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19वीं सदी में महिला मिशनरी ने खोले आधुनिक चिकित्सा के द्वार

प्रिसिला विंटर महिला मिशनरी थीं जिनकी कोशिशों से 1874 में दिल्ली के चांदनी चौक में पहली डिस्पेंसरी खुली जो महिला चिकित्सा मिशन के नाम से जानी गई

By Kaushik Das Gupta

On: Thursday 28 May 2020
 
19वीं सदी में महिला मिशनरी ने खोले आधुनिक चिकित्सा के द्वार
प्रिसिला विंटर 1858 में दिल्ली पहुंची थीं। उन्हें बहुत जल्द एहसास हो गया कि यहां की महिलाओं को चिकित्सीय मदद की सख्त जरूरत है प्रिसिला विंटर 1858 में दिल्ली पहुंची थीं। उन्हें बहुत जल्द एहसास हो गया कि यहां की महिलाओं को चिकित्सीय मदद की सख्त जरूरत है

1860 के दशक में एक दुबली पतली युवा यूरोपीय महिला दिल्ली में खासतौर पर यमुना के महिला घाटों पर दवाओं के बॉक्स के साथ मौजूद रहती थी। उनका नाम प्रिसिला विंटर था। वह एक एंग्लिकन मिशनरी थी और उनके पास चिकित्सा में कोई प्रशिक्षण नहीं था। 19वीं शताब्दी में यूरोपीय उपनिवेशों में प्रिसिला जैसे मिशनरी काफी आम थे। मिशन के परिदृश्य में अच्छे योग्य डॉक्टरों और नर्सों की मौजूदगी के प्रचलन में आने से पहले तक, ऐसे ही कई आम मिशनरियों ने अपने इलाकों के आसपास के समुदायों में बीमारियों के लक्षणों को दूर करने की कोशिशें कीं।

प्रिसिला विंटर यूनियन सोसायटी फॉर द प्रोपेगेशन ऑफ गॉस्पेल (यूएसपीजी) में शामिल होने के लिए 1858 में दिल्ली पहुंची थीं। उनकी प्रमुख जिम्मेदारी शहर की महिलाओं के बीच ईसा मसीह के संदेश का प्रचार करना था। लेकिन, यूएसपीजी के दिल्ली मिशन की ओर से निकलने वाले त्रैमासिक सूचना-पत्र दिल्ली मिशन न्यूज के एक नोट के मुताबिक, “जैसे ही विंटर को यह काम मिला, उनकी तेज नजरों ने भारत में चिकित्सा के क्षेत्र में महिलाओं की जरूरत के महत्व को भांप लिया।” विंटर खुद लिखती हैं, “भारत में महिलाओं को पीड़ा से कोई राहत नहीं मिल रही है। पुरुष उनके हाथों में जो दवाएं थमाते हैं, उनके उपाय बहुत कठिन होते हैं।” इसलिए उन्होंने सभी वर्गों की हिंदू महिलाओं के लिए सरल उपचार वाली दवाएं बांटनी शुरू कर दीं, जिनकी आत्मा को परदे के बंधन से सिर्फ तभी कुछ देर के लिए राहत मिलती थी, जब वे संकल्प लेने के लिए नदी में जाती थीं।

शहर में आए दिन हैजा और इंफ्लुएंजा की महामारियां फैली रहती थीं। इस मिशनरी के दिए गए इलाज से प्रभावित होकर महिलाएं दूसरों से भी उनकी सिफारिश करती थीं। धीरे-धीरे काम का विस्तार हुआ। इंग्लैंड में अपनी छुट्टियां बिताने के दौरान विंटर ने दिल्ली में एक डिस्पेंसरी स्थापित करने की अपनी योजना के लिए सहायती मांगी। इस योजना के लिए धन और प्रचार की व्यवस्था करने के लिए “व्हाइट लेडीज असोसिएशन” के नाम से समर्थकों की एक संस्था का गठन किया गया। 1874 में दीवारों से घिरे शहर में चांदनी चौक में एक घर किराए पर लिया गया और एक महिला कार्यकर्ता डिस्पेंसरी का प्रबंधन करने, नर्सों को प्रशिक्षण देने और बीमार महिलाओं को उनके घर जाकर देखने के काम में जुट गई। पंजाब सरकार ने दवाओं के लिए 410 रुपए प्रति वर्ष के दान की घोषणा की तो दिल्ली नगर पालिका ने प्रशिक्षण हासिल कर रहीं महिला नर्सों को हर महीने 75 रुपए की स्कॉलरशिप दी।

