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जूनोटिक बीमारियां: पर्यावरण के साथ हमारा व्यवहार और बीमारियों का प्रसार

स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रशांत एनपी का कहना है कि वनों की कटाई के के साथ ही वनों और वन्यजीवों के साथ हमारा अनुचित व्यवहार बीमारियों के प्रसार संभावना को बढ़ाता है

By Ishan Kukreti

On: Friday 08 May 2020
 

क्या नोवेल कोरोनावायरस बीमारी (कोविड-19) एक जूनोटिक रोग है? कैसे ये वायरस जानवरों से मनुष्यों में पहुंच जाता है? डाउन टू अर्थ ने प्रशांत एनपी, हेल्थ इक्विटी क्लस्टर लीड, वेलकम ट्रस्ट डीबीटी इंडिया एलायंस फेलो इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ, बैंगलोर से इस मुद्दे पर बातचीत की है। इस बातचीत के संपादित अंश:

वो क्या कारण हैं, जिससे एक वायरस जानवरों से इंसानों तक और फिर इंसानों से इंसानों तक पहुंच जाता है?

आमतौर पर, ऐसा तब होता है, जब एक वायरस अपने खास होस्ट (मेजबान) से अलग एक नया होस्ट खोजने में सक्षम हो जाता है। इस तरह की प्रसार की घटनाएं तब अधिक होती हैं, जब वायरस मानव जैसे होस्ट के संपर्क में आता है या जब यह म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) करने में सक्षम होता है, जो इसे मानव शरीर के भीतर स्थापित करता है। इंसान और जानवर के बीच भौतिक नजदीकी, जिसमें जैविक पदार्थ का आदान-प्रदान हो या जानवर और जानवर के बीच संबंध से वायरस को एक प्रजाति से दूसरे प्रजाति तक पहुंचने में मदद मिलती है। ऐसी घटनाएं, बीमारियों (वायरस) के प्रसार के लिए आदर्श स्थिति बनाती हैं।

क्या वायरस के मानव से मानव संचरण (ट्रांसमिशन) में वृद्धि हुई है?

वनों और वन्यजीवों के जीवन में हमारी दखलअन्दाजी और वनों की कटाई के से वायरस प्रसार की संभावना बढ़ गई है। जिस तरह से हम अपने पर्यावरण के साथ सलूक करते हैं, निश्चित रूप से नए रोगजनकों (पैथोजंस) के संपर्क में आने की घटनाओं में वृद्धि हुई है, अन्यथा ये वायरस इतनी बड़ी आबादी के संपर्क में नहीं आते। उदाहरण के लिए, दक्षिणी भारत में कयासनूर फॉरेस्ट डिसीज (केएफडी) पश्चिमी कर्नाटक के एक छोटे से शहर तक सीमित था। लेकिन आज, वेस्टर्न घाट (पश्चिमी घाट) में बसे कई राज्यों से इस बीमारी की सूचना मिली है। हमने हाल ही में उन संभावित स्थानों की भविष्यवाणी की है, जहां केएफडी हो सकता है। इन सभी संभावित स्थानों पर तेजी से लैंड यूज चेंज (भूमि-उपयोग परिवर्तन) किए जा रहे हैं। यहां पर वनों की कटाई तेजी से हो रही है। अक्सर वनों की कटाई वनक्षेत्र में रहने वाले स्थानेय समुदाय के लोग नहीं करते हैं। ये काम शहरों के शक्तिशाली लोगों द्वारा किया जाता है, जिनके अपने हित होते हैं। हमें समझना चाहिए कि वायरस का मूल होस्ट से नए प्रजाति के होस्ट में प्रसार जितना जेनेटिक वजहों से है, उतना ही पर्यावरण के अंधाधुन्ध दोहन के कारण भी है। आर्थिक लाभ के लिए, सुदूर क्षेत्रों में अचानक होने वाले सामाजिक-जनसांख्यिकीय परिवर्तन और दोतरफा पलायन, इन क्षेत्रों में नई आबादी की संख्या बढ़ा देता है। ये नए लोग पर्यावरण के साथ नए तरीके से सलूक करते हैं। इस वजह से भी वे बीमारियों (वायरस) के प्रसार का जोखिम बढ़ा सकते हैं।

क्या इंसान और जानवर की इम्यूनिटी सिस्टम में अंतर हमें जूनोटिक बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना देता है?

