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प्लेग के समय में खुद को क्वरांटाइन करने वाले गांव की कहानी

इंग्लैंड के इस गांव ने अपनी जान पर खेल कर इस संक्रमण को फैलने से रोका

By Jagannath Jaggu

On: Wednesday 29 April 2020
 
प्लेग के समय में खुद को क्वरांटाइन करने वाला गांव, जो अब पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है
प्लेग के समय में खुद को क्वरांटाइन करने वाला गांव, जो अब पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है प्लेग के समय में खुद को क्वरांटाइन करने वाला गांव, जो अब पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है

कोविड-19 ने जिस प्रकार एक वैश्विक महामारी का रूप ले लिया तथा इसके कारण जिस तरह लोगों को घरों में कैद रहने की नौबत आ गई है, उससे कई तरह की परेशानियों का समाना करना पड़ रहा हैं। लोग मानसिक परेशानियों से गुजर रहे हैं, क्योंकि हम बचपन से सुनते आ रहे हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी हैं और इसे समाज के इर्दगिर्द ही रहना हैं।

अकसर हम दादी-नानी से क़िस्से-कहानियों में सुना करते थे कि जो लोग अकेले समाज से दूर रहने के आदि हो जाते हैं, वे या तो देवता होते हैं या दानव। ये कितनी सच्चाई है, इसका सत्यापन तो हम नहीं कर सकते, लेकिन इस लॉकडाउन में अक्सर हमें यह किस्से-कहानियाँ दादी-नानियों की याद दिला जाती हैं।

चूंकि हम एक समूह में रहने के आदी हो चुके हैं और इसे पसंद भी करते हैं। इसलिए इस लॉकडाउन में जब हम अपने घरों में बंद हैं तो कुछ रोचक क़िस्से-कहानियों के मार्फत अपनी तनावपूर्ण मानसिक स्थिति को कम करने की कोशिश कर सकते हैं। "डाउन टू अर्थ" आप लोगों के सामने आज लेकर प्रस्तुत हैं ऐसी ही एक कहानी, जो तकरीबन 350 साल पुरानी है। यह कहानी न सिर्फ पुरानी है, बल्कि आज के हालात से हूबहू मिलता-जुलता है। यह आपको लॉकडाउन में घरों में रहने तथा खुद सुरक्षित रहते हुए दूसरों को सुरक्षा पहुंचाने की प्रेरणा देगा।

यह कहानी है इंग्लैंड की एक गाँव "एयम" की। जो लंदन से तक़रीबन 3 घंटे की दूरी पर स्थिति डर्बीशायर डेल्स जिला में स्थित है। यह गांव विश्वभर के लोगों के लिए एक टूरिस्ट स्थान बन गया है। एक हजार से कम जनसंख्या वाला यह गांव कैसे इतने प्रसिद्ध हुआ, इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण है। दरअसल, 1665 में लंदन जानलेवा प्लेग की चपेट में आ गया था जिसे "ग्रेट प्लेग ऑफ लंदन" के नाम से जाना जाता है।

उस समय भी प्लेग से बचाव के लिए वही तरीका अपनाया गया था, जो आज कोरोनावायरस से लड़ने के लिए अपनाया जा रहा है। इस प्लेग ने 1665-66 में तकरीबन 14 महीनों तक इंग्लैंड के विभिन्न इलाकों, खासतौर पर लंदन और उसके इर्दगिर्द के क्षेत्रों में ख़ूब तबाही मचाई थी। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, इस महामारी के वजह से 75,000 लोगों को जानें गंवानी पड़ी थी। लेकिन इतिहासकार का मानना हैं कि यह आंकड़ा एक लाख के ऊपर रही होगी। यह प्लेग चूहा और पिस्सू जैसे जीवों से फैला था और पूरे लंदन को संक्रमित कर दिया था।

लेकिन इसी बीच एक गांव ने अपनी जान पर खेल कर इस संक्रमण को फ़ैलने से रोका। एयम नामक इस गांव के लोगों ने संक्रमण को आगे नहीं बढ़ने दिया। जिसके बदले इस गांव के लोगों को अपनी जानें गवानी पड़ी। उस समय गांव मे कुल जनसंख्या 330 थी, जिसमें से तकरीबन 80 प्रतिशत यानी 259 लोग इस इस प्लेग के संक्रमण के चपेट में आ गए थे और अपनी जान गंवा बैठें।

इस गांव में प्लेग फ़ैलने का इतिहास 1665 में शुरू हुआ, जब स्थानीय दर्जी अलेक्जेंडर हैडफील्ड के लिए लंदन से कपड़े का एक पिस्सू-संक्रमित बंडल आया। एक हफ्ते के भीतर उनके सहायक जॉर्ज विकर्स, जिन्होंने बंडल को खोला था, की मौत हो गयी। जल्द ही यह संक्रमण पूरे गांव में फैलने लगा और लोगों की मौत होने लगी।

जैसे-जैसे बीमारी फैलती गई, ग्रामीणों ने अपने रेक्टर विलियम मोम्पेसन और निष्कासित पूर्व रेक्टर थॉमस स्टेनली से मदद मांगी। उन्होंने मई 1666 से बीमारी के प्रसार को धीमा करने के लिए कई सावधानियां पेश की। जिसमें लोगों को मिल-मिलाव से दूर रहने, अपने घरों में बंद रहने के लिए राजी किया। गांव में और बाहर के लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध के अलावा मृत लोगों को प्रायः खाली दूर-दराज़ वाले मैदान में अंतिम संस्कार और दफन किया जाता था।

सभी चर्च सेवाओं को खुली हवा में आयोजित किया गया था, जिसमें ग्रामीण एक-दूसरे से अच्छी दूरी पर खड़े होते थे। गाँव के दक्षिणी छोर पर कुछ पत्थरों से एक बाउंड्री तैयार किया गया था, जिसमें आसपास के गाँव से खाने के सामानों के साथ अन्य जरूरत की सामान पहुंचता था। इसके बदले एयम के लोग वहीं पत्थर पर कुछ सिक्के रख दिया करते थे। पत्थरों से घिरे वह बाउंड्री आज "मोम्पेस्सन वेल" के नाम से जाना जाता है।

उस शहर के एक इतिहासकार फ्रांसिने क्लिफोर्ड का मानना हैं कि गांव के लोग बहुत वफादार समूह थे और विश्वास करते थे कि यह उनकी ईसाई ड्यूटी थी कि वे एयम के बाहर के लोगों को प्लेग से बचा सकें। वे सभी तरह की उपायों के लिए सहमत थे, भले ही वे वास्तव में अपने मौत को चुन रहे थे। यह एक स्वैच्छिक क्वारंटाइन था। जो आज हमारे लिए प्रेरणादायक सिद्ध हो सकता है। 17वीं शताब्दी की यह प्लेग महामारी ठीक वर्त्तमान समय की कोरोना जैसा रहा होगा, यह अनुमान लगाना बहुत मुश्किल नहीं है।