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मार्च में अधिक बारिश का कोरोनावायरस पर क्या प्रभाव होगा?

अगर वायरस सर्द आबोहवा में फूलता-फलता है, तो जिन जिलों में अत्यधिक बारिश हुई है क्या उन जिलों में उन्हें फैलने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाएगा

By Akshit Sangomla

On: Monday 23 March 2020
 

Photo: Vikas Choudhary

कड़कती बिजली व ओले के साथ मार्च में हुई भारी बारिश ने देशभर में किसानों की फसल को बहुत नुकसान पहुंचाया है। मौसम का ये असामान्य पैटर्न कोरोनावायरस बीमारी (कोविड-19) के चलते विश्वभर में फैली माहामारी के कारण आर्थिक बंदी के साथ आया है।

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक, भारत में 1 से 19 मार्च के बीच जो बारिश हुई, वो इसी अवधि में होने वाली बारिश से 77 प्रतिशत अधिक है। देश के 381 जिलों (भारत के कुल जिलों का 57 प्रतिशत) में सामान्य से 60 प्रतिशत से ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई है।

मिडिया रिपोट्र्स की मानें तो भारी बारिश और ओले गिरने से देशभर में 4 लाख हेक्टेयर में लगी फसल बर्बाद हो गई। 

नोएडा की निजी मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काइमेट वेदर के मुताबिक, केवल उत्तर प्रदेश में 6,50,000 किसानों को 255 करोड़ का नुकसान हुआ है। हालांकि, बारिश का वितरण असमान रहा क्योंकि ये देश के केंद्र शासित प्रदेशों, उत्तरी, मध्य, पूर्वी-मध्य के 13 राज्यों में ही सिमटा था।

उत्तर प्रदेश और दिल्ली में बारिश सामान्य से क्रमशः 698 और 621 प्रतिशत अधिक हुई। बिहार में सामान्य से 9 गुना अधिक और झारखंड में 8 गुना ज्यादा बारिश दर्ज की गई। इन राज्यों के लगभग सभी जिलों में सामान्य के बहुत ज्यादा बारिश हुई।

उत्तर प्रदेश में केवल एक जिले को छोड़ सभी जिलों में सामान्य से अप्रत्याशित रूप से ज्यादा बारिश हुई। इसी तरह छत्तीसगढ़ के 27 में से 25 जिलों में सामान्य से बेहद ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई।

झारखंड, बिहार, पंजाब, उत्तराखंड और हरियाणा के भी अधिकांश जिलों में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई।

वहीं, पूर्वोत्तर के राज्यों में सामान्य से काफी बारिश हुई। अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से 68 प्रतिशत, मणिपुर में 77 प्रतिशत, मिजोरम में 99 प्रतिशत और त्रिपुरा में 84 प्रतिशत कम बारिश हुई।

असम और नागालैंड में भी सामान्य से काफी बारिश दर्ज की गई। असम में समान्य से 48 प्रतिशत और नागालैंड में सामान्य से 50 प्रतिशत कम बारिश हुई। हां, मेघालय और सिक्किम में सामान्य बारिश हुई।

गोवा देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मार्च में एक बूंद बारिश नहीं हुई। केंद्र शासित प्रदेश दमन व दीव, दादरा व नगर हवेली और पुदुचेरी में भी बारिश नहीं हुई।

दक्षिण प्रायद्वीप में ज्यादा बारिश हुई लेकिन तमिलनाडु में सामान्य से 87 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई।

मौसम में बदलाव का मतलब

मार्च महीने में सामान्य से अधिक बारिश का मतलब है कि यहां का तापमान सामान्य से कम है यानी कि अत्यधिक बारिश वाले क्षेत्रों में गर्मी का मौसम देर से आएगा। 2019 में सर्दी का मौसम लंबा खिंच गया था, जिसका मतलब है कि सर्दी के बाद एकदम अधिक गर्मी का सीजन आएगा। कोविड-19 महामारी के बीच मौसम के इस सूरत-ए-हाल के प्रभाव की समीक्षा अहम है।

विशेषज्ञ अब तक इस निर्णय पर नहीं पहुंच सके हैं कि नोवेल कोरोनावायरस के फैलने में तापमान का कितना असर पड़ता है। अगर वायरस सर्द आबोहवा में फूलता-फलता है, तो जिन जिलों में अत्यधिक बारिश हुई है, उन जिलों में उन्हें फैलने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाएगा।

कुछ शोध पत्रों में कहा गया है कि अत्यधिक आर्द्रता और तापमान वायरस के फैलने की रफ्तार को सुस्त कर देगा लेकिन इन शोध-पत्रों का मूल्यांकन इन शोधकर्ताओं के समकक्षों ने नहीं किया है।

विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित आस्ट्रेलिया जैसे देशों में वायरस तेजी से फैलता है। इस गोलार्द्ध के देशों में ज्यादा सर्दी पड़ती है। हालांकि, मौसम नोवल कोरोनावारस को कितना प्रभावित करता है, इसको लेकर व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है।

ये चेतावनी दूसरे वायरसों के व्यवहार, मनुष्य के व्यवहार (सर्दी में लोग एक-दूसरे से सटकर रहते हैं) और इस मौसम में वायरस के चलते मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी के आधार पर दी गई है।

बीमारी पर गर्मी और आर्द्रता का क्या असर पड़ेगा, ये जानने के लिए यूटा यूनिवर्सिटी के फिजिसिस्टों ने एक अध्ययन शुरू किया है।

फिजिसिस्ट सवीज सफैरियन व माइकल वर्शिनिन इस अध्ययन का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके लिए यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल साइंस फाउंडेशन ने 2,00,000 अमरीकी डॉलर बतौर अनुदान दिया है।

इस अध्ययन में पता लगाया जाएगा कि वायरस के बाहरी हिस्से में मौजूद प्रोटीन का खोल अलग-अलग आबोहवा में कैसा व्यवहार करता है। इसमें छींकते वक्त निकलने वाले उन बूंदों का भी अध्ययन किया जाएगा, जिसके जरिए वायरस दूसरे लोगों में फैलता है।

इसके लिए वायरस के खोल की डम्मी का इस्तेमाल किया जा रहा है। अलग-अलग स्थितियों में डम्मी खोल और ड्रॉपलेट्स का व्यवहार बताएगा कि वायरस कैसे फैलता है और दूसरे लोगों को संक्रमित करता है।

माइकल वर्शिनिन ने 18 मार्च को एक बयान में कहा, “हम लोग वायरस की प्रतिकृति तैयार कर रहे हैं, जिसमें सबकुछ होगा। हम जानना चाहते हैं कि ये वायरस शरीर से बाहर कैसे निकलता है और कैसे उसकी मौत होती है।”