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वैज्ञानिकों ने बनाई ऐसी चिप जो दिल का दौरा पड़ने से पहले दे देगी जानकारी

हृदय रोग (सीवीडी) दुनिया भर में मौत का प्रमुख कारण है, ज्यादातर रोगी कार्डियक इस्किमिया से पीड़ित होते हैं

By Dayanidhi

On: Tuesday 31 March 2020
 

अमेरिका स्थित टफ्ट्स विश्वविद्यालय में बायोमेडिकल इंजीनियरों के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने हृदय कोशिकाओं के लिए एक माइक्रोफ्लुइडिक चिप का आविष्कार किया है। यह दिल के दौरे के दौरान हाइपोक्सिक स्थिति को संभालने में सक्षम है। हाइपोक्सिया वह स्थिति है जब खून में ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम हो जाती है। चिप में बहुत सारे इलेक्ट्रॉनिक सेंसर लगे होते हैं जिन्हें कोशिकाओं के बाहर और अंदर लगाया जाता है। ये कोशिकीय झिल्लियों में वोल्टेज के बढ़ने और कम होने का पता लगा सकते हैं, साथ ही कोशिका की परत के पार जाने वाली वोल्टेज तरंगें, जिसके कारण कोशिकाएं चिप में एकसमान रूप से धड़कती हैं, जैसा कि हृदय में होता हैं।

उपकरण के भीतर तरल पदार्थ में ऑक्सीजन के स्तर को कम करने के बाद, सेंसर हृदय की धड़कन में असामान्य तेजी के शुरुआती समय का पता लगा सकता हैं। अक्सर धड़कन की दर में कमी आने से दिल की धड़कन अनियमित हो जाती है। यह दिल के दौरे की तरह होता है। यदि समय पर इसका पता चल जाए तो जान बच सकती है।

नैनो लेटर्स में प्रकाशित इस शोध में इस्केमिक हार्ट अटैक अथवा इस्केमिक दिल के दौरे के कोशिकीय स्तर पर इलेक्ट्रोफिजियोलॉजिकल प्रतिक्रियाओं को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, और इसे भविष्य में दवा बनाने के उपयोग में लाया जा सकता है। इस्केमिक हार्ट अटैक या इस्केमिक दिल की बीमारियां ऐसे रोग हैं जो रक्तप्रवाह में कमी के कारण होते हैं।

हृदय रोग (सीवीडी) दुनिया भर में मौत का प्रमुख कारण है, ज्यादातर रोगी कार्डियक इस्किमिया से पीड़ित होते हैं। यह तब होता है जब हृदय को रक्त की आपूर्ति करने वाली धमनी आंशिक रूप से या पूरी तरह से अवरुद्ध हो जाती है। इसमें हाइपोक्सिया वाले हृदय की कोशिकाओं और ऊतकों में परिवर्तन, कोशिका झिल्ली में वोल्टेज की क्षमता में परिवर्तन, जीन के काम में बदलाव, परिवर्तित चयापचय कार्य और आयन चैनलों को सक्रिय या निष्क्रिय करना शामिल है।

माइक्रोफ्लुइडिक चिप में प्रयुक्त बायोसेंसर तकनीक बहुत सारे इलेक्ट्रोड समूहो को जोड़ती है, कोशिकाओं में वोल्टेज पैटर्न की सूचनाओं को प्रदान कर सकते हैं। ये प्रत्येक कोशिका के भीतर वोल्टेज स्तर की सूचना के लिए झिल्ली में प्रवेश करते हैं। शोधकर्ता चिप में लगे छोटे चैनल के द्वारा हाइपोक्सिया की स्थिति को समझने के लिए ऑक्सीजन की मात्रा को लगातार कम कर सकते है। इसमें ऑक्सीजन के स्तर को लगभग 1-4 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है या सामान्य स्थितियों की तरह ऑक्सीजन को 21 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है।

टफ्ट्स यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर और अध्ययनकर्ता ब्रायन टिमको ने कहा कि, हार्ट-ऑन-ए-चिप मॉडल बीमारियों को दूर करने का एक शक्तिशाली उपकरण हैं। इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी का अध्ययन करने के लिए उपयोग किए जा रहे मौजूदा उपकरण में कुछ कमी हैं, क्योंकि यह हृदय के हर भाग पर काम नहीं करता जिससे कोशिकाओं पर अधिक दबाव रहता है जिसके कारण यह उनको नुकसान पहुंचाता है। हाइपोक्सिया के दौरान अणुओं और इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी के बीच सूचनाओं का प्रसार बड़ी तेजी से होता है, और हमारा उपकरण कोशिकाओं से वास्तविक समय में बहुत सारी जानकारियों को बिना नुकसान पहुंचाए कैप्चर कर सकता है।

परीक्षण के दौरान इस उपकरण ने हृदय की कोशिकाओं की परत के ऊपर से गुजरने वाली वोल्टेज तरंगों का एक दो-आयामी नक्शा प्रदान किया, जिससे सामान्य (21 प्रतिशत) ऑक्सीजन के स्तर के तहत एक पूर्वानुमानित तरंग पैटर्न का पता चला। इसके विपरीत, शोधकर्ताओं ने अनियमित और धीमी लहर पैटर्न का अवलोकन किया, खासकर उस समय जब खून में ऑक्सीजन का स्तर 1 प्रतिशत तक कम हो गया था। नैनोप्रोब सेंसर्स ने प्रत्येक कोशिका के भीतर होने वाले काम के बारे में सटीक जानकारी प्रदान की।

बाह्यकोशिकीय और अंतःकोशिकीय संवेदक एक साथ इस्केमिक आघात के इलेट्रोफिज़ियोलॉजिकल प्रभावों की जानकारी प्रदान करते हैं, जिसमें कोशिकाओं का कुछ समय तक काम करना बंद हो जाता है। इस स्थिति में माइक्रोफ्लुइडिक चिप दवा की खोज में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, जो कोशिकाओं और ऊतकों को सामान्य कार्य करने के लिए तेजी से ठीक करने में मदद करता है।