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डॉक्टरों की सलाह, जंक फूड पैकेटों पर लिखी हो शुगर, साल्ट और फैट की जानकारी

देश में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री को देखें तो 2005 में जहां यह 2 किलोग्राम प्रति व्यक्ति थी, वो 2019 में बढ़कर 6 किलोग्राम तक पहुंच गई है और 2024 तक उसके 8 किलोग्राम तक पहुंचने का अनुमान है

By Lalit Maurya

On: Wednesday 30 June 2021
 

मधुमेह (डायबिटीज) की बढ़ती समस्या से बचने के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों ने जंक फूड पैकेटों के लेबल पर शुगर, साल्ट और फैट की वैज्ञानिक सीमा से सम्बंधित जानकारी को दर्शाए जाने की मांग की है। जिससे ग्राहकों को इनके बारे में सही जानकारी मिल सकें और वो जंक फूड को खरीदने के बारे में सही फैसला ले सकें।

एम्स के अग्रणी डॉक्टरों ने देश में डायबिटीज़ के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई है साथ ही इसमें कमी लाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की मांग की है। उनके अनुसार पैकेज, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड, फूड और पेय पदार्थों में साल्ट, शुगर एवं सैचुरैटेड फैट्स जरुरत से अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। ऐसे में इनकी अधिकतम सीमा के निर्धारण के लिए वैज्ञानिक आधार को ध्यान में रखकर नीतियां बनाई जानी चाहिए।

देश में जिस तरह से एक के बाद एक कोविड-19 की लहर आ रही है, उसका असर मधुमेह के रोगियों पर भी देखने को मिला है। डॉक्टरों के अनुसार मधुमेह के मरीजों पर कोविड-19 के इलाज का असर उतना असरदार नहीं होता है। डॉक्टरों ने यह मांग आज एम्स, जोधपुर द्वारा ‘भारत में फ्रंट पैकेज लेबलिंग के डायबिटीज़ मेलिटस का समाधान’ पर आयोजित एक राष्ट्रीय सत्र में की है।

इंटरनेशनल डायबिटीज़ फेडरेशन (आईडीएफ) के अनुसार, देश में करीब 7.7 करोड़ से ज्यादा लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, जोकि दुनिया में सबसे ज्यादा हैं। इस बारे में एम्स, जोधपुर के डायरेक्टर डॉ. संजीव मिश्रा ने चौंकाने वाली जानकारी दी है कि यह संख्या 2045 तक दोगुनी हो जाएगी। तब देश में करीब 13.4 करोड़ लोग मधुमेह से ग्रस्त होंगे।

हालांकि जंक फ़ूड केवल मधुमेह की समस्या को बढ़ा रहा है ऐसा नहीं है। इससे पहले ब्रिटिश जर्नल ऑफ ओप्थोमोलॉजी में छपे एक शोध से पता चला है कि यह बुजुर्गों में मैक्यूलर डिजनरेशन नामक विकार को जन्म दे रहा है, जोकि उनकी आंखों के लिए गंभीर खतरा है। इसी तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी आंकड़ों से पता चला है कि हर साल जरुरत से नमक (सोडियम) के सेवन से दुनिया में 30 लाख से ज्यादा लोगों की जान जा रही है। साथ ही इसके कारण रक्तचाप और हृदय रोग का खतरा भी बढ़ रहा है। इसे सीमित करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने नई गाइडलाइन भी जारी की है।

जब मामला लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा हो तो ऐसे में इस समस्या को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार 1990 के बाद से इस देश में जो मधुमेह पीड़ितों की संख्या में जो इजाफा हुआ है, उसे प्रोसेस्ड फूड के बढ़ते उपभोग के साथ जोड़ा जा सकता है। देश के विभिन्न आयु वर्ग और सामाजिक आर्थिक श्रेणियों में मधुमेह के मामलों में वृद्धि हुई है जिसके लिए कहीं हद तक भारतीयों की आहार सम्बन्धी आदतों में आया भारी बदलाव भी है।

जंक फूड के खतरों पर सीएसई ने भी जारी किया था व्यापक अध्ययन

हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है जब देश में जंक या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड को लेकर इस तरह की मांग उठी है। इससे पहले काफी समय से सीएसई इसके खतरों के बारे में लोगों को जागरूक करता रहा है। इसपर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने एक व्यापक अध्ययन भी किया था जिसमें जंक फ़ूड से जुड़े खतरों के बारे में चेताया गया था।

इस अध्ययन के अनुसार भारत में बेचे जा रहे अधिकांश पैकेज्ड और फास्ट फूड आइटम में खतरनाक रूप से नमक और वसा की उच्च मात्रा मौजूद है, जो भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा निर्धारित तय सीमा से बहुत ज्यादा है।

सीएसई ने भी इस खतरे से लोगों को आगाह किया था। साथ ही लेबलिंग से जुड़े कानूनों को तत्काल लागु करने की मांग की थी। साथ ही जो खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं उनपर अलग से लाल चेतावनी लेबल लगाने की मांग की थी।  

मधुमेह प्रबंधन के लिए पोषणयुक्त आहार बहुत मायने रखता है, जिसमें शुगर, साल्ट एवं सैचुरेटेड फैट की मात्रा नियंत्रण में हो। डॉ. मधुकर मित्तल, अटैंडेंट प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ एंडोक्राईनोलॉजी एंड मेटाबोलिज़्म, एम्स, जोधपुर ने बताया कि, “शुगर नए जमाने का सिगरेट है। लैब के अध्ययनों में सामने आया है कि शुगर उतना ही एडिक्शन करती है, जितना कोकेन से होता है। इससे इंसुलिन का उत्पादन बढ़ जाता है, जो फैट स्टोरेज को बढ़ा देता है, इससे सभी अंगों की व्यवस्था को क्षति होती है।

