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दुनिया भर में कोविड-19 के लिए बनाई 225 सरकारी टास्क फोर्स में हैं केवल 24 फीसदी महिलाएं

दुनिया भर में कोरोना महामारी से निपटने के लिए बनाई टास्क फोर्स में तीन चौथाई पुरुष हैं| इस तरह का लिंगभेद महिलाओं के महामारी से उबरने में बाधा उत्पन्न कर सकता है

By Lalit Maurya

On: Tuesday 23 March 2021
 

दुनिया भर में कोविड-19 के लिए बनाई 225 टास्क फोर्स में केवल 24 फीसदी महिलाएं हैं, जबकि हैरान कर देने वाली बात यह रही कि 26 टास्क फोर्स में एक भी महिला सदस्य नहीं है। यह एक बार फिर इस बात को साबित करता है कि आज भी दुनिया में लिंग के आधार पर भेदभाव समाप्त नहीं हुआ है। अनुमान है कि इस तरह का लिंगभेद से महिलाओं के महामारी से उबरने में बाधा उत्पन्न कर सकता है। यह टास्क फोर्स कोविड-19 का मुकाबला करने के लिए दुनिया भर के 137 देशों में बनाई गई थी।

यह जानकारी यूएनडीपी, यूएनवीमेन और पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय के जेंडर इनक्वॉलिटी रिसर्च लैब (गर्ल) द्वारा जारी आंकड़ों में सामने आई है जोकि कोविड-19 ग्लोबल जेंडर रिस्पांस ट्रैकर द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित है जिसे दुनिया भर की सरकारों द्वारा इस महामारी से निपटने के लिए बनाई नीतियों के विश्लेषण के लिए बनाया गया था।

यह नए आंकड़ें उस समय सामने आए हैं जब दुनिया वैश्विक महामारी से निपटने और महिलाओं पर इसके पड़ रहे प्रभावों का आंकलन करने में लगी है। एक तरफ महिलाओं पर इस महामारी का व्यापक असर पड़ा है, न केवल उनकी नौकरियां खत्म हो चुकी हैं साथ ही उनपर घरेलु हिंसा से लेकर परिवार की देखभाल का बोझ भी बढ़ा है जिसके लिए उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता। अनुमान है कि इस महामारी के चलते 4.7 करोड़ अतिरिक्त महिलाएं अत्यंत गरीबी के हालात में जीने को मजबूर हो जाएंगी।

मार्च 2021 तक जारी आंकड़ों के अनुसार कोविड-19 महामारी में वित्तीय, सामाजिक सुरक्षा और श्रम बाजार संबधी 2,280 उपायों में से केवल 13 फीसदी में महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा पर ध्यान दिया गया है। ट्रैकर के आंकड़ें यह भी दिखाते हैं कि सामाजिक सुरक्षा या श्रम बाजार के लिए किए उपायों का केवल 11 फीसदी हिस्सा बिना वेतन के देखभाल और घरेलू कार्यों में लगे लोगों को संबोधित करता है। महामारी से पूर्व पुरुषों की तुलना में तीन गुना अधिक महिलाएं इन कार्यों में संलग्न थी।

स्वास्थ्य देखभाल में लगे कार्यकर्ताओं में 70 फीसदी है महिलाओं की हिस्सेदारी

यूएनडीपी के एडमिनिस्ट्रेटर अचिम स्टेनर के अनुसार दुनिया भर में इस महामारी के खिलाफ जंग में महिलाएं भी पीछे नहीं थी। यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो दुनिया में स्वास्थ्य देखभाल में लगे लोगों में 70 फीसदी महिलाएं हैं। ऐसे में उन्हें निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखकर किस तरह इस महामारी के प्रभावों को दूर किया जा सकता है। इन हैरान कर देने वाले आंकड़ों से पता चला है कि दुनिया में केवल आठ देश ऐसे हैं जहां महिलाओं को भी टास्क फोर्स में बराबर की हिस्सेदारी दी गई है। सार्वजनिक संस्थानों में महिलाओं की पूर्ण और समावेशी भागीदारी जरुरी है। यह महिलाओं की जरूरतों को भी निर्णायक फैसलों में स्थान दिया जा रहा है उसे सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। यह ऐसे विकल्प हैं जो आने वाली पीढ़ियों के लिए उनके वायदे का निर्धारण करेंगे।

रिपोर्ट के अनुसार यदि निर्णयों में महिलाओं की भागीदारी नहीं होगी तो ऐसे में सरकार द्वारा कोविड-19 के लिए लिए गए फैसलों में महिलाओं की जरूरतों को अनदेखा करने की अधिक सम्भावना है। ऐसे में यह इस महामारी से उबरने के बीच असमानता को और बढ़ा सकती है। इससे लिंग असमानता की दिशा में दशकों में हुई प्रगति एक बार फिर पलट सकती है।

ऐसे में यूएनडीपी और यूएन वीमेन ने सरकारों से आग्रह किया है कि न केवल वो इस बीमारी से निपटने के प्रयासों में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करें साथ ही निर्णय लेने और नेतृत्व में भी उन्हें सामान अवसर दें। इसके बावजूद अभी भी दुनिया के 32 देशों में इस महामारी से निपटने में महिलाओं को ध्यान में रखकर उपाय नहीं किए गए हैं।