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गंभीर रूप से बीमार कोरोना मरीजों का इम्यून सिस्टम भी करता है वायरस से लड़ने की कोशिश

शोधकर्ताओं के अनुसार गंभीर रूप से कोरोना पीड़ित रोगियों के शरीर में भी टी- कोशिकाओं का उत्पादन होता रहता है| जो इस वायरस से लड़ने में मदद करती हैं।

By Lalit Maurya

On: Thursday 02 July 2020
 

कोविड-19 से गंभीर रूप से पीड़ित मरीजों का इम्यून सिस्टम भी इस रोग से लड़ने की कोशिश करता रहता है| यह जानकारी हाल ही में किये गए एक नए शोध से सामने आई है| यह शोध ला जोला इंस्टीट्यूट फॉर इम्यूनोलॉजी (एलजेआई) और इरास्मस यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर (इरास्मस एमसी) द्वारा किया गया है| शोधकर्ताओं के अनुसार गंभीर रूप से कोरोना पीड़ित रोगियों के शरीर में भी टी-कोशिकाओं का उत्पादन होता रहता है| जो इस वायरस से लड़ने में मदद करती हैं।

ऐसे में कोविड-19 की रोकथाम के लिए वैक्सीन को एंटीबॉडी के साथ-साथ टी-कोशिकाओं पर भी ध्यान देना होगा| जो इसके उपचार में मददगार हो सकती हैं| यह शोध 26 जून 2020 को जर्नल साइंस इम्म्युनोलोजी में प्रकाशित हुआ है|

गौरतलब है कि दुनिया भर में 1 करोड़ से भी ज्यादा लोग इस वायरस के चपेट में आ चुके हैं| जिनमें से 5 लाख से भी ज्यादा की मौत हो चुकी है| वहीं 60 लाख से भी ज्यादा लोग इस बीमारी से उबार चुके हैं| भारत में भी इसके 604,641 मामले सामने आ चुके हैं| जिनमें से 359,859 ठीक हो चुके हैं|

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने गंभीर रूप से बीमार 10 मरीजों को चुना था| जिन सभी को नीदरलैंड के इरास्मस यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के आईसीयू में भर्ती कराया गया था| इन सभी मरीजों की हालत इतनी नाजुक थी की इन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था| इनमें से 2 मरीजों की मौत हो गई थी| इन सभी मरीजों के इम्यून सिस्टम का गहराई से अध्ययन करने से पता चला कि इन सभी रोगियों के शरीर में कोरोनावायरस से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली ने काम करना शुरू कर दिया था| इनके शरीर ने टी-कोशिकाओं का बनाना शुरू कर दिया था| जो एंटीबॉडी के साथ मिलकर संक्रमण को रोकने ख़त्म करने की कोशिश करने लगी थी|

क्या होते हैं टी-सेल्स

टी-सेल्स, जिसे टी लिम्फोसाइट भी कहा जाता है। एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएं होती हैं। अपने निर्माण के बाद यह टी-सेल्स थाइमस ग्रन्थि में चली जाती है, जहां पर इनका विकास होता है। इसलिए थाइमस ग्रन्थि के टी अक्षर से ही इस कोशिका का नाम टी-सेल्स पड़ा है। यह कोशिका विभिन्न रोगाणुओं से शरीर की सुरक्षा करती है। जैसे ही कोई रोगाणु (जीवाणु या विषाणु) शरीर में प्रवेश करता है, तो यह कोशिकाएं एक प्रकार के रसायन प्रतिपिण्ड का निर्माण करती है। जोकि उस रोगाणु का मुकाबला कर उसे नष्ट कर देता है।

संक्रमण को रोकने के लिए वायरस पर कैसे काम करते हैं यह टी-सेल्स

इसके विषय में इरास्मस एमसी के वायरोलॉजिस्ट रोरी डे व्रीस ने बताया कि “इन टी कोशिकाओं को सक्रिय करना उतना ही जरुरी है जितना शरीर में एंटीबॉडी का बनना|” एलजेआई में प्रोफेसर और इस शोध से जुड़े एलेसेंड्रो सेट्टे ने बताया कि "यह समझना महत्वपूर्ण है कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली वायरस से कैसे लड़ती है|"

इस अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष जर्नल सेल में छपे एक और शोध के नतीजों से मेल खाते हैं, जिसमें कोविड-19 से ग्रस्त मरीजों के शरीर में टी सेल्स की मजबूत प्रतिक्रिया देखी गई थी| हालांकि इस शोध में शामिल मरीज उतनी गंभीर हालत में नहीं थे| इन दोनों ही अध्ययनों में, टी सेल्स ने रोगियों में कोरोनावायरस के "स्पाइक" पर हमला किया था| जोकि प्रोटीन से बने होते हैं| इन "स्पाइकस" की मदद से वायरस रोगी की कोशिकाओं में प्रवेश करता है| गौरतलब है कि यह वायरस बीमार व्यक्ति के सेल्स को अपने ट्रिमेरिक स्पाइक ग्लाइकोप्रोटीन के माध्यम से जोड़ लेता है। साथ ही सार्स वायरस की तुलना में 10 गुना अधिक मजबूती से होस्ट सेल्स में चिपक जाता है।

दुनिया भर में कई ऐसी वैक्सीन्स पर काम चल रहा है जिनकी मदद से इम्यून सिस्टम इन प्रोटीन को पहचान कर इसपर हमला कर सकें| इस नए अध्ययन में इस बात के भी सबूत मिले हैं कि स्पाइक प्रोटीन पर हमला करके इस वायरस को रोका जा सकता है| जैसा की हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली इस वायरस के साथ करती है| इसके साथ ही इम्यून सिस्टम इस वायरस के अन्य हिस्सों पर भी हमला करता है।

एलेसेंड्रो सेट्टे के अनुसार विज्ञान की कोई सीमा नहीं है| कोविड-19 एक वैश्विक महामारी है| इसलिए इसे समझने के लिए हमारा दृष्टिकोण भी वैश्विक होना चाहिए| इसे बेहतर तरीके से समझने के लिए हमें अलग-अलग वातावरण में रहने और विभिन्न जेनेटिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की प्रभावी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को समझना जरुरी है| जिससे इस वायरस को हराया जा सके|