इंसान और जानवरों की इम्यूनिटी सिस्टम बहुत अलग नहीं होती है। पैथोजंस केवल ऐसे होस्ट की तलाश करते हैं जो उन्हें फैलने और पनपने की अनुमति देते हैं। वास्तव में, एक अनुकूलित पैथोजन होस्ट को तुरंत नहीं मारता। मलेरिया या एचआईवी का उदाहरण देखें। एचआईवी के केस में, संभावित प्राथमिक होस्ट से मनुष्यों तक पहुंचने में वायरस हाई म्यूटेशन से नहीं गुजरा, जबकि दोनों सिस्टम में समानता है। लंबी बीमारी यह सुनिश्चित करती है कि पैथोजन का पनपना जारी रहे। अधिक मौतों का कारण बनने वाले पैथोजन मर जाएंगे, यदि वे आगे म्यूटेशन के जरिए खुद को अनुकूलित न कर ले। हालांकि, ऐसे म्यूटेशन से हमेशा पैथोजन को फायदा नहीं होता है। फिर भी, इंसान के भीतर अन्य बीमारियों के कारण इम्यूनिटी में अंतर आ सकता है। उदाहरण के लिए, यह तर्क दिया जाता है कि कीटाणुओं के मानव से मानव ट्रांसमिशन ने मानव इतिहास को बदल दिया। अमेरिका के आधुनिक उपनिवेशीकरण के दिनों में यूरोपियन वहां अपने साथ कुछ पैथोजंस लेकर पहुंचे, जो भारी संख्या में मूल अमेरिकियों की मौत का करण बने। यहां भी, कमजोर इम्यूनिटी और पोषण की कमी वाली आबादी को उच्च मृत्यु दर का सामना करना पड़ा। 

क्या कोई वायरस एरोसोल (हवा) से फैल सकता है? ऐसी कोई घटना सामने आई है, जिसमें मानव से मानव के बीच, खांसी से निकले सूक्ष्म बूंदों के बजाए एरोसोल से वायरस पहुंचा हो?

एक वायरस तभी एरोसोल से फैल सकता है, यदि ये प्रतिकूल वातावरण में जीवित रहने में सक्षम हो। पैथोजंस, जो वायरल, बैक्टीरियल और फंगल रोगों जैसे खसरा, तपेदिक और चिकनपॉक्स का कारण बनते हैं, ने ऐसी क्षमता विकसित कर ली है। वे विभिन्न पर्यावरणीय कारकों से भी प्रभावित होते हैं। उदाहरण के लिए, लीजियोनेला निमोनिया, एयर कंडीशनिंग सिस्टम के जरिए फैलता है। कोविड​​-19 के मामले में प्रयोगशालाओं ने साबित किया है कि ये वायरस एरोसोल में जीवित रह सकता है। हालांकि, मौजूदा सबूत बताते हैं कि कोरोनावायरस ट्रांसमिशन का ये प्राइमरी रूट नहीं है।

कई अध्ययनों में एरोसोल पार्टिकल में सार्स-सीओवी-2 के प्रमाण मिले हैं। लेकिन अभी तक की समझ यह है कि ये संक्रामक नहीं हैं। क्या आप बता सकते हैं कि एरोसोल पार्टिकल में मौजूद वायरस कब संक्रामक हो जाता है?

ऐसे अध्ययन महत्वपूर्ण हैं। बीमारी के बारे में हमारी समझ अभी भी बन रही है। हालांकि, एरोसोल में वायरल होने भर से इसका हवा में ट्रांसमिशन साबित करना मुश्किल है। वैसे यह संभावना अभी भी है कि भीड़ वाले स्थान संक्रमण की संभावनाएं बढ़ा सकते हैं। इसलिए, भीड़ का आकार, संक्रामक लोगों की संख्या आदि को देखें बिना, बड़े पैमाने पर खुले क्षेत्र में हवा के जरिए वायरस प्रसार की संभावना नहीं जताई जा सकती है। फ्री-फ़्लोटिंग एरोसोल्स की तुलना में फ़ोमाइट्स (सतह) संक्रमण के अधिक कारगर ट्रांसमीटर हैं।

सार्स, मर्स, कोविड-19 जैसे जूनोटिक बीमारियों का इलाज इतना मुश्किल क्यों है?

क्योंकि ये नया संक्रमण है, जहां वायरस होस्ट के साथ मिलकर विकसित नहीं हुआ है (जैसे तपेदिक के मामले में)। इसलिए, इंफेक्शन फैटिलिटी रेट (न कि मौत) अभी भी काफी कम है। संक्रमित होने वाले प्रत्येक 100 लोगों में से 99 पूरी तरह से ठीक हो रहे हैं। लगभग 30-50 को इस बात का एहसास भी नहीं है कि वे बीमार थे।