mutated, researchers said. Photo: WHO

केंद्र सरकार का कहना है कि भारत में नोवेल कोरोनावायरस महामारी (कोविड-19) के सामुदायिक प्रसार (कॉम्युनिटी ट्रांसमिशन) का कोई मामला सामने नहीं आया है। लेकिन कुछ विशेषज्ञ इस दावे को ले कर संदेह जता रहे हैं।

कम से कम दो कोविड-19 मामले ऐसे हैं, जिनके यात्रा इतिहास का अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है। क्या ये मामले सामुदायिक प्रसार की शुरुआत का संकेत हो सकते हैं?

सामुदायिक प्रसार इस संक्रमण का तीसरा चरण है, जहां एक व्यक्ति का संक्रमण प्रभावित देशों की यात्रा का इतिहास उपलब्ध नहीं होता है या वह एक पुष्ट मामले के संपर्क में आ कर संक्रमित नहीं हुआ हो।

सन्देह के घेरे में आए दो मामलों में से एक तमिलनाडु का रहने वाला 20 वर्षीय आदमी है, जिसका टेस्ट 21 मार्च को पॉजिटिव आया था। हालांकि, केंद्र सरकार यह नहीं बता पाई है कि वह कहां से संक्रमित हुआ। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सी विजय भास्कर ने इसे  "घरेलू मामला " कहा है, जिसका कोई यात्रा इतिहास नहीं है।

दूसरा मामला पुणे की 41 वर्षीय महिला का है जिसकी हालत अब गंभीर है। उसके केस की पुष्टि 20 मार्च को हुई थी। तमिलनाडु के पुरुष की तरह ही उसका भी कोई यात्रा इतिहास नहीं है, जैसाकि जिला मजिस्ट्रेट ने कहा है।

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय  के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने  21 मार्च, 2020 को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा, "हम अभी भी संपर्क का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं।"

उन्होंने बताया कि संपर्क की पहचान तय करने के दिनों की संख्या की एक सीमा थी, जिसके बाद यह घोषित किया गया था कि संपर्क का पता नहीं लगाया जा सकता है। हालांकि, मंत्रालय के एक अन्य अधिकारी ने संपर्क की पहचान करने के उपायों में गंभीर कमी की ओर जरूर इशारा किया।

20 मार्च को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की महामारी विज्ञान विभाग के प्रमुख आर गंगाखेडकर ने कहा, "मैंने भी यह सुना है कि संपर्क का पता नहीं लगाया जा सका है।" लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि इसे सामुदायिक प्रसार नहीं माना जाएगा। लेकिन, आईसीएमआर के सेंटर फॉर एडवांस रिसर्च फॉर वायरोलॉजी के पूर्व प्रमुख टी जैकब जॉन मानते है कि इस आशंका को इतनी आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा,“ एक या दो मामले व्यापक सामुदायिक प्रसार का मामला नहीं हो सकते लेकिन इसके संकेत जरूर हो सकते है।”

परीक्षण मानदंड क्यों बदला गया?

सिर्फ दो दिन पहले, आईसीएमआर ने 826 नमूनों के परिणाम सार्वजनिक किए। इन्हें गंभीर सांस की बीमारी से पीड़ित उन लोगों से एकत्र किए गए थे जिनका अंतरराष्ट्रीय यात्रा और संक्रमित व्यक्ति से संपर्क का कोई इतिहास नहीं था। उन सभी का नोवेल कोरोना वायरस (सार्स-सीओवी-2) निगेटिव पाया गया था।

आईसीएमआर  ने दावा किया था कि परीक्षण मानदंडों का विस्तार करने का कोई कारण नहीं था। हालांकि, 21 मार्च की सुबह, इसने उन लोगों की भी कोविड​​-19 जांच कराए जाने की अनुमति दे दी, जिन्हें सांस की गंभीर बीमारी थी और जिनका कोई यात्रा या संपर्क इतिहास नहीं था। अब निर्णय में ये बदलाव क्या बताता है?

हालांकि अग्रवाल ने इस बदलाव के बारे में कुछ भी बताए बिना ये कहा कि ऐसा  ’बदली हुई स्थिति’ के कारण किया गया। वहीं मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, "मंत्रालय ने सिर्फ आईसीएमआर को बताया कि अगर किट की कोई कमी नहीं है, तो जांच का दायरा बढाने में कोई बुराई नहीं है।"

20 मार्च को सरकार ने निजी लैब (प्रयोगशालाओं) के लिए मापदंड का खुलासा किया।

सरकार ने हैंड सैनिटाइजर और मास्क की अधिकतम कीमतें भी तय की हैं। केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के सचिव पवन अग्रवाल ने कहा, "200 मिलीलीटर सैनिटाइजर बोतल का एमआरपी 100 रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए वहीं 2-प्लाई मास्क 8 रुपये और 3-प्लाई मास्क 10 रुपये का होना चाहिए।"

हालांकि, ये नियम बाजार में मौजूदा उत्पादों पर लागू नहीं होगा बल्कि आगे से निर्मित होने वाले नए उत्पादों पर लागू होगा। सैनिटाइजर और मास्क की कमी पर अंकुश लगाने के लिए, इथेनॉल डिस्टिलर्स को अनिवार्य अनुमति के बिना सैनिटाइजर निर्माण की अनुमति दे दी गई है।

अग्रवाल ने दावा किया कि रविवार का “जनता कर्फ्यू” वायरस प्रसार चेन तोड़ने में मदद करेगा। लेकिन क्या इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण है, इसके जवाब में वे चुप रह जाते हैं।