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कोरोना महामारी लोगों की बेतहाशा मौत के रूप में ले सकती है बड़ी कीमत  

इसकी भविष्यवाणी भी की गई थी, लेकिन हमने कभी नहीं माना कि संपन्न दुनिया में एक ढहती हुई संरचना हम सभी को अपना शिकार बनाएगी

By Richard Mahapatra

On: Tuesday 31 March 2020
 
एक एनडीआरएफ कर्मचारी लोगों के हाथ सेनिटाइज करते हुए। फोटो: विकास चौधरी
एक एनडीआरएफ कर्मचारी लोगों के हाथ सेनिटाइज करते हुए। फोटो: विकास चौधरी एक एनडीआरएफ कर्मचारी लोगों के हाथ सेनिटाइज करते हुए। फोटो: विकास चौधरी

पूरी दुनिया कोरोना के कहर को कंट्रोल करने में लगी हुई है। डायबिटीज और हार्ट अटैक जैसी लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों को छोड़कर अभी तक किसी अन्य बीमारी ने हाल के वर्षों में पूरी दुनिया को इस कदर अपनी गिरफ्त में नहीं लिया था। अंटार्कटिका को छोड़कर कोरोना 30 मार्च 2020 तक दुनिया के 176 मुल्कों के 7.88 लाख से अधिक लोगों को अपनी चपेट में ले चुका है।

कोरोना के कहर को रोकने के लिए विश्व के 112 देशों ने अपनी सीमाएं बंद कर दी हैं, जिससे लगभग 3 अरब लोग एक तरह से कैदी बनकर रह गए हैं। हम ऐसी स्थिति में चले गए हैं, जिसे महामारी से मुकाबले के क्रम में कैद हो जाने वाली स्थिति कहते हैं।

हमारी सारी क्षमता को धता बताते हुए हमारे अदृश्य शत्रु कोविड-19 हमारे रडार से बचकर पूरी दुनिया में फैल चुका है। किसी भी व्यक्ति की उम्मीद से अधिक रफ्तार से यह फैल रहा है।

फरवरी में कोरोनावायरस पर अंग्रेजी मैगजीन ‘डाउन टू अर्थ’  की पहली कवर स्टोरी से लेकर 20 मार्च को प्रकाशित दूसरी कवर स्टोरी के बीच चीन के बाहर यह महामारी 15 गुना फैल गई थी। जो गुना दर गुना बढ़ती ही जा रही है।

21वीं सदी की इस पहली नॉन-फ्लू महामारी को नियंत्रित करने में हमारी असहायता से लोगों में उन्माद और खलबली मची हुई है। हेल्थ एक्सपर्ट्स में भी अब इस महामारी को नियंत्रित करने की नाउम्मीदी बढ़ती जा रही है, क्योंकि हमारे पास अभी तक गरीबों और विकासशील देशों में कोरोना से संक्रमित लोगों के सही आंकड़े नहीं हैं, दूसरी तरफ ये इसकी स्क्रीनिंग, इलाज और गिनती करने में सक्षम भी नहीं हैं।

हमें अभी तक नहीं मालूम कि यह वायरस कैसे और कब किसी जानवर से आदमी में फैल गया। हालांकि, अब हम इस बात से पूरी तरह आश्वस्त हो चुके हैं कि यह वायरस मानव से मानव में काफी रफ्तार में फैलता है। 1918 के स्पैनिश फ्लू महामारी से सुराग लेते हुए हमें (सोशल एनिमल) सोशल डिस्टैंसिंग की सलाह दी गई है। इसका मतलब है कि अगर हम कोविड-19 को नहीं रोक सकते हैं तो कम से कम इसके संक्रमण को रोकने के लिए हमें दूसरे लोगों से कम से कम 3 फीट की दूरी पर होने चाहिए।

कोरोनावायरस हमारे लिए नया नहीं है, बल्कि कोविड-19 हमारे लिए नया है। यह इस सदी की तीसरी पीढ़ी का लोगों में फैलने वाला कोरोनावायरस है।

माना जाता था कि अपने विस्तार के लिए कोरोनावायरस ने लोगों में अपनी जड़ जमा ली है, और यह हमें कमजोर करेगा, न कि हमारी जान लेगा। लेकिन हो रहा इसका उल्टा, यह बड़े पैमाने पर लोगों की जान भी लेने लगा है।

कोविड-19 पहले के दो संक्रमणों- सार्स और मार्स को मिलाकर जितनी जानें गई थीं, उससे अधिक लोगों को मौत की नींद सुला चुका है। कोविड-19 से होने वाला संक्रमण भी अभी तक पाए गए पैटर्न्स यानी तौर-तरीकों के अनुरूप नहीं हैं। इसके फैलने के तरीके शुरुआत में सामान्य होते हैं, जो समझ में नहीं आते हैं और कई मामलों में तो टेस्ट में पता चलने के बाद भी ये गायब हो जाते हैं।

यही कारण है कि कोविड-19 का फैलाव रुक नहीं पा रहा है। हम वैसे लोगों का इलाज नहीं कर सकते, जिनमें इस तरह के कोई लक्षण नहीं हैं। चीन में इसके सामने आने के बाद बाकी देशों में इसकी पहचान के लिए जरूरी स्क्रीनिंग और जांच के उपाय उपलब्ध नहीं थे।

न्यू ईयर की छुट्टियों के तुरंत बाद अफ्रीका में चीनी कामगारों को तुरंत अनुमति दे दी गई और उनकी स्क्रीनिंग नहीं हुई। इसके कारण लोग इस भयंकर महामारी के वाहक बनते चले गए। इस तरह इसे नियंत्रित करना हमारे लिए मुश्किल हो गया।

अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एपिडिमियोलॉजी (महामारी विज्ञान) के प्रोफेसर मार्क लिपसिच ने बताया कि मुझे लगता है कि आखिरकार इस महामारी को नियंत्रित करना संभव नहीं होगा। यही वजह है कि चीन द्वारा 10 करोड़ लोगों को कोविड-19 के फैलने के एपिसेंटर- हुनान में क्वारंटाइन करने के बाद कोविड-19 बड़ी तेजी से दुनिया के अन्य हिस्सों में फैल गया है। 6 मार्च को दुनियाभर में इसके 100,000 मामले थे, जो 18 मार्च तक बढ़कर दोगुने हो गए।

जैसे-जैसे कोविड-19 की रोकथाम के लिए दुनियाभर में स्क्रीनिंग और लोगों को सोशल डिस्टैंसिग करने के आक्रामक तरीके अपनाए जाने लगे, वैसे-वैसे इसके नए एपिसेंटर पैदा होते चले गए। उदाहरण के लिए, यह चीन से निकलकर यूरोप, पश्चिम एशिया और दक्षिण-पूर्वी एशिया और अब अफ्रीका में फैल गया है। इसका मतलब है कि दुनिया को इसे रोकने के लिए अब पहले की तुलना में अधिक बड़े और महंगे तौर-तरीके अपनाने होंगे। इसके तहत संदेह के घेरे में आने वाले हर एक व्यक्ति की पहचान हो और फिर इनके संपर्क में आने वाले बाकी लोगों की भी स्कैनिंग या स्क्रीनिंग हो।

यह वायरस वैश्वीकृत दुनिया (ग्लोबलाइज्ड वर्ल्ड) के ताकतवर संहारक यानी खत्म करने वाले के रूप में सामने आया है। कोविड-19 ने विकसित दुनिया की सभी स्वास्थ्य सुविधाओं (हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर) को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। इस मामले में विकसित दुनिया की कमजोरियां और असफलताएं वैश्विक हो चुकी हैं, क्योंकि संक्रमित लोग इस संक्रमण को लेकर बाकी देश भी चले गए। दूसरी तरफ, विकासशील देश लोगों की आबादी और निवास के मामले में बेहद सघन हैं।

कोविड-19 के पूरी दुनिया में फैलने से इसकी रोकथाम की कोशिशें कमजोर हो गई हैं। यही कारण है कि इसका संक्रमण कई तरीकों से हो रहा है। यह काफी कुछ अनियंत्रित एटोमिक चेन रिएक्शन की तरह है।

20 मार्च तक 8,788 लोगों की मौत के साथ अब कोविड-19 से मौत का खौफ गहराता जा रहा है। यह खौफ अब वास्तविक भी लगने लगा है। माइक्रोबायोलॉजी और वायरोलॉजी में 25 साल से अधिक का अनुभव ऱखने वाले बाल रोग विशेषज्ञ टी जैकॉब जॉन के अनुसार, एक साल में 60 फीसदी भारतीय आबादी इस वायरस से संक्रमित हो सकती है, क्योंकि इसका संक्रमण गहराता जा रहा है। जॉन बताते हैं कि संख्या के मामले में उन्होंने इस तरह का अनुमान इसलिए सामने रखा है, क्योंकि मच्छर या पानी से फैलने वाली बीमारियों के उलट यह सांस से फैलने वाली बीमारी है।

दुनिया अब कोविड-19 के फैलाव को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं है और इसलिए उम्मीद है कि अब यह सामान्य सामुदायिक संक्रमण बन जाएगा, जिससे लड़ने की हम क्षमता विकसित कर लेंगे। हालांकि, इसका यह भी मतलब है कि जब तक हम उस स्तर पर पहुंचेंगे, तब तक कोविड-19 से मरने वालों की संख्या हजारों में हो जाएगी।

नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के ‘साव स्वी हॉक स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ के टिओ यिक-यिंग के अनुसार, कोविड-19 के मामले में सबसे महत्वपूर्ण समय है। संभव है कि 6 से 9 महीनों के दौरान अधिकांश हेल्थ सिस्टम कोविड-19 के मामले में फेल हो जाएं या फिर आने वाले कई वर्षों में ऐसा हेल्थ सिस्टम विकसित हो जाए कि हम इसका सामना करने में पूरी तरह से सक्षम हो जाएं।

इटली और स्पेन में हम पहले से यह स्थिति देख रहे हैं। यही स्थिति भारत और अफ्रीकी देशों में होने जा रहा है। जैसे-जैसे वायरस फैलेगा, पहले से बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर और अधिक दबाव बढ़ जाएगा। इससे मरने वालों की संख्या और बढ़ जाएगी।

लगभग सभी लोग यह मानकर चल रहे हैं कि पूरी दुनिया में फ्लू और कोल्ड का सीजन होता है। इनमें से अधिकांश संक्रामक होते हैं और समय-समय पर ये महामारी का रूप भी ले लेते हैं, लेकिन धीरे-धीरे ये मौसमी बीमारी बनते चले जाते हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम इसी तरह की स्थिति का सामना करने जा रहे हैं। अगर हम एपिडिमिओलॉजिस्ट (वायरल मामलों के विशेषज्ञ) पर यकीन करें तो जल्द नियमित रूप से एक कोविड-19 सीजन होगा, जिस दौरान हमें लोगों की मौत के रूप में इसकी बड़ी कीमत चुकानी होगी।