Sign up for our weekly newsletter

एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स बनता डिप्थीरिया, दुनिया के लिए है बड़ा खतरा

जिस तरह से डिप्थीरिया एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बनता जा रहा है, उसको देखते हुए शोधकर्ताओं को डर है कि आने वाले वक्त में यह संक्रमण दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है

By Lalit Maurya

On: Wednesday 10 March 2021
 
फोटो: यूके डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआईडी)
फोटो: यूके डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआईडी) फोटो: यूके डिपार्टमेंट ऑफ इंटरनेशनल डेवलपमेंट (डीएफआईडी)

जिस तरह से डिप्थीरिया एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी (रेसिस्टेंस) बनता जा रहा है, उसके चलते शोधकर्ताओं को डर है कि आने वाले वक्त में यह रोग दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यदि अन्य संक्रमणों की तुलना में देखें तो डिप्थीरिया को आसानी से रोका जा सकता है। पर हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज द्वारा किए शोध से पता चला है कि यह संक्रमण एंटीबायोटिक दवाओं के कई वर्गों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता को विकसित कर रहा है। जिसके कारण भविष्य में वैक्सीन इसके प्रति उतनी कारगर नहीं रहेंगी।

इस शोध को अंतराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक दल द्वारा किया गया है जिसमें भारत के भी वैज्ञानिक शामिल थे। शोधकर्ताओं के अनुसार हाल ही में कोरोना महामारी ने जिस तरह से टीकाकरण के काम में बाधा पहुंचाई है, उसके चलते संक्रमण का खतरा और बढ़ गया है।

जर्नल नेचर कम्युनिकेशन्स में छपे शोध में वैज्ञानिकों ने रोगियों से इकठ्ठा किए 61 जीनोम और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध बैक्टीरिया के 441 जीनोम का विश्लेषण किया और उनके मदद से इस बैक्टीरिया के जीन की फैमिली ट्री बनाने में सफलता हासिल की है। जिससे इस बात का पता लगाया जा सके कि यह बैक्टीरिया किस तरह से एक दूसरे से सम्बंधित है और यह किस तरह से फैलता है। उन्होंने टॉक्सिन्स में मौजूद विभिन्नता को भी समझने का प्रयास किया है। साथ ही उन्होंने इस जानकारी का उपयोग एंटीबायोटिक रेसिस्टेंट (एएमआर) जीन की उपस्थिति का पता लगाने के लिए भी किया है।

इन बैक्टीरिया को उनके जीनोम के आधार पर देखने से पता चला है कि एशिया और यूरोप में एक ही तरह के बैक्टीरिया फैले हुए हैं। विश्लेषण के अनुसार बैक्टीरिया सी डिप्थीरिया पिछली एक सदी से भी ज्यादा वक्त से दुनिया भर में फैला हुआ है। आबादी के प्रवास के साथ-साथ यह बैक्टीरिया भी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में फैल गया है। सी डिप्थीरिया में संक्रमण के प्रसार के लिए डिप्थीरिया टॉक्सिन जिम्मेवार होता है, जोकि टॉक्स जीन में होता है। इस संक्रमण से बचने के लिए टीके इसी टॉक्स जीन पर ही प्रहार करते हैं। शोध में कुल अलग-अलग प्रकार के कुल 18 टॉक्स जीन मिले हैं, जिनमें से कई में टॉक्सिन की संरचना को बदलने की क्षमता थी।

इस शोध से जुड़े शोधकर्ता गॉर्डन डगॉन ने बताया कि डिप्थीरिया वैक्सीन को टॉक्सिन्स को बेअसर करने के लिए डिजाईन किया गया है। ऐसे में यदि किसी जेनेटिक वेरिएंट के चलते टॉक्सिन की संरचना में बदलाव आता है तो उसका असर वैक्सीन की प्रभावशीलता पर भी पड़ेगा। हालांकि इसका यह मतलब कतई भी नहीं है कि वर्तमान में मौजूद टीके इस संक्रमण से निपटने में प्रभावी नहीं होंगें। जिस तरह से हम टॉक्सिन वेरिएंट की बढ़ती विविधता को देख रहे हैं उसको देखते हुए हमें इसके इलाज पर अधिक ध्यान देने की जरुरत है।

डिप्थीरिया का इलाज आमतौर पर एंटीबायोटिक के कई वर्गों जैसे एरिथ्रोमाइसिन और पेनिसिलिन आदि की मदद से किया जा सकता है। सी डिप्थीरिया को कई एंटीबायोटिक दवाओं के लिए प्रतिरोधी बताया गया है। हालांकि यह कितना प्रतिरोधी है उसकी सीमा अब तक ज्ञात नहीं है।

शोधकर्ताओं ने जब यह जानने का प्रयास किया कि कौन से जीन एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी हैं तो पता चला कि हर दशक एएमआर जीन की औसत संख्या बढ़ रही है। हाल के दशक 2010 से 2019 के बीच जीनोम में सबसे ज्यादा एएमआर जीन सामने आई हैं। जोकि 90 के दशक से करीब चार गुना ज्यादा थी। गौरतलब है कि इससे पहले 90 के दशक में सबसे ज्यादा एएमआर जीन सामने आई थी।

भारत में सामने आए थे विश्व के आधे से ज्यादा मामले

डिप्थीरिया एक अत्यंत संक्रामक बीमारी है जो नाक और गले के साथ-साथ कभी-कभी त्वचा को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में यदि इसका इलाज न किया जाए तो यह घातक साबित हो सकता है। हालांकि यदि ब्रिटेन और अन्य उच्च आय वाले देशों की बात करें तो वहां शिशुओं को इस संक्रमण से बचाने के लिए टीका लगाया जाता है। लेकिन निम्न और मध्यम-आय वाले देशों में जहां टीकाकरण का आभाव है वहां यह बीमारी आसानी से अपने पैर पसार सकती है।

यदि विश्व स्तर पर डिप्थीरिया के मामलों के बात करें तो धीरे-धीरे इसकी संख्या बढ़ रही है। जहां 1996 से 2017 के बीच हर वर्ष इसके औसतन 8,105 मामले सामने आए थे, वहीं 2018 में इसके 16,651 मामले दर्ज किए गए थे, जोकि पिछले औसत के दोगुने से भी ज्यादा हैं। पिछले 22 वर्षों के दौरान 2018 में सबसे ज्यादा मामले सामने आए थे। यदि भारत में इस संक्रमण के प्रसार को देखें तो 2018 में सामने आए आधे से ज्यादा मामले भारत में ही दर्ज किए गए थे। 

क्या होता है डिप्थीरिया

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार डिप्थीरिया एक प्रकार का संक्रामक रोग है जो जीवाणु कोरिनेबैक्टीरियम डिप्थीरिया के कारण होता है। भारत में इसे गलाघोंटू के नाम से भी जाना जाता है। यह जीवाणु मुख्य रूप से गले और ऊपरी वायुमार्ग को संक्रमित कर देता है।

इसके साथ ही यह अन्य अंगों को प्रभावित करने वाले एक टॉक्सिन का उत्पादन करने लगता है। जिसके कारण गले में खराश, हल्का बुखार और गर्दन में सूजन जैसे लक्षण सामने आने लगते हैं। इसकी वजह से सांस लेने और खाना निगलने में कठिनाई होने लगती है। जब कोई व्यक्ति इस संक्रमण से ग्रस्त व्यक्ति के संपर्क में आता है तो यह रोग उसमें भी फैल सकता है।