उत्तराखंड: मांओं और नवजात शिशुओं की मौत के मामलों की जांच जरूरी

उत्तराखंड में वर्ष 2016-17 से 2020-21 के बीच कुल 798 महिलाओं ने प्रसव के दौरान या प्रसव से जुड़ी मुश्किलों के चलते दम तोड़ दिया

By Varsha Singh

On: Friday 04 March 2022
 
उत्तराखंड के पौड़ी की महिलाएं कहती हैं कि गांव में ज्यादातर बच्चे घरों में ही जन्म लेते हैं। हम अस्पताल तभी जाते हैं जब गर्भवती महिला को कोई दिक्कत हो जाती है। फोटो: वर्षा सिंह
उत्तराखंड के पौड़ी की महिलाएं कहती हैं कि गांव में ज्यादातर बच्चे घरों में ही जन्म लेते हैं। हम अस्पताल तभी जाते हैं जब गर्भवती महिला को कोई दिक्कत हो जाती है। फोटो: वर्षा सिंह उत्तराखंड के पौड़ी की महिलाएं कहती हैं कि गांव में ज्यादातर बच्चे घरों में ही जन्म लेते हैं। हम अस्पताल तभी जाते हैं जब गर्भवती महिला को कोई दिक्कत हो जाती है। फोटो: वर्षा सिंह

देश और दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में मातृ मृत्यु दर का ग्राफ नीचे की तरफ आया है लेकिन उत्तराखंड में पिछले 5 सालों में मातृ मृत्यु दर के मामले बढ़े हैं। पर्वतीय क्षेत्रों की दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, अस्पतालों की दूरी, अस्पतालों में जरूरी सुविधाओं का न होना, विशेषज्ञ डॉक्टरों का न होना जैसी मुश्किलें हिमालयी राज्य की महिलाओं के सुरक्षित प्रसव में बाधा बन रही है। ऐसे में, मां और नवजात शिशुओं की मौत के मामलों की जांच जरूरी माना जा रहा है।

उत्तराखंड में वर्ष 2016-17 से 2020-21 के बीच कुल 798 महिलाओं ने प्रसव के दौरान या प्रसव से जुड़ी मुश्किलों के चलते दम तोड़ा। वर्ष 2016-17 में राज्य में कुल 84 मातृ मृत्यु हुई। 2017-18 में 172, 2018-19 में 180, 2019-20 में 175 और 2020-21 में 187 महिलाओं ने बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया में जान गंवाई। सूचना का अधिकार (आरटीआई) के ज़रिये ये आंकड़े हासिल किए गए हैं। उत्तराखंड के लिए चिंता की बात ये है कि यहां प्रसव के दौरान होने वाली मौतें कम होने की जगह बढ़ रही हैं। वर्ष 2016-18 के बीच मातृ मृत्युदर का राष्ट्रीय औसत 113 है।

5 दिसंबर 2019 को संगीता कोहली ने पिथौरागढ़ के हरगोविंद पंत महिला चिकित्सालय में बच्चे को जन्म देने के बाद दम तोड़ दिया था। उनके पति विनोद कोहली बताते हैं कि संगीता बिलकुल स्वस्थ्य थी। ये उसका दूसरा प्रसव था। बच्चे को सुरक्षित जन्म देने के बाद उसकी हालत बिगड़ी। डॉक्टरों ने उनसे खून का इंतजाम करने को कहा। मैं खून का बंदोबस्त करके अस्पताल लौटा तो डॉक्टरों ने कहा कि हम इसे बचा नहीं पाए। संगीता स्वस्थ्य थी। उसका हीमोग्लोबिन भी अच्छा था। मुझे पता चला कि प्रसव के बाद सफाई के दौरान कोई नस कट गई और खून का बहना बंद नहीं हुआ

पिथौरागढ़ के डीडीहाट तहसील के देवेंद्र बहादुर की पत्नी मधू खांका की मौत भी प्रसव के बाद बहुत अधिक रक्तस्त्राव के चलते हुई। वह कहते हैं मेरी दूसरी बेटी का जन्म हुआ और उसकी मां चली गई। वो बिलकुल स्वस्थ थी। सबकुछ अचानक ही हुआ। मुझे कुछ समझ नहीं आया। हमारी तरफ ऐसे मामले आते रहते हैं। ये रुकना चाहिए

पिथौरागढ़ की आशा कार्यकर्ता नीरू कहती हैं कि अस्पताल में जरूरी सुविधाओं की कमी है। डॉक्टर हैं, लेकिन उनके पास साधन नहीं हैं। 2019 में मेरी भी एक मरीज मंजू लाल की महिला अस्पताल में मौत हुई थी। वो दिन भर बिलकुल ठीकठाक थी। स्वस्थ्य बच्चे को जन्म दिया। लेकिन थोड़ी देर-बाद हाथ-पांव सुन्न होने की शिकायत की और कुछ ही मिनटों में उसकी मौत हो गई

