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पर्यावरण मुकदमों की साप्ताहिक डायरी: स्वास्थ्य कर्मियों के कल्याण के लिए दिशा निर्देश जारी करें सरकार: सुप्रीम कोर्ट

यहां पढ़िए इस सप्ताह के पर्यावरण सम्बन्धी मामलों के विषय में अदालती आदेशों का सार

By Susan Chacko, Lalit Maurya, Dayanidhi

On: Friday 19 June 2020
 
Photo: Getty Images

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वो स्वास्थ्य कर्मियों के कल्याण के लिए दिशा निर्देश जारी करें| यह आदेश 17 जून 2020 को जारी किया गया है| अपने इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिव को उचित दिशा निर्देश जारी करने के लिए कहा है| साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि इस निर्देश का उल्लंघन आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत अपराध माना जाएगा|

इससे पहले स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया था| जिसमें माना गया था कि स्वास्थ्य कर्मियों को सही समय पर नियमित वेतन नहीं मिल रहा है| जहां तक क्वारंटाइन का सवाल है, उसके सम्बन्ध में उपयुक्त आवास के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है|

15 मई, 2020 को जारी दिशानिर्देशों के अनुसार जो डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी कोविड-19 वार्ड में रोगियों को देख रहे थे, उन्हें क्वारंटाइन की सुविधा नहीं दी गयी थी| यह सुविधा तभी दी गयी थी जब स्वास्थ्यकर्मी अधिक जोखिम वाले मरीजों की देखभाल में लगे थे|

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया है कि जहां तक स्वास्थ्य कर्मचारियों और डॉक्टरों के वेतन का संबंध है| इस मामले में केंद्र सरकार आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत उचित आदेश जारी करेगी| साथ ही इसके पालन के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भी सूचित किया जाएगा। उन्होने बताया है कि उन डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के क्वारंटाइन से इंकार नहीं किया गया है जो सीधे तौर पर कोरोना के मरीजों की देखभाल कर रहे हैं| साथ ही उनके संपर्क में आते हैं| सॉलिसिटर जनरल ने सुझाव दिया है कि अस्पताल में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों की जरुरत को देखते हुए क्वारंटाइन की अवधि शुरुवात में एक सप्ताह की होने चाहिए| जिसे स्वास्थ्य कर्मियों के स्वास्थ्य को देखते हुए आगे एक सप्ताह के लिए बढ़ाया जा सकता है|


एनजीटी के आदेश के अनुसार दिल्ली के लिए गठित हुई जैव विविधता प्रबंधन समिति

दिल्ली के उप वन संरक्षक, द्वारा दायर एक रिपोर्ट के माध्यम से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को सूचित किया है कि राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने 31 दिसंबर 2019, को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के जैव विविधता परिषद को अपनी शक्तियां और कार्य सौंप दिए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली हेतु जैव विविधता परिषद के गठन की प्रक्रिया अभी भी जारी है।

रिपोर्ट के अनुसार, एनजीटी के आदेश का पालन करते हुए जैविक विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 41 के अनुसार जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) और मेंटेनेंस ऑफ पीपुल्स जैव विविधता रजिस्टरों (पीबीआर) का गठन करना था।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अधिनियम के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेशों के लिए, राज्य जैव विविधता बोर्ड का गठन नहीं किया जाएगा- लेकिन एनबीए अपनी शक्तियों का प्रयोग कर केंद्र शासित प्रदेशों के लिए राज्य जैव विविधता बोर्ड के कार्य करेगा। किसी भी केन्द्र शासित प्रदेश के संबंध में, एनबीए अपनी शक्तियों या कार्यों को इस उप-धारा के तहत ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को सौंप सकता है जिसे केंद्र सरकार द्वारा चुना गया हो।

एनबीए द्वारा 30 सितंबर, 2019 को बुलाई गई एक बैठक में यह निर्णय लिया गया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ और सीसी) और एनबीए, केन्द्र शासित प्रदेशों के संबंध में प्रतिनिधिमंडल निकाय जैसी परिषद की शक्तियों का कार्य करेंगे, ताकि वे सभी संपादित कार्यों का निर्वहन करने में सक्षम हों और राज्यों की तरह उद्देश्यों की पूर्ती करने के लिए कार्रवाई कर सकें। इससे जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) और पीपुल्स जैव विविधता रजिस्टरों (पीबीआर) के गठन की तैयारी में मदद मिलेगी। 


