एआई की मदद से लक्षण प्रकट होने से वर्षों पहले ही लग सकता है डिमेंशिया का पता

यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के शोधकर्ताओं के अनुसार आर्टिफिशल इंटेलिजेन्स की मदद से लक्षणों के प्रकट होने से वर्षों पहले ही डिमेंशिया का पता लगाया जा सकता है

By Lalit Maurya

On: Monday 16 August 2021
 

यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज के शोधकर्ताओं के अनुसार आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद से लक्षणों के प्रकट होने से वर्षों पहले ही डिमेंशिया का पता लगाया जा सकता है। डिमेंशिया एक ऐसा रोग है जिसमें मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार के प्रोटीन का निर्माण होने लगता है, जो मस्तिष्क के उत्तकों को नुकसान पहुंचाने लगते हैं, परिणामस्वरूप इंसान की याददाश्त, सोचने-समझने, देखने और बोलने की क्षमता में गिरावट आने लगती है।

डिमेंशिया किसी एक बीमारी का नाम नहीं है, बल्कि ये कई बीमारियों या यूं कहें कि कई लक्षणों के एक समूह का नाम है। अल्जाइमर इस तरह की सबसे प्रमुख बीमारी है, जो बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित करती है। देखा जाए तो डिमेंशिया या मनोभ्रंश उम्र के बढ़ने के साथ होने वाली एक समस्या है। यह एक ऐसा विकार है जिसमें मरीज मानसिक रूप से इतना कमजोर हो जाता है कि उसे अपने दैनिक कार्यों को पूरा करने के लिए भी दूसरों की मदद लेनी पड़ती है। 

शोधकर्ताओं की मानें तो दिमाग में होने वाले मॉलिक्यूलर और सेलुलर बदलाव आमतौर पर किसी भी लक्षण के प्रकट होने से कई साल पहले ही शुरु हो जाते हैं। यदि मनोभ्रंश की बात करें तो इसका निदान करने में कई महीने या फिर साल भी लग सकते हैं। आमतौर पर इसके लिए दो या तीन बार अस्पताल जाना पड़ता है जहां सीटी, पीईटी और एमआरआई स्कैन के साथ-साथ लंबर पंक्चर जांच भी करनी पड़ती है।

मनोभ्रंश के कारण होने वाली समस्याओं को देखते हुए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े प्रोफेसर जो कोर्त्ज़ी के नेतृत्व में एक टीम ने मशीन लर्निंग टूल्स विकसित किए हैं, जो बीमारी के शुरुवाती चरण में डिमेंशिया का पता लगा सकते हैं। 

कैसे डिमेंशिया की सम्भावना का पता लगाते हैं यह मशीन लर्निंग टूल्स

शोधकर्ताओं ने इसके लिए अल्जाइमर से ग्रस्त रोगियों के मस्तिष्क के स्कैन का उपयोग किया है, जिसकी मदद से उनके मशीन लर्निंग एल्गोरिदम ने मस्तिष्क में होने वाले संरचनात्मक परिवर्तनों को खोजना सीख लिया है। जब इस एल्गोरिदम को स्टैंडर्ड मेमोरी टैस्ट के परिणामों से जोड़कर देखा गया तो वो एल्गोरिदम भविष्य में होने वाले अल्जाइमर की सम्भावना को स्पष्ट करने में सक्षम था। 

जांच से पता चला है कि जिन रोगियों की सोचने-समझने की क्षमता में हल्का सा भी नुकसान हुआ था या फिर जिनकी याददाश्त में गिरावट, देखने, सोचने, समझने और बोलने में समस्या आई थी, उनमें भविष्य में होने वाले अल्जाइमर रोग की भविष्यवाणी करने में यह एल्गोरिदम 80 फीसदी से ज्यादा सटीक था। यही नहीं समय के साथ उनकी अनुभूति कितनी तेजी से घटेगी, यह एल्गोरिदम इसकी भी भविष्यवाणी कर सकता है।

कोर्त्ज़ी के अनुसार उनकी टीम ने मस्तिष्क में ग्रे मैटर लॉस के पैटर्न की तलाश करके, डिमेंशिया के बहुत शुरुआती संकेतों को खोजने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम को प्रशिक्षित किया है। यही नहीं जब इसे स्मृति परीक्षण जांच से जोड़कर देखते हैं तो हम इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि किसी व्यक्ति की अनुभूति में धीमी या तेज गिरावट आएगी। उनके अनुसार यह परिक्षण उन रोगियों की पहचान करने में सक्षम था, जिनमें अल्जाइमर का कोई लक्षण नहीं दिखा था पर वो आगे चलकर इस बीमारी से ग्रस्त हो गए थे। 

हालांकि इस एल्गोरिदम को अल्जाइमर के लक्षणों की पहचान करने के लिए विकसित किया गया है। पर प्रोफेसर कोर्त्ज़ी और उनके सहयोगी अब इसे डिमेंशिया के विभिन्न रूपों की पहचान करने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं।

इस शोध से जुड़े अन्य शोधकर्ता रिटमैन ने बताया कि डिमेंशिया की जल्द पहचान कई कारणों से महत्वपूर्ण है। जब रोगी स्मृति और अनुभूति से जुड़ी समस्याओं का अनुभव करना शुरू करते हैं तो उनके लिए वो समय बहुत कठिन हो जाता है। देखा जाए तो वर्तमान में डिमेंशिया के इलाज के लिए बहुत कम दवाएं उपलब्ध हैं। ऐसे में सही समय पर इसके इलाज के लिए प्रारंभिक अवस्था में ही इसकी पहचान अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। 

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