नैनीताल की मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ भागीरथी जोशी कहती हैं कि प्रसव के बाद अत्यधिक रक्त बहने (पोस्टपार्टम हैमरेज) की कई वजहें होती हैं। इसके बारे में प्रसव से पहले कुछ नहीं कहा जा सकता है। लेकिन किसी महिला में ख़ून की कमी होती है तो उस पर खतरा बढ़ जाता है। रक्त का इंतज़ाम करने या हायर सेंटर पहुंचने तक वे बर्दाश्त नहीं कर पाती। वह मानती हैं कि महिलाओं में एनिमिया को दूर करना बहुत जरूरी है। साथ ही  राज्य के सीएचसी में आपात स्थिति में ऑपरेशन की व्यवस्था होने से स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर की जा सकती हैं।

उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में  संस्थागत प्रसव अब भी एक चुनौती है। 2019 तक राज्य में संस्थागत प्रसव 71 प्रतिशत था जिसे बढ़ाकर 2020 तक 80 प्रतिशत करने का लक्ष्य तय किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादातर स्थिति गंभीर होने या अन्य समस्या आने पर ही महिलाएं अस्पताल जाती हैं। 

राज्य में वर्ष 2016-17 से 2020-21 के बीच हुई कुल मातृ मौतों में से तकरीबन 51 प्रतिशत देहरादून और हरिद्वार में हुई हैं। पर्वतीय ज़िलों से गर्भवती महिलाओं के सुरक्षित प्रसव के लिए अब भी स्वास्थ्य सेवाओं का ज्यादातर भार मैदानी जिलों के अस्पतालों में ही है।

नवजात शिशुओं की मौत

जन्म से लेकर 28 दिनों के भीतर होने वाली नवजात शिशु मृत्यु के मामले में राष्ट्रीय औसत में गिरावट आई है। जबकि उत्तराखंड में पिछले 5 वर्षों में तकरीबन ढाई गुना (238%) बढ़ोतरी हुई है। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक राज्य में 2016-17 में कुल 228 नवजात शिशु की मृत्यु हुई थी। 2017-18 में 588, 2018-19 में 868, 2019-20 में 839 और 2020-21 में 772 नवजात शिशु की मृत्यु हुई है। यानी 5 वर्षों में 3295 बच्चे जन्म से एक महीने का सफ़र भी पूरा नहीं कर सके।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत उत्तराखंड में वर्ष 2025-26 तक मातृ मृत्युदर प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 70 से नीचे और नवजात शिशु मृत्युदर प्रति एक हज़ार जीवित जन्म पर 12 से नीचे रखने का लक्ष्य है।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते समय पर अस्पताल तक पहुंचना कई बार चुनौतीभरा हो जाता है। पिथौरागढ़ में युवा शोधार्थियों के स्वतंत्र समूह उत्तराखंड रिसर्च ग्रुप ने राज्य के ज़िला और महिला चिकित्सालयों में आरटीआई के ज़रिये मातृ-नवजात मृत्यु के आंकड़े इकट्ठा किए। साथ ही कैग व अन्य स्वतंत्र रिपोर्टों के आंकड़ों का भी संज्ञान लिया। रिसर्च ग्रुप से जुड़े छात्र शिवम पांडे कहते हैं कि राज्य में खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाओं का मुद्दा तो है लेकिन इस पर डाटा न होने से सही स्थिति पता नहीं चलती और जवाबदेही भी तय नहीं हो पाती।

राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। देहरादून की गैर-सरकारी संस्था एसडीसी फाउंडेशन को आरटीआई के ज़रिये दी गई जानकारी के मुताबिक 30 अप्रैल2021 तक राज्य में स्त्रीरोग विशेषज्ञ के 165 स्वीकृत पदों में से मात्र 59 पर तैनाती थी और 106 पद रिक्त थे। जबकि बालरोग विशेषज्ञ के 155 में से 64 पदों पर तैनाती और 91 रिक्त पद थे।

ज्यादातर रिक्त पद पर्वतीय ज़िलों में हैं। जैसे चमोली में 9 स्त्रीरोग विशेषज्ञ में से मात्र 1 इस अवधि में कार्यरत थीं। टिहरी में 15 में से मात्र 2, बागेस्वर में 5 में से एक, पौड़ी में 22 में से 4, रुद्रपर्याग में 4 में से 1, चंपावत में 6 में से 2, पिथौरागढ़ में 9 में से 3, अल्मोड़ा में 18 में 7, नैनीताल में 27 में 11, उधमसिंह नगर में 14 में 7, हरिद्वार में 14 में 3 और देहरादून में 15 में 15 पद पर स्त्रीरोग विशेषज्ञ कार्यरत थीं।

 

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