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चीन में सुअरों में पाए गए इन्फ्लूएंजा वायरस से एक और वैश्विक महामारी का खतरा

अध्ययन में पाया गया कि यह नया वायरस इंसान से इंसानों में फैल सकता है और फ्लू के खिलाफ मौजूदा इम्यूनिटी भी असरकारक नहीं है

By Banjot Kaur

On: Wednesday 01 July 2020
 
global pandemic
Photo credit: needpix.com Photo credit: needpix.com

वैज्ञानिकों ने चीन में सूअरों से एक नए रिएसॉर्टेड इन्फ्लूएंजा वायरस की पहचान की है, जिससे एक और वैश्विक महामारी फैलाने की आशंका है। वायरस ने सुअरों के फार्म में काम करने वालों (स्वाइन वर्करों) को तेजी से संक्रमित किया है।

अमेरिकी जनरल प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, इस एच1एन1 वायरस के रिएसॉर्टमेंट से संक्रमण फैलता है जो इंसानों को तेजी से संक्रमित कर सकता है। यह अध्ययन 2011-2018 तक चीन के 10 राज्यों में सुअरों की आबादी के बीच किया गया था। 

मूल रूप से वायरस का रिएसॉर्टमेंट एक ऐसा मैकेनिज्म है जिसके माध्यम से वायरस के नए स्वरूप उत्पन्न होते हैं जिनमें बिल्कुल नए गुण होते हैं और यह बड़े पैमाने पर महामारी पैदा कर सकते हैं।

स्वाइन इन्फ्लूएंजा के वायरस में कई वंश हैं, जिनमें से यूरेशियन-एवियन (ईए) सबसे प्रमुख है। 2009 में स्वाइन फ्लू महामारी का वायरस फैलने के बाद वापस सुअरों में चला गया।

अध्ययन के अनुसार "इसके बाद, स्वाइन ईए एच1एन1 वायरस और 2009 के स्वाइन फ्लू के एच1एन1 वायरस के रिएसॉर्टमेंट होने की जानकारी चीन और अन्य देशों के सूअरों में छिटपुट रूप से पता चली है, जिनमें से कुछ चीन में मानव संक्रमण का कारण बनी है," 

रिएसॉर्टमेंट के कारण एच1एन1 वायरस के इस ईए स्ट्रेन का नया जीनोटाइप (जी4) ज्यादा ताकतवर है जो इंसानों को तीव्र संक्रमित कर सकता है।

हालांकि, मानव आबादी में सभी नए उभरते ईए रिएसॉर्टमेंट्स की मौजूदा संक्रामकता ज्ञात नहीं है। शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट रूप से कहा है कि 2009 के स्वाइन फ्लू महामारी के वायरस के समान ही जी4 में महामारी वायरस के सभी संकेत दिखते हैं।

मानवों से मानवों में संक्रमण है संभव?

जी4 वायरस श्वसन प्रणाली में पाई जाने वाली एपिथीलियल सेल को संक्रमित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने इसका प्रसार सामान्य मानव ब्रोन्कियल कोशिकाओं और वायुकोशीय कोशिकाओं की श्वसन प्रणाली में भी पाया था। इन दोनों कोशिकाओं में इस इंफ्लूएंजा वायरस का संक्रमण देखा गया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि जी-4 जीन का प्रतिकृति स्तर (रेप्लीकेबिलिटी)  2009 के महामारी वायरस के समान था और संक्रमण होने के 36-60 घंटों के बाद वायरस की उत्पत्ति करता था। शोध में आगे पता चला कि 2009 के स्वाइन फ्लू वायरस की तुलना में जी4 वायरस ने फेफड़ों को अधिक नुकसान पहुंचाया।

 किसी भी वायरस की प्रसार क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि मानव-से-मानव संचरण कितना प्रभावी होगा। इसका विश्लेषण करने के लिए, शोधकर्ताओं ने सीधे संपर्क और ड्रॉपलेट्स के माध्यम से फेरेट्स पर ट्रांसमिशन प्रयोग किया। 2009 के महामारी वायरस ने दोनों माध्यमों से फेरेट्स में ट्रांसमिशन किया। जी4 जीन के सभी चार वेरिएंटों ने सीधे संपर्क के माध्यम से प्रभावी संचरण दिखाया लेकिन ड्रॉपलेट माध्यम में चार में से तीन वेरिएंट्स ही प्रभावी रहे।

शोधकर्ताओं ने जी4 में एयरोसोल ट्रांसमिशन की भी पुष्टि की। एरोसोल तरल कण होते हैं जिनमें वायरस होते हैं और कुछ समय के लिए हवा में बने रहते हैं। संयोग से, एयरोसोल संचरण की पुष्टि कोरोनावायरस, सार्स-सीओवी-2 के लिए नहीं की गई है।

अब सवाल यह है कि क्या इन्फ्लूएंजा वायरस के खिलाफ पहले से मौजूद इम्यूनिटी जी4 से रक्षा करेगी? शोधकर्ताओं को इसका जवाब नहीं में मिला। वायरस के एक प्रकार के खिलाफ पहले से मौजूद इम्यूनिटी नए प्रकार के खिलाफ ढाल के रूप में काम करेगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पहले के वायरस के प्रकार और नए मिले प्रकार के ऐंटीजनिक गुणों में कितना अंतर है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि जी4 टाइप मौजूदा इंफ्लूएंजा वायरस से एंटीजीनिकली अलग हैं। इसलिए मौजूदा मौसमी इन्फ्लूएंजा टीके नए जीन के खिलाफ कोई प्रतिरक्षा प्रदान नहीं करेंगे।

अब तक शोधकर्ताओं ने चीन में ईए स्ट्रेन के पांच मानवीय संक्रमण मामले पाए हैं, जिनमें से दो जी4 के थे।