गैरकानूनी है किसानों के अतिरिक्त अन्य किसी को वसीयत के जरिए कृषि भूमि का हस्तांतरण: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसानी का काम कर रहे लोगों के अतिरिक्त किसी अन्य को कृषि भूमि की वसीयत देना गैरकानूनी है| यह फैसला सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस उदय उमेश ललित, इंदु मल्होत्रा और एएस बोपन्ना की बेंच द्वारा दिया गया है| इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 17 मार्च, 2009 को गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा दिए आदेश को बरकरार रखा है| जिसमें कृषि भूमि को गैर कृषक को वसीयत के जरिए देना अवैध ठहराया गया था| कोर्ट ने इसे बॉम्बे टेनेंसी एंड एग्रीकल्चरल लैंड एक्ट 1948 के खिलाफ बताया था|

बॉम्बे टेनेंसी एक्ट की धारा 43 और 63 के तहत खरीदी या बेची गई जमीन के हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगा दिया था और कानून के अनुसार किसी भी जमीन की बिक्री, उपहार, विनिमय, पट्टा  या गिरवी नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इन प्रावधानों का मकसद वंचित वर्ग को सुरक्षा प्रदान करना है| जिससे जोतने वाले किसान का सीधा सम्बन्ध जमीन से बना रहे| इन प्रावधानों को वंचितों के हाथों को मजबूत करने के लिए बनाया गया है|

गुजरात राज्य के अधिवक्ता ने जो दलील प्रस्तुत की उसके अनुसार खेती करने वाले किरायेदार को मालिकाना हक दिलाने के पीछे मूल मंशा यह थी कि वास्तविक रूप से खेती कर रहे लोगों और काश्तकारों का हक़ संरक्षित किया जा सके और उन्हें मामूली शुल्क के भुगतान पर मालिकाना हक दिया जा सके।

जबकि राज्य के वकील ने तर्क दिया कि "इस अधिनियम का उद्देश्य, कृषि भूमि को वास्तविक किसान के हाथों में सुरक्षित रखना है| जिससे वो दूसरों के हाथ में न जा सके| उनके अनुसार अधिनियम की धारा 63 में यह स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि कृषि भूमि का हस्तांतरण किसी गैर-कृषक को नहीं किया जा सकता|


उत्तर प्रदेश जल निगम ने एसटीपी / सीईटीपी के निर्माण पर एनजीटी को सौंपी अपनी रिपोर्ट

15 जून 2020 को उत्तर प्रदेश जल निगम ने एसटीपी / सीईटीपी के निर्माण पर अपनी रिपोर्ट एनजीटी को सौंप दी है| गौरतलब है कि गंगा में हो रहे प्रदूषण को रोकने के लिए एसटीपी / सीईटीपी की स्थापना जिला संत कबीर नगर और गोरखपुर में की जानी थी|

यह मामला गोरखपुर में रामगढ़ झील, आमी नदी, राप्ती नदी और रोहणी नदी के प्रदूषण से जुड़ा हुआ है। यह सभी नदियां घाघरा नदी की सहायक नदिया हैं| आगे जाकर घाघरा नदी गंगा की सहायक नदी बन जाती है| रिपोर्ट के अनुसार 9 प्रमुख नाले बिना शोधन के ही राप्ती नदी में मिल जाते हैं| इनमें से 8 प्रमुख नालों पर नमामि गंगे परियोजना (चरण- I) के तहत रोकने, मार्ग में परिवर्तन और साफ करने के लिए चयनित किया गया है| जिसपर करीब 240.00 करोड़ रुपए का खर्च आएगा|

बिना उपचार के राप्ती नदी में गिरने वाले एक अन्य प्रमुख नाले से संबंधित जलग्रहण क्षेत्र को गोरखपुर-लखनऊ फोर लेन सड़क द्वारा अधिग्रहित कर लिया गया था| इसलिए नमामि गंगे योजना के तहत इसके लिए एक अलग परियोजना (चरण- II) में अगस्त 2020 तक तैयार और प्रस्तुत की जाएगी।


