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स्मार्टफोन की लत कर रही है आपकी जिंदगी तबाह, जानें कैसे…

एक अंतर्राष्ट्रीय रिसर्च के मुताबिक, हम एक दिन में लगभग 2600 बार अपना फोन चेक करते हैं, इस आदत के काफी बुरे परिणाम हो सकते हैं 

On: Monday 09 December 2019
 
Photo: Agnimirh Basu
Photo: Agnimirh Basu Photo: Agnimirh Basu

स्मार्टफोन के ढेरों फायदों के बीच में उसके बहुत सारे नुकसान भी छुपे हुए हैं। यह डर व्यापक तौर पर फैला हुआ है कि डिजिटल डिस्ट्रैक्शन हमारी जिंदगी और दोस्तों के साथ संबंधों को खराब कर रहे हैं। एक रिसर्च के मुताबिक, हम एक दिन में 2600 बार अपना फोन चेक करते हैं, फोन गुम जाने के खयाल से ही घबरा जाते हैं और फोन वाइब्रेट न भी कर रहा हो तब भी वाइब्रेशन महसूस करते हैं। इसे फैंटम वाइब्रेशन सिंड्रोम कहते हैं। यही नहीं मैसेज आने का अलर्ट भी मैसेज पढ़ने की तरह हमारा ध्यान भंग करने को काफी होता है।

इन आदतों के काफी बुरे परिणाम हो सकते हैं। जैसे कि अगर आप किसी से बात करते समय मैसेज का जवाब देने लगें या बार-बार फोन चेक करें तो  इसका मतलब निकलता है कि आप उनसे बात करने में इंटरेस्ट नहीं रखते। हालांकि वर्तमान तकनीक ने हमें पहले की अपेक्षा लोगों के कहीं ज्यादा पास ला दिया है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि हम कैसे मोबाइल फोन का सही इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।

हमारी बातचीत को कैसे प्रभावित करती है स्क्रीन

टेक्नोलॉजी और कम्युनिकेशन क्षेत्र की रिसर्चर टेरी आर. कुर्ट्जबर्ग ने लगभग दो दशक तक रिसर्च करके यह जानने का प्रयास किया कि स्क्रीन के जरिए किए गए  संवाद में और आमने-सामने या खत के माध्यम से की जाने वाली बातचीत में क्या अंतर है। इन स्टडीज की माने तो सोशल मीडिया पर लोग आम ज़िंदगी से ज्यादा झूठ बोलते हैं, दूसरों को बुरा फीडबैक देते हैं और दूसरों से आदर्श व्यवहार की उम्मीद रखते हैं। 5 साल से छोटे बच्चों में दिमागी विकास को लेकर चिंताजनक नतीजे पाए गए हैं।

स्क्रीन टाइम बढ़ने को लेकर हमारे मन में जो डर है उसके तीन बिंदु हैं- मेंटल हेल्थ, एडिक्शन और अपने आसपास के वातावरण से जुड़ाव यानी लेवल ऑफ इंगेजमेंट। ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले टीनेजर्स और डिप्रेशन जैसी बीमारियों में सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण लिंक देखा गया है। मनोविज्ञान ने तो जरूरत से ज्यादा वीडियो गेम खेलने की आदत को एडिक्शन यानी अडिक्टिव डिसऑर्डर्स की श्रेणी में शामिल कर दिया है, जिसके लिए दुनियाभर में अनेक पुनर्वसन केंद्र (रिहैब सेंटर्स) बनाए गए हैं।

टेक्नोलॉजी ने जोड़ा दुनिया के हर कोने को

मोबाइल फोन के बढ़ते चलन ने हमें एक-दूसरे से जोड़ा भी है। बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रहे बच्चे का चेहरा आज मां-बाप किसी भी वक्त देख सकते हैं। दो कलीग्स अलग शहरों में होते हुए भी साथ काम कर सकते हैं और दोस्त जब चाहे एक दूसरे से बात कर सकते हैं। आज दुनिया के हर कोने की खबर हमें मिल जाती है। स्मार्टफोन के कारण हम बातचीत में तस्वीरों, GIFs और emojis का इस्तेमाल कर पाते हैं। यहां तक कि ऑनलाइन गेम खेलना भी कुछ लोगों के लिए नए लोगों से मिलने और उनसे जुड़ने का एक तरीका बन गया है। एक तरह से देखा जाए तो स्मार्टफोन हमारे रिश्तों में एक नयापन ला रहा है।

क्या आप अपने मोबाइल को ज़रूरत से ज़्यादा टाइम दे रहे हैं?

मोबाइल फोन में आप कितना टाइम इन्वेस्ट कर रहे हैं, यह जानने के लिए आप खुद से 2 सवाल पूछ सकते हैं।

पहला सवाल ये कि इतना देर तक मोबाइल चला कर मैं उसमें क्या काम करता हूं और क्या वो मेरी प्राथमिकताओं और मूल्यों के अनुरूप है या नहीं। दूसरा सवाल यह कि आपकी ज़िन्दगी के वे कौन से हिस्से हैं जिन पर फोन के अधिक इस्तेमाल से बुरा असर पड़ रहा है लेकिन आप देख नहीं पा रहे हैं?

हाल में हुई स्टडीज बताती हैं कि हम मल्टीटास्किंग यानी एक टाइम पर एक से ज़्यादा काम करने में उतने अच्छे नहीं हैं जितना हम सोचते हैं। मल्टीटास्किंग करने से हम किसी भी काम को अपना 100 % अटेंशन नहीं दे पाते और इस कारण हमारे काम में गलतियों की संख्या बढ़ जाती है। लम्बे समय तक, मल्टीटास्किंग करने से चीजों को याद रखने की हमारी क्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है।

बनाना होगा संतुलन

यह सच है कि आप फोन का इस्तेमाल बंद नहीं कर सकते, लेकिन कभी-कभी कुछ समय के लिए अगर आप फोन को अपनी नजरों से दूर रख देंगे तो इससे आपको जटिल समस्याएं सुलझाने और अपने आस-पास के लोगों से बेहतर तरीके से जुड़ने में मदद मिलेगी।

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