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मिलावटी शहद: सीएसई ने डाबर और पतंजलि को दिया जवाब

2 दिसंबर को सीएसई ने खुलासा किया था कि देश के 13 में से 10 प्रमुख ब्रांड के शहद में मिलावट की जा रही है, डाबर और पतंजलि ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी

By DTE Staff

On: Thursday 03 December 2020
 
CSE response to Dabur, Patanjali

2 दिसंबर 2020 को सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने शहद में मिलावट के गोरखधंधे पर अपनी जांच का निष्कर्ष पेश किया। इसे लेकर देश के दो बड़े ब्रांड्स- डाबर और पतंजलि ने मीडिया में अपने बयान जारी किए हैं। सीएसई ने इन बयानों पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। डाबर ने बयान दिया है कि इस रिपोर्ट से ब्रांड की छवि खराब हो रही है। उनका शहद जर्मनी से एनएमआर टेस्ट में सफल रहा है और भारतीय मानकों पर खरा उतरता है।  

इस बयान के संबंध में सीएसई का कहना है कि हम अपनी रिपोर्ट पर कायम हैं। परिणामों में सामने आया है कि 13 में से 10 ब्रांड शुद्धता की कसौटी पर खरे नहीं उतरे हैं। इनमें अधिकतर बड़े ब्रांड्स हैं, जिनमे डाबर भी शामिल है। यह रिपोर्ट सिर्फ डाबर के बारे में नहीं है। बल्कि हमने साफ बताया है कि कैसे छोटे ब्रांड्स की शहद में भी मिलावट मिली है। ये उपभोक्ता की सेहत का सवाल है। हमने सभी नमूनों के विस्तृत प्रयोगशाला परिणाम अपनी वेबसाइट पर शेयर किए हैं।

सीएसई के मुताबिक, डाबर की वेबसाइट पर जो एनएमआर टेस्ट रिपोर्ट मौजूद है और जिसे कंपनी ने अपने बयान के साथ मीडिया के सामने जारी किया है वह एनएमआर प्रोफाइलिंग के लिए ब्रूकर इक्विपमेंट/मशीन की रिपोर्ट है। ब्रूकर एक कंपनी है जिसने एनएमआर तैयार किया है और जो उसे प्रमोट करती है। हम उपभोक्ताओं को इस बात के प्रति जागरूक करना चाहेंगे कि यह ऐसी लैब रिपोर्ट नहीं है, जिसमें इस मशीन से मिली जानकारी का किसी विशेषज्ञ द्वारा विश्लेषण शामिल होता है।

एनएमआर के केस में यह बेहद जरूरी है कि नमूनों में मिलावट के बारे में एनएमआर रिपोर्ट पर किसी लैब एक्सपर्ट से मशविरा किया जाए और उनकी व्याख्या और पुष्टि के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकाला जाए। यहां तक कि डाबर ने जो रिपोर्ट साझा की है उसमें भी यह साफ लिखा है कि कोई निष्कर्ष निकालने से पहले एक्सपर्ट की राय लेना जरूरी है।

वहीं दूसरी तरफ, सीएसई ने जर्मनी की लैब रिपोर्ट पर आधारित जांच परिणाम साझा किए हैं, जिसमें मशीन से प्राप्त हुए डाटा की एक्सपर्ट द्वारा व्याख्या और प्रमाणीकरण शामिल है। यह सर्वत्र रूप से मान्य व्यवस्था है।  

इसके आगे, डाबर ने सिर्फ एक सैंपल की रिपोर्ट साझा की है। साथ ही इसमें टेस्ट किए गए सैंपल के बैच नंबर का कोई जिक्र नहीं है। लिहाजा यह साफ नहीं होता है कि किस बैच की बात की जा रही है। दूसरी तरफ, हमने डाबर के तीन सैंपल के तीन बैच नंबर बताए हैं। यह बैच नंबर - BM3463 जिसकी उत्पादन का तारीख 25 मई 2020 है। बैच नंबर BM3589 जो 10 जुलाई 2020 को बनाई गई। और बैच नंबर BM3636 जिसे 5 अगस्त को बनाया गया। तीनों ही बैच में मिलावट पाई गई। प्रयोगशाला परीक्षण में सैंपल नंबर के न होने के बाद शहद में शुद्धता को लेकर डाबर के दावे मान्य नहीं हैं।  

हमने इस बात पर भी गौर किया है कि डाबर लगातार एनएमआर टेस्ट के संबंध में अपने दावों की भाषा में बदलाव कर रहा है। पुराने विज्ञापनों में डाबर ने शहद को "एनएमआर प्रमाणित, शुद्ध शहद" बताया था, जबकि आज सीएसई की पड़ताल के प्रकाशन के बाद डाबर "सोर्स एनएमआर प्रमाणित" होने का दावा कर रहा है। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण का सवाल है कि, "क्या भाषा में ये फेरबदल ग्राहकों को भ्रमित करने की नई कोशिश है? 

डाबर का यह दावा कि वह भारतीय नियमों का पालन कर रहा है कोई हैरानी की बात नहीं है। यही हम भी कह रहे हैं - कि मिलावट का धंधा काफी प्रगतिशील है। एफएसएसएआई के द्वारा तय किए गए मानकों की जांच करने की कोशिश करती भारतीय लैब इस विकसित मिलावट को नहीं पकड़ पाती हैं। हमारे द्वारा जानबूझकर शहद की गई 50 प्रतिशत तक की मिलावट का सभी भारतीय टेस्ट में पास हो जाना इस बात का पुख्ता प्रमाण है। लिहाजा, भारतीय मानकों पर खरा उतरने का कोई भी दावा बहुत मान्यता नहीं रखता है। 

मीडिया को दिए गए बयान में पतंजलि ने सीएसई पर जर्मनी की टेक्नोलॉजी का प्रसार का आरोप लगाया है।

इस मामले में सीएसई का कहना है कि हम इस बारे में अपना दृष्टिकोण एक बार फिर सबको बता देना चाहते हैं। एनएमआर यानी कि न्यूक्लियर मेग्नेटिक रेजोनेंस एक उन्नत तकनीक का टेस्ट है, जो सिरप में चीनी की मिलावट का पता लगा सकता है जो सामान्य टेस्ट से पता नहीं लगता है। यही कारण है कि यह टेस्ट दुनिया के कई हिस्सों में इस्तेमाल किया जा रहा है, यहां तक कि भारत सरकार ने भी इसे निर्यात किए जाने वाले शहद की जांच के लिए अगस्त 2020 से अनिवार्य कर दिया है।

लिहाजा सरकारी जांच प्रणाली में ऐसी आधुनिक जांच तकनीक को शामिल करना अहम हो सकता है, जिससे नियामक संस्थाओं को यह पता लगाने में मदद मिले कि ग्राहकों को बेचा जाने वाला शहद मिलावटी है या नहीं। इस तकनीक से संस्थाओं को यह जानने में भी मदद मिलेगी कि कौन से कंपनियां मिलावटी शहद बेच रही हैं, जो कि एक जुर्म है, और वे दोषियों के खिलाफ उचित दंडात्मक कार्रवाई कर सकेंगी।

बल्कि हमने इस बात पर जोर दिया है कि एनएमआर को अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि यह सीमित समय के लिए ही मदद कर पायेगा। मिलावट का धंधा इतना परिष्कृत और प्रगतिशील है कि जल्द ही बाजार में ऐसे सिरप भी मिलेंगे, जो एनएमआर टेस्ट से भी बचकर निकल जाएंगे।

शहद की जांच के लैब रिजल्ट पर आधारित सीएसई की रिपोर्ट यहां देखें -