चांदनी चौक पर शुरू हुई यह छोटी-सी डिस्पेंसरी आगे चलकर दिल्ली महिला चिकित्सा मिशन के तौर पर जानी गई। लोगों को सहायता के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं था। लंबे समय तक मिशनरियों के विरोध की खबरों के आदी रहे उनके यूरोपीय समर्थकों के लिए, भारतीयों के ओर से चिकित्सा सेवाएं मुहैया करा रहे मिशनरियों का स्वागत एकदम विपरीत बात थी। बीमारियों के भयानक बोझ तले दबे लोगों के देश में पश्चिमी जगत से दवाओं का उपहार लेकर जा रहे बहादुर मिशनरी डॉक्टरों की कल्पना ने इंग्लैंड में आमजन को उद्वेलित कर दिया। घरेलू समर्थन के बावजूद दिल्ली चिकित्सा मिशन को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। प्रारंभिक वर्षों के दौरान चिकित्सा देखभाल प्रदान करने के लिए कई तात्कालिक तरीकों को अपनाया गया था। चिकित्सा सेवाएं मुहैया कराने वाले शुरुआती मिशनरियों को बिना किसी खास कौशल के इस मिशन में उतार दिया गया। बहुत से लोगों को विंटर की दवाओं के बक्से से ज्यादा भरोसा अपने अनुभव पर था। 1879 में अस्पताल में थोड़े से प्रशिक्षण के बाद एक दाई ने डिस्पेंसरी को ज्वाइन कर लिया।

हालांकि, ये मिशनरी कब तक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल कर सकते थे? 19वीं सदी के दौरान स्वदेशी उपचार के प्रति पश्चिमी दृष्टिकोण धीरे-धीरे सख्त होने लगा। इतिहासकार रोजमेरी फिट्जगेराल्ड के अनुसार, “मिशनरियों के गलत काम को पश्चिमी चिकित्सा का आधिपत्य स्थापित करने की व्यापक साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं से समझौता करने के तौर पर भी माना जाता है।” 1883 में कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल सीआर फ्रांसिस ने मिशनरियों को याद दिलाया कि चिकित्सा सेवाओं में लगे मिशनरियों को अपने पेशेवर कौशल के जरिए मूल निवासियों को प्रभावित करना चाहिए था। मिशनरियों ने उपनिवेशों में मृत्यु और बीमारी के पैमाने की ओर संकेत करके इस तरह की आलोचनाओं को रोकने की कोशिश की। उदाहरण के लिए दिल्ली मिशन के प्रमुख जीए लेफ्रॉय ने कहा कि मिशनरी महिलाएं पुरातन यूनानी हकीमों और नाइयों की तुलना में बीमारियों से निपटने के लिए कहीं अधिक तैयार थीं।

लेकिन बहुत ही जल्द मिशनरी आशंकित हो गए कि अगर उनके चिकित्सा कर्मचारी अपने अपरिपक्व तौर-तरीकों को अपनाए रहे, तो वे अब तक अर्जित की गई सद्भावना खो देंगे। बल्कि, एक मिशनरी ने स्वीकार किया, “चूंकि मैं उन्हें हर बीमारी के लिए दवा नहीं दे सकता था, इससे महिलाओं को गुस्सा आता था और वे यह मानती थीं कि मैं उन्हें सलाह नहीं दूंगी।” दिल्ली मिशन ने यह भी महसूस किया कि डिस्पेंसरी और अस्पताल में देखभाल के लिए रोगियों को उनके घर से निकालकर चिकित्सकीय और ईसायत के मतानुसार काफी कुछ हासिल किया जा सकता है। लेकिन, भारतीय घरेलू वातावरण ने मिशनिरियों को ऐसा कोई आदर्श माहौल नहीं प्रदान किया, जिसमें वे शरीर और आत्मा दोनों को छू लेने वाली दोहरी देखभाल की व्यवस्था लागू कर पाते। मिशन के दृष्टिकोण के मुताबिक, भारतीय घरों में अव्यवस्था व अशांति भरे माहौल और गंदगी ने इलाज की गुणवत्ता को प्रभावित किया। इसका मतलब डॉक्टर के निर्देशों का पालन न करने से भी था, क्योंकि परिवार के सदस्य और स्वदेशी चिकित्सक लगातार हस्तक्षेप कर रहे थे।

