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मिलावटी शहद: उपभोक्ताओं को भ्रमित करता है डाबर का विज्ञापन

शहद बेचने वाली कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं को दिए जा रहे भ्रामक संदेश से यह तथ्य कभी नहीं बदल सकता कि उनके शहद में शुगर सिरप की मिलावट है 

By Sonal Dhingra

On: Wednesday 23 December 2020
 
Dabur’s advertisements are attempts to confuse consumers. Photo: YouTube
Dabur’s advertisements are attempts to confuse consumers. Photo: YouTube Dabur’s advertisements are attempts to confuse consumers. Photo: YouTube

जब से दिल्ली स्थित गैर-लाभकारी संस्था, सेंटर फॉर साइंस एंड एंवायरमेंट (सीएसई) ने शहद में मिलावट का खुलासा किया, तभी से डाबर इंडिया लिमिटेड ने अपने शहद को ले कर आक्रामक विज्ञापन रणनीति अपना ली है। 

अपने ताजा वीडियो विज्ञापन में, डाबर ने कहा है कि डाबर शहद के हर बैच का परीक्षण भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया: एफएसएसएआई) द्वारा निर्धारित 22 मापदंडों पर किया गया था।

सिर्फ इतना ही नहीं। इसने नए परीक्षणों (न्यूक्लियर मैग्नेटिक रेजोनेंस यानी एनएमआर) को महत्वहीन बताते हुए कहा है: “किसी नए परीक्षण के नाम से कोई शहद शुद्ध नहीं बन जाता।“

लेकिन सवाल है कि क्या सीएसई की जांच से पहले डाबर ने अपने शहद का विज्ञापन “एनएमआर-टेस्टेड” बता कर नहीं किया था?

केवल दो ब्रांड, जिसमें एक डाबर भी था, ने दावा किया था कि उनका शहद एनएमआर-टेस्टेड है। लेकिन क्या डाबर ने कभी अपने उपभोक्ताओं को निरंतर ये जानकारी देने की जरूरत समझी?

पहले के विज्ञापनों में उसने कहा कि उसका उत्पाद “एनएमआर-टेस्टेड, शुद्ध शहद” और “कच्चा शहद, एनएमआर प्रोफाइल” के अनुसार है। सीएसई की रिपोर्ट आने के एक दिन बाद डाबर ने इन तथ्यों का उल्लेख करना बंद कर दिया।

इसके बजाय डाबर ने यह बताना शुरू किया कि उत्पाद "सोर्स एनएमआर टेस्टेड" था और इसके पास भारत में पहली कॉर्पोरेट स्वामित्व वाली एनएमआर मशीन थी। तो क्या इसका मतलब यह नहीं है कि उपभोक्ताओं ने जिस शहद का सेवन किया, वह एनएमआर-टेस्टेड नहीं था?

ये उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले संदेश थे, जिन्हें सबूतों के जरिए प्रमाणित नहीं किया जा सकता था। सीएसई के निष्कर्षों का खंडन करते वक्त डाबर अपने टेस्टेड शहद के लिए एनएमआर रिपोर्ट पेश नहीं कर सका।

डाबर सिर्फ एक सैंपल की एनएमआर प्रोफाइलिंग के लिए ब्रूकर उपकरण/ मशीन रिपोर्ट पेश कर सका, वो भी बिना सैंपल के पूर्ण विवरण के। जैसे, सैंपल संख्या, उत्पादन तिथि, आदि।

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पहले इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि को समझते है। सीएसई ने डाबर शहद के तीन बैचों की जांच की थी। इस जांच में शहद के तीनों बैच एफएसएसएआई द्वारा निर्धारित मापदंडों पर पास हो गए। ये मापदंड थे, सी4 और सी3 शुगर की जांच, राइस सिरप के लिए स्पेसिफिक मार्कर और फॉरेन ओलिगोसेकेराइड (एक तरह का कार्बोहाइड्रेट)। यह सिर्फ एक जांच में फेल हुआ और ये जांच थी एनएमआर (सभी तीन बैच) और राइस सिरप के लिए ट्रेस मार्कर (1 बैच)।

यह एनएमआर जांच में विफल रहा। प्रयोगशाला विशेषज्ञों ने अपनी रिपोर्ट में “शुगर सिरप की अनधिकृत/अतिरिक्त” मिलावट पाई। 

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डाबर इस जांच में विफल रहा, जबकि वह दावा कर रहा था कि इसका शहद मिलावट रहित है।

इस जांच में फेल होने के बाद, दुनिया की इस नंबर एक शहद ब्रांड के पास दो रास्ते थे। या तो वो मिलावटरहित शहद का उत्पादन करें या उपभोक्ताओं को भ्रामक सन्देश देते हुए पहले की तरह ही अपना धन्धा चलाती रहे।

डाबर ने दूसरा रास्ता चुना और उपभोक्ताओं को भ्रमित करना शुरु किया। इसने केवल उन मापदंडों के बारे में बात करना शुरु किया, जिस पर यह सफल रहा था। लेकिन क्या इससे यह तथ्य बदल जाएगा कि डाबर शुद्धता की जांच में विफल रहा? नहीं।

यदि डाबर भ्रामक संदेश के सहारे उपभोक्ताओं के बीच एक अवधारणा निर्मित करने के बजाए अपने शहद की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करता है, तो यह डाबर के साथ-साथ आम लोगों के लिए भी फायदेमंद होगा।