आज पैकेज़्ड एवं प्रोसेस्ड फूड के रूप में अतिरिक्त शुगर का उपभोग बहुत ज्यादा बढ़ गया है। यदि देखा जाए तो भारत में शुगर का उपभोग दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले दोगुनी तेजी से बढ़ा है। अधिकांश पैकेज़्ड फूड एवं बेवरेज में शुगर की अत्यधिक मात्रा होती है। चूंकि फूड का विकल्प बाजार एवं नीतियां निर्धारित करती हैं, इसलिए हमें कठोर नीतियां बनाने की जरूरत है, ताकि उपभोक्ता सेहतमंद विकल्प को चुनें।“

आखिर क्यों वर्षों से सरकार ने बंद कर रखीं हैं आंखें

पिछले कुछ वर्षों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड उद्योग भारत में रिकॉर्ड गति से बढ़ा है। भारत शुगर युक्त बेवरेज के लिए विश्व के पांच प्रमुख बाजारों में दूसरे स्थान पर है। अध्ययनों से पता चला है कि सेहतमंद आहार को अपनाए जाने को बढ़ावा देने की जरूरत के बावजूद, खासकर महामारी के परिदृश्य में मल्टीनेशनल कंपनियां नुकसानदायक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड एवं शुगरयुक्त ड्रिंक्स को बढ़ावा देती रहीं हैं।

समस्या तो तब और गंभीर हो जाती है जब उनमें मौजूद नुकसानदायक तत्वों के लिए सरकार की कोई सीमा तय नहीं कर रही। अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री के मामले में प्रति व्यक्ति सेल्स 2005 में जहां 2 किलोग्राम थी वो 2019 में बढ़कर लगभग 6 किलोग्राम तक पहुंच गई है और 2024 तक इसके 8 किलोग्राम तक पहुंचने का अनुमान है। इसी प्रकार, अल्ट्रा प्रोसेस्ड बेवरेज की बिक्री 2005 में 2 लीटर से 2019 में 6.5 लीटर और 2024 तक लगभग 10 लीटर तक पहुंचने का अनुमान है।

एम्स, ऋषिकेश के डॉ. प्रदीप अग्रवाल ने जानकारी दी है कि “साल्ट, शुगर एवं अन्य घटकों को तय सीमा में रखने के लिए कठोर नियम और फूड पर आसानी से समझ में आने वाली फ्रंट पैकेज लेबलिंग (एफओपीएल) होनी चाहिए। जिससे उपभोक्ताओं एवं अभिभावकों को यह समझने में मदद मिल सके की इनके लिए तय सीमा क्या है और बच्चे कितनी बेकार कैलोरी एवं नुकसानदायक न्यूट्रियंट खा रहे हैं।

डब्लूएचओ ने खाद्य से जुड़े हर क्षेत्र के लिए शुगर, साल्ट एवं फैट के उपभोग सम्बन्धी प्रमाण आधारित कट ऑफ स्थापित किए हैं और सरकारों को पैकेज़्ड फूड के लिए इन कट-ऑफ्स को अपनाना चाहिए। साथ ही फूड लेबल्स पर उपभोक्ताओं को स्पष्ट दिशानिर्देशन प्रदान करने चाहिए। उदाहरण के लिए चिली में अपनाए गए ब्लैक ऑक्टागंस पर पहले से लिखा होता है कि इस फूड में फैट या शुगर की अतिरिक्त मात्रा है या नहीं।“

आज अधिक से अधिक देश वैज्ञानिक आधारित न्यूट्रिएंट प्रोफाईल मॉडल अपना रहे हैं और फूड प्रोडक्ट्स के पैक के फ्रंट में चेतावनी लगाना अनिवार्य बना रहे हैं। पैकेज के फ्रंट में लेबल होने के कारण उपभोक्ताओं को सामग्री, खासकर शुगर, सोडियम और सैचुरेटेड फैट की जानकारी पढ़ना आसान होता है और यह जानकारी देखकर वो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पैकेज़्ड फूड को कम खरीदने के लिए प्रेरित होंगे। अभी तक दुनिया में 11 देश एफओपीएल को अनिवार्य बनाने के कानून लागू कर चुके हैं।

भारत में भी 2018 में, फूड सेफ्टी स्टैंडडर्स अथॉरिटी इंडिया (एफएसएसएआई) ने एफओपीएल के लिए एक ड्राफ्ट रैगुलेशन प्रकाशित किया था, जो बाद में विचार विमर्श के लिए वापस ले लिया गया। वहीं दिसंबर, 2019 में, एफएसएसएआई ने एफओपीएल को आम लेबलिंग के नियमों से डिलिंक कर दिया। दिसंबर, 2020 में इसने प्रक्रिया पुनः प्रारंभ की और वर्तमान में सिविल सोसायटी, उद्योग एवं न्यूट्रिशन एक्सपटर्स से भारत के लिए व्यवहारिक मॉडल के लिए विचार विमर्श कर रहा है। एफओपीएल तब सबसे ज्यादा प्रभावशाली होगा, जब इसे अनिवार्य कर दिया जाए और यह सभी पैकेज़्ड उत्पादों पर लागू हो।