महामारी के बाद कैसा होगा कल का 'नया' सामान्य

महामारी के समाप्त होने की अप्रत्याशित लंबी प्रतीक्षा से उकताई दुनिया में एक नयी विचारधारा पनप रही है कि – आखिर, कल का "नया सामान्य" क्या होगा?

By Ramesh Sharma

On: Thursday 14 April 2022
 

महामारी के  संक्रमण के समाप्त होने की अप्रत्याशित लंबी प्रतीक्षा से उकताई  दुनिया में  एक नयी विचारधारा पनप रही है जिसका केन्द्रबिन्दु है कि– आखिर, आगामी कल का "नया सामान्य" क्या होगा?  

वास्तव में वर्तमान दौर का नया सामान्य, व्यवस्था के गहरे दरारों के मध्य हमारे अंतःकरण में उगी हुई एक नयी उम्मीद है। महामारी के एकांतवास नें  कदाचित पहली बार हमें, हमारे ही कद का अहसास करा दिया है - जिसे दुनिया के कृत्रिम रफ़्तार में हमनें खो दिया था। एकाकीपन नें समाज को कठघरे में खड़ा करके यह बताने का प्रयास किया कि - अग्रगामी होने का सामान्य अर्थ विवेक के साथ आगे बढ़ना है। 

नया सामान्य, मजबूरी में ही सही पूरी दुनिया की सामान्य और समसामयिक सोच का नया विवेकपूर्ण आयाम है। दरअसल यह विवेकपूर्ण विचार, व्यवस्था और समाज के जिन अनुत्तरित सवालों से उपजा है - उनके अंतर्विरोधों को सुलझाने-उलझाने में पीढ़ियां गुजर गयीं। महामारी के मातम नें उन सवालों को हम सबके सामने खड़ा कर दिया।   

क्या संभावित आर्थिक मंदी की नई महामारी कोरोना से ज़्यादा घातक  होगी? क्या अनिश्चित तालाबंदी (या लॉकडाउन) समाज में किसी नये मनोरोग का नया कारण बनेगा? क्या जर्ज़र होते राजतंत्रों से मोहभंगों की कोई नई व्याधि आयेगी? क्या वैश्वीकृत उदारवादी स्वार्थी समाज की नैतिकता के नये पतन का दौर शुरू होगा? क्या हम अपने ही द्वारा पर्यावरण के प्रति किये गये अक्षम्य विश्वासघात को भूल जाना चाहेंगे? क्या संचितों और वंचितों के मध्य हम उन आर्थिक भेदभाव और अंतहीन लालच को समाप्त करना चाहेंगे? क्या एक जवाबदेह नागरिक होकर हम ढांचागत हिंसा के विरूद्ध मुखरित होना चाहेंगे?

या फिर नये सामान्य को हमनें भी क्या एक सैद्धांतिक सहूलियत मान लिया है? या हम अकारण भयातुर होकर 'नयेपन' में कोई नई सुरक्षा तलाश और तराश रहे? या नये सामान्य के नाम पर हम समाज और प्रकृति के प्रति अपने कारगुजारियों से मुक्त होना चाहते हैं? तथा स्वयं सीखते हुये नयी पीढ़ी को विवेकपूर्ण आचरण के साथ जीना सिखाना चाहते हैं? 

प्रगतिशील होने की अपनी ही गढ़ी गयी परिभाषाओं में हमनें विनाश को भी विकास का पर्याय मान लिया। संसाधनों की अंधाधुंध लूट-खसोट को 'न्याय' साबित करने का प्रयास किया, जहाँ सम्पन्नता के तमाम अवसर चंद लोगों के विशेषाधिकार बन गये। मानव इतिहास में पहली बार 'सम्पन्नों और विपन्नों' के मध्य, लगभग  दो-तिहाई दुनिया खड़ी कर दी गयी। ऐसे संक्रमणकाल में नया सामान्य उन दो तिहाई से अधिक लोगों का सपना (भी) है जो महामारी के बाद एक सामान्य ज़िंदगी जीना चाहते हैं। बहुसंख्यक विपन्न समाज को लगता है कि एक बेहतर और न्यायपूर्ण भविष्य मुमक़िन है।

लेकिन, तब तक मुमकिन नहीं जब तक कि पूरी व्यवस्था और समाज 'अहिंसा' को केंद्रीय मूल्य के रूप में स्थापित नहीं कर लेता। व्यक्तिवादी सोच पर टिकी शिक्षा; और उस शिक्षा के उत्पाद के रूप में गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लिप्त समाजतन्त्र; और उस समाजतन्त्र  को पोषित करने के लिये बनाया गया हिंसक अर्थतंत्र; और उस हिंसक अर्थतंत्र की संरक्षक  राजतंत्र - वास्तव में इन सबका समुच्चय ही उस ढांचागत हिंसा (अन्याय, असमानता और अलगाव) के रूप में हमारे सामने है जिसे महामारी के मातम ने पर्दाफ़ाश कर दिया है। नये सामान्य के नये दौर के बरअक्स इससे मुक्त होना अब विकल्प ही  नहीं बल्कि समाज की सामूहिक इच्छाशक्ति है।

