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प्यास लगने पर कुआं खोदने का प्रयास कर रही उत्तराखंड सरकार

राज्य की करीब 1 करोड़ 20 लाख की आबादी को देखते हुए सरकारी हॉस्पिटल्स में कम से कम 5000 नर्सिंग स्टाफ की जरूरत है

By Trilochan Bhatt

On: Friday 03 April 2020
 
देहरादून के राजकीय मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में हर रोज बड़ी संख्या में कोरोना संदिग्ध मरीज पहुंच रहे हैं। फोटो : त्रिलोचन भट्ट
देहरादून के राजकीय मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में हर रोज बड़ी संख्या में कोरोना संदिग्ध मरीज पहुंच रहे हैं। फोटो : त्रिलोचन भट्ट देहरादून के राजकीय मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में हर रोज बड़ी संख्या में कोरोना संदिग्ध मरीज पहुंच रहे हैं। फोटो : त्रिलोचन भट्ट

कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच उत्तराखंड सरकार ने प्यास लगने के बाद कुआं खोदने के प्रयास तो शुरू कर दिए हैं, लेकिन ये प्रयास कितने सफल होंगे, यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा। राज्य में स्वास्थ्य सेवाएं बेहद लचर हालत में हैं। कोरोना संक्रमण के बाद नये डॉक्टर नियुक्त करने का दावा किया जा रहा है, लेकिन इनमें कितने एमबीबीएस डॉक्टर हैं और कितने बीडीएस, यह साफ नहीं है। दरअसल कुछ समय पहले राज्य सरकार ने बिना डॉक्टर वाले अस्पतालों के लिए बीडीएस (डेंटिस्ट) नियुक्त करने और उन्हें सामान्य बीमारियों में दवाइयां लिखने की अनुमति दी थी। फिलहाल राज्य के कई अस्पतालों में ऐसे डॉक्टर काम कर रहे हैं।

राज्य में सबसे बुरी स्थिति नर्सिंग स्टाफ की है। नर्सिंग स्टाफ की छुट्टियां रद्द हैं और उनके पास जरूरी सुविधाएं तक नहीं है। राज्य की करीब 1 करोड़ 20 लाख की आबादी को देखते हुए सरकारी हॉस्पिटल्स में कम से कम 5000 नर्सिंग स्टाफ की जरूरत लेकिन मात्र 1300 पद मंजूर हैं। इनमें से भी सिर्फ 750 स्टाफ नर्स ही काम कर रही हैं। राज्य के तीन मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की स्थिति तो और भी बुरी है। देहरादून, श्रीनगर और हल्द्वानी के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में आने वाले मरीजों की संख्या को देखते हुए करीब 3000 स्टाफ नर्सों की जरूरत बताई जाती है। 2400 पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से एक भी स्टाफ नर्स किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में नियुक्त नहीं हैं। देहरादून में स्वास्थ्य विभाग से कुछ स्टाफ नर्सेज हायर की गई हैं, जबकि कुछ अन्य नियुक्तियां मामूली मानदेय पर की गई हैं। हालात को देखते हुए उत्तराखंड नर्सेज एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री से नर्सिंग स्टाफ की नियुक्ति करने की मांग की है।

संभावित स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार कितनी तैयार है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य में इस वक्त मात्र 4,748 पीपीई किट हैं। कोरोना वार्ड में कार्य करने वाले हर डॉक्टर, स्टाफ नर्स और दूसरे कर्मचारियों को पीपीई किट जरूरी है और एक किट सिर्फ एक बार ही इस्तेमाल की जा सकती है। राज्य के विभिन्न अस्पतालों में 1138 आईसोलेशन बेड बनाये गये हैं, लेकिन स्थिति बिगड़ने की पर ये वार्ड कितने काम आएंगे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिथौरागढ़ और चमोली जैसे जिलों के कुछ ऐसे अस्पतालों में आईसोलेशन बेड तैयार किये गये हैं, जिनमें फिजिशियन तक नहीं है।

स्वास्थ्य विभाग ने 269 वेंटिलेटर और 513 आईसीयू बेड कोरोना मरीजों के लिए रिजर्व करने का दावा किया है। इनमें से ज्यादातर देहरादून और हल्द्वानी के सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों में ही हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। स्वास्थ्य विभाग ने 8133 लोगों के लिए क्वारंटाइन की व्यवस्था करने का दावा किया है। इसके साथ ही राज्य सरकार ने यह कहकर लोगों को खुद अपनी व्यवस्था करने का भी संकेत कर दिया है कि जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं वे होटलों में भी क्वारंटाइन हो सकते हैं। हालांकि राज्य के 15 अस्पतालों को कोविड-19 अस्पताल बनाने का भी दावा किया गया है।

डॉक्टरों के भारी अभाव को देखते हुए उत्तराखंड चिकित्सा सेवा बोर्ड ने हाल के दिनों में 477 डॉक्टरों की नियुक्ति पत्र जारी किये हैं। इनमें ज्यादातर नियुक्तियां अस्थायी हैं। बोर्ड द्वारा की गई पिछली नियुक्तियां बताती हैं कि चयनित डॉक्टरों में से 60 प्रतिशत से भी कम ज्वाइनिंग देते हैं। हाल में की गई सभी नियुक्तियां लॉकडाउन के बाद हुई हैं, ऐसे में चुने गये कितने डॉक्टर अपने नियुक्ति स्थल तक पहुंच पाएंगे, यह सवाल अपनी जगह है। हालांकि विभाग ने दावा किया है कि चयनित डॉक्टरों को लॉकडाउन के कारण परेशानी न हो, इसकी व्यवस्था की जा रही है, लेकिन ऐसी स्थिति में जबकि सड़कों पर एक भी वाहन नहीं चल रहा है, स्वास्थ्य विभाग ने इसकी क्या व्यवस्था की है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। 

सामाजिक कार्यकर्ता व सीपीआई (एमएल) नेता इंद्रेश मैखुरी करते हैं कि राज्य में सामान्य दिनों में भी स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। चमोली जिले का उदाहरण देते हुए वह कहते हैं कि इस पूरे जिले में एक सर्जन और एक स्त्री रोग विशेषज्ञ नियुक्त है। हाल के वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में कई गर्भवती महिलाओं की मौत हो चुकी है, ऐसे में कोरोना जैसी महामारी से राज्य सरकार कैसे निपटेगी, जबकि कोरोना के लिए रिजर्व किये गये अस्पतालों में पीपीई किट तक उपलब्ध नहीं है।