2019 में माइग्रेन और तनाव का शिकार था भारत का हर तीसरा व्यक्ति

देश में 2019 में 25.3 करोड़ महिलाएं इससे पीड़ित थी वहीं पुरुषों में यह आंकड़ा 23.5 करोड़ था

By Lalit Maurya

On: Friday 16 July 2021
 

2019 में देश की 35 फीसदी से ज्यादा आबादी माइग्रेन और तनाव के कारण होने वाले सिरदर्द का शिकार थी। यह जानकारी हाल ही में अंतराष्ट्रीय जर्नल द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में छपे एक शोध में सामने आई है, जिसमें भारत में बढ़ते न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स का विश्लेषण किया गया है। यदि इसमें प्रकाशित आंकड़ों को देखें तो 2019 के दौरान देश में कुल 48.8 करोड़ लोग माइग्रेन और तनाव जैसे मानसिक विकारों का शिकार थे। वहीं यदि महिलाओं और पुरुषों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक महिलाएं इससे ग्रस्त थीं। जहां करीब 23.5 करोड़ लोग माइग्रेन और तनाव का शिकार थे वहीं महिलाओं में यह आंकड़ा 25.3 करोड़ से ज्यादा था।

देखा जाए तो माइग्रेन और तनाव जैसे मानसिक विकार बदलती जीवनशैली और खान-पान की आदतों में आ रहे बदलावों का नतीजा हैं।  जिसपर गंभीरता से विचार किए जाने की आवश्यकता है। आज जिस तेजी से शहरीकरण हो रहा है उसका असर हमारे स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है। भागती-दौड़ती जिंदगी काफी हद तक इसके लिए जिम्मेवार है। साथ ही भारत की उम्रदराज होती आबादी भी इसका एक कारण है।  वहीं हाइजीन और स्‍वास्‍थ्‍य के प्रति बरती गई लापरवाही भी कहीं हद तक इसके लिए जिम्मेवार है।

यही वजह है कि भारत में 1990 की तुलना में 2019 तक 29 वर्षों में इस तरह के नॉन कम्युनिकेबल न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर जैसे स्ट्रोक, माइग्रेन, तनाव, मिर्गी, अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसे रोगों का बोझ करीब दोगुना हो गया है। जो 1990 में 4 फीसदी से बढ़कर 2019 में 8.2 फीसदी तक पहुंच गया है। 

शोध के मुताबिक देश में न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर के बढ़ते बोझ के लिए काफी हद तक स्ट्रोक जिम्मेवार है। जहां न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर में इसकी हिस्सेदारी करीब 37.9 फीसदी की है। इसके बाद माइग्रेन और तनाव 17.5 फीसदी, मिर्गी 11.3 फीसदी, इस बोझ को मुख्य रूप से बढ़ा रहे हैं। इनके बाद सेरेब्रल पाल्सी 5.7 फीसदी, एन्सेफलाइटिस 5.3 फीसदी, मेनिनजाइटिस 4.8 फीसदी, अल्जाइमर और डिमेंशिया 4.6 फीसदी और गंभीर चोटों के कारण दिमाग पर पड़ने वाला असर करीब 4.1 फीसदी के लिए जिम्मेवार है। 

स्ट्रोक के कारण गई थी करीब 7 लाख लोगों की जान

यदि देखा जाए तो स्ट्रोक या आघात एक ऐसा न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है जो देश में सबसे ज्यादा लोगों की जान ले रहा है| 2019 में जहां इसके 12.9 लाख मामले सामने आए थे, वहीं 6.99 लाख लोगों की जान गई थी, जिनमें 3.63 लाख पुरुष और 3.36 लाख महिलाएं थी।

स्ट्रोक के बाद सबसे ज्यादा मौतें अल्जाइमर और डिमेंशिया के कारण हुई थी जिसके कारण 2019 में 129,000 लोगों की जान गई थी, जिनमें 73,200 महिलाएं थी।  वहीं पार्किंसन रोग ने करीब 45,300, मिर्गी ने 32,700 और ब्रेन और सीएनएस कैंसर के कारण 23,700 लोगों की जान गई थी।

यदि कम्युनिकेबल न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर की बात करें तो देश में इंसेफेलाइटिस की वजह से करीब 51,900 लोगों की जान गई थी।  वहीं मैनिन्जाइटिस की वजह से 34,700 और टेटनस के कारण 7,330 जानें गई थी।

वहीं यदि न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर से होने वाली कुल मौतों को देखें तो इनका सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक है जिसकी इसमें हिस्सेदारी करीब 68 फीसदी थी।  इसके बाद अल्जाइमर और डिमेंशिया के कारण 12 फीसदी और इंसेफेलाइटिस 5 फीसदी मौतों का कारण था। 

स्पष्ट है कि न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर से होने वाली देश में कुल मौतों को देखें तो उनका सबसे बड़ा कारण स्ट्रोक था, जो न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर से होने वाली करीब 68 फीसदी मौतों की वजह था।  इसके बाद अल्जाइमर और डिमेंशिया के कारण 12 फीसदी और इंसेफेलाइटिस 5 फीसदी मौतों का कारण था। 

किन राज्यों पर पड़ रहा है सबसे ज्यादा बोझ

अगर राज्‍यों के लिहाज से देखें तो न्‍यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर से ग्रस्त मरीजों की संख्‍या कहीं ज्‍यादा तो कहीं कम है। रिपोर्ट के मुताबिक विकलांगता-समायोजित जीवन वर्षों या डिसेबिलिटी एडजस्टेड लाइफ ईयर (डीएएलवाई) के हिसाब से राज्यों पर इसके बोझ की बात करें तो स्ट्रोक के मामले में पश्चिम बंगाल की स्थिति सबसे ख़राब है जबकि इसके बाद छत्तीसगढ़, असम और त्रिपुरा की बारी आती है।

इसी तरह मिर्गी के मामले में जिसके एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आए थे, उसका सबसे ज्यादा बोझ ओडिशा झेल रहा है जबकि उसके बाद कर्नाटक और उत्तराखंड की बारी आती है। वहीं अल्जाइमर और डिमेंशिया जिसके करीब 37 लाख मामले सामने आए थे उसका सबसे ज्यादा बोझ केरल, गोवा, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश पर पड़ रहा है। वहीं टेटनस के 16,600 मामले 2019 में सामने आए थे जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और बिहार थे।      

यदि इंसेफेलाइटिस से जुड़े आंकड़ों को देखें तो इसके करीब 6.1 लाख मामले सामने आए थे, जिसका सबसे ज्यादा बोझ तमिलनाडु और उसके बाद ओडिशा और आंध्रप्रदेश पर पड़ रहा है। इसी तरह मैनिन्जाइटिस जिसके 5.52 लाख मामले सामने आए थे| उससे सबसे ज्यादा प्रभावित उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश थे। 

अध्‍ययन के अनुसार न्‍यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स में इस तरह से होने वाली वृद्धि स्वास्थ्य प्रणाली के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारत एक विकासशील देश हैं जहां एक बड़ी आबादी आज भी स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं से दूर है। वहीं चिंता की बात तो यह है कि यहां इन डिसऑर्डर्स को लेकर अभी तक लोगों के पास न तो पूरी जानकारी है और न ही इसके इलाज के लिए पर्याप्त सुविधाएं हैं। ऐसे में इस पर गंभीरता से विचार करने और भविष्य में स्वास्थ्य से जुड़ी नीतियों में इन पर भी ध्यान देने की जरुरत है।