वैसे विगत  आधी सहस्राब्दि  के संक्षिप्त इतिहास में नयापन अक्सर अपेक्षाकृत 'नई त्रासदी' के साथ ही चलता आया है। इसलिये नयेपन के पूर्वाग्रह को हमें पूरी तरह आत्मसात करने से बचना चाहिये - और होता भी यही है। परिवर्तन  की धारा के विरुद्ध तैरना साहस नहीं, बल्कि विवेक के पैमाने पर होना चाहिये।  इसलिये छद्म आचरण में नयेपन के बजाये  ज़रूरत, विवेक को जाग्रत करने की है।  उसके बाद नये अथवा पुराने का आग्रह - दुराग्रह अपने आप गौण हो जायेगा।  

नया सामान्य कैसा होना चाहिये ? प्रथमतः यह देखने समझने की शिद्दत से कोशिश हो कि क्या व्यवहार की  दृष्टि से 'नया' और 'सामान्य' परस्पर विलोम नहीं है ? तब जबकि विगत  इतिहास यह साबित करता है हर नयेपन नें 'सामान्य' को थोड़ा और 'असामान्य' बना दिया।  और तब भी जबकि 'असामान्य' होने को 'सामान्य' होने की अनायास सामाजिक स्वीकृति मिलती गयी।   

फिर जब भरा पूरा समाज ही 'सामान्य और असामान्य' के वर्गभेद में दिग्भ्रमित हो तब किसी नये सामान्य का नया मोक्ष इस प्राचीन धरती और उसके सबसे विवेकी जीव को बचा पायेगा  इसमें संशय के पर्याप्त कारण (हम) हैं।   

वर्ष 2008 में पहली दफ़ा 'नये सामान्य' की धारणा उस दौर मे आयी जब आर्थिक मंदी, राजनैतिक टकराहट, सामाजिक विखंडन और अराजकताओं के चलते सार्थक परिवर्तन की सामूहिक सोच पनपनी शुरू हुई।  लगभग 12 बरसों की प्रतीक्षा के पश्चात् महामारी के अवसाद नें पुनः 'नये सामान्य' के सामान्यीकरण पर विश्वास करने मजबूर कर दिया। विडंबना ही है कि जिस 'राज्य व्यवस्था' से असामान्य अराजकता जनमीं, महामारी ने उस पर ही खतरनाक हद तक निर्भर बना दिया। यथार्थ में यह असामान्य की नयी शुरुआत है।  

एक और पूर्वाग्रह है - जब 'परिवर्तन' को हमने नयेपन का पर्याय मान लिया। परिवर्तन की अन्तःप्रक्रिया शुरू होनें से पूर्व ही समाज में  परिवर्तन लाद देनें से, समाज अवसादों से भर गया। कालांतर में  उस समाज को ही हमनें  परिवर्तन के विरुद्ध और दकियानूसी ऐसा  साबित कर दिया। नयापन तो सैद्धांतिक रूप से उनके लिये है / और होगा - जिन्होनें कुछ मान्यताओं को सच में पुराना मान लेने की सनक पाल रखी है।  नयापन व्यवहारिक रूप से उनके लिये भी नया होगा जिन्हें अपनें  ही कल से सीखनें में डर लगता है।  

 तब, क्या 'नये सामान्य' की नई परिकल्पना को खारिज कर देना चाहिये? उत्तर हाँ भी है और नहीं भी।  ‘हाँ’ उनके लिये जिनके पास उम्मीदों भरा एक कल है। और ‘नहीं’ उनके लिये जो कल के लिये अपेक्षाकृत अधिक उम्मीदग्रस्त हैं।  हमें एक 'नई समग्र उम्मीद' के प्रति संवेदनशील होना होगा। एक ऐसी उम्मीद जिसमें हमें सायास  कुछ ख़ारिज़ नहीं करना है बल्कि उन स्थापित मान्यताओं को आत्मसात के लिये प्रयास करना है जिसनें  हमें एक 'ज़िम्मेदार मनुष्य' होनें  का अवसर दिया - बस उसे ही साबित करना है।  आज और अभी।  

(लेखक रमेश शर्मा - एकता परिषद के राष्ट्रीय महासचिव हैं)

Subscribe to our daily hindi newsletter