1885 में दिल्ली की महिलाओं और बच्चों के लिए पहला अस्पताल सेंट स्टीफेंस हॉस्पिटल खोला गया। अपनी स्वच्छता और अनुशासन के साथ ही यह अस्पताल महिलाओं के लिए शिक्षा के रूप में माना जाता था। रोगियों को शास्त्रों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और वास्तविक उपचार से पहले धार्मिक सिद्धांत के मुताबिक निष्पक्ष प्रशासन को सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि, पहली योग्य डॉक्टर जेनी मुलर ने 1891 में ही सेंट स्टीफंस हॉस्पिटल को ज्वाइन कर लिया था और 1906 में अस्पताल के वर्तमान स्थल तीस हजारी में एक बड़े आधार की नींव रखी गई थी। लेफरोय ने सोचा कि यह दिल्ली मेडिकल मिशन को मजबूती प्रदान करेगा। लेकिन हर कोई उतना आश्वस्त नहीं था। मुलर वास्तव में आशंकित थीं कि प्रशिक्षित कर्मियों की कमी अस्पताल को उसके उद्देश्यों के साथ न्याय करने से रोक सकती है। उन्होंने कहा, “मुझे यकीन है कि हम इतनी उदारता से दान किए गए धन को बर्बाद कर रहे हैं।”

लाहौर प्रांत, जिसका हिस्सा दिल्ली मिशन था, इन्हीं चिंताओं में डूबा हुआ था। 1893 में महिला चिकित्सा मिशनरियों के सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि भारत में महिलाओं के लिए महिला अस्पताल से जुड़े एक मेडिकल स्कूल की आवश्यकता है। आगे के वर्षों में द नॉर्थ इंडिया स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर क्रिश्चियन वूमेन खोला गया, जिसमें चार कर्मचारी और चार स्टूडेंट्स थीं। सेंट स्टीफंस अस्पताल ने भी एलिस विल्किंसन के मातहत नर्सों के लिए एक प्रशिक्षण स्कूल शुरू किया, जो पहली प्रशिक्षित ब्रिटिश नर्स थीं और 1908 में अस्पताल को ज्वाइन किया था। विल्किंसन अस्पताल की नर्सिंग अधीक्षक बन गईं और उन्हें न केवल सेंट स्टीफेंस में, बल्कि बाकी भारत में भी नर्सिंग के मानकों को बढ़ाने का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने ट्रेंड नर्स असोसिएशन ऑफ इंडिया की स्थापना की और 1948 तक इसकी सचिव के रूप में काम किया।

1913 में पहले योग्य सर्जन हेलेन फ्रैंकलिन ने अस्पताल को ज्वाइन किया। मिशनरियों को कई रियायतें देनी पड़ीं। अस्पताल में रसोइया हमेशा एक ब्राह्मण था। उन्हें उन रिश्तेदारों का मोह भी सहना पड़ता था, जिन्हें देखते हुए वे अपने वार्ड से गायब हो जाते थे। इस सबके साथ व्यावसायिकता ने मिशनरी चिकित्सा कार्य बड़े पैमाने पर स्वीकृति दिलाने में अहम भूमिका निभाई। अतीत में सभी तरह के स्वदेशी उपचार आजमाने के बाद अक्सर मिशनरियों के पास परामर्श के लिए पहुंचते थे। 20वीं शताब्दी के दूसरे दशक तक वे यह रिपोर्ट करने में सक्षम थे कि बीमारी की अवस्था में हताश होकर रोगियों का एक बड़ा हिस्सा उनसे परामर्श करने को तैयार था।