झगड़िया-कांतियाजाल एफ़्लुअन्ट पाइपलाइन की शर्तों का किया गया उल्लंघन

नर्मदा क्लीन टेक लिमिटेड (एनसीटीएल) के द्वारा झगड़िया-कांतियाजाल पुतली पाइपलाइन पर शर्तों का उल्लंघन करने का आरोप लगा है। एनजीटी को दी गई अपनी रिपोर्ट में अंकलेश्वर के नर्मदा प्रदुषण निवारण समिति (एनपीएनएस) ने गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जीआईसीबी) और संयुक्त निरीक्षण समिति (जेआईसी) के एक सदस्य पर एनसीटीएल द्वारा सहमति शर्तों (वायलेशन्स ऑफ़ कंसेंट कंडीशंस (सीसीए)) के उल्लंघनों पर आंखें मूंद लेने का आरोप लगाया है।  

वायलेशन्स ऑफ़ कंसेंट कंडीशंस (सीसीए) के निरंतर उल्लंघन के बावजूद जीपीसीबी ने एनसीटीएल को 4 साल (दिसंबर 2016 - अप्रैल 2020) के लिए इफ़्लूअन्ट/एफ़्लुअन्ट पाइपलाइन को संचालित करने की अनुमति दी। पाइपलाइन बिना किसी सीईटीपी / अंतिम अपशिष्ट उपचार संयंत्र (एफईटीपी) के चल रही थी।

एनपीएनएस ने कहा कि यह संयुक्त निरीक्षण समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि पाइपलाइन पर हाइड्रो टेस्ट आयोजित किया जाना था, लेकिन यह इफ़्लूअन्ट/एफ़्लुअन्ट पाइपलाइन को चालू करने से पहले आयोजित नहीं किया गया।

इसके अलावा, झगडिय़ा-कांतियाजाल की पाइपलाइन में रिसाव और टूटने की 27 घटनाएं हुईं, जिससे पाइपलाइन के मार्ग में और उसके आसपास के क्षेत्र में औद्योगिक प्रदूषण फैल गया।

रिपोर्ट में एनपीएनएस ने निम्नलिखित किए जाने की बात कही

  1. सीसीए के अनुसार जीआईडीसी, झगड़िया में एफईटीपी का निर्माण
  2. 35 एमएलडी गार्ड तालाब का प्रावधान जिसमें 72 घंटे की क्षमता हो
  3. एक निर्दिष्ट समय अवधि के भीतर इफ़्लूअन्ट/एफ़्लुअन्ट पाइपलाइन के लिए हाइड्रो परीक्षण का संचालन
  4. जब तक उपरोक्त 3 शर्तों को पूरा नहीं किया जाता है, जीपीसीबी द्वारा उद्योग को स्थापित करने (सीटीई) के लिए कोई सहमति नहीं देनी चाहिए
  5. झगडिया-कांतियाजाल इफ़्लूअन्ट/एफ़्लुअन्ट पाइपलाइन के 37 किलोमीटर की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र विशेषज्ञ एजेंसी नियुक्त करने की दिशा
  6. 2016 से 2020 तक 27 जनवरी, 2017 को जारी सीसीए के उल्लंघन के लिए एनसीटीएल पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति।
  7. विशेषज्ञ सदस्यों से मिलकर एक समिति गठित करें जो पर्यावरण की बहाली के लिए एक योजना तैयार करे, लोग, आजीविका, पशुधन इत्यादि को जीपीसीबी द्वारा लगाए गए अंतर्राज्यीय पर्यावरण क्षतिपूर्ति को ध्यान में रखते हुए झगडिया-कांतियाजाल इफ़्लूअन्ट/एफ़्लुअन्ट पाइपलाइन से प्रभावितों को मुआवजा
  8. 27 जनवरी, 2017 को जारी सीसीए के उल्लंघन के लिए जल (रोकथाम और प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत एनसीटीएल के संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन शुरू करने के लिए जीपीसीबी को निर्देश दिया जाए।