Natural Disasters

हीट वेव अब तक एनडीएमए की 12 आपदाओं में शामिल नहीं

एनएमडीए ने मौसम विभाग व स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर एक रूपरेखा बनाई। 

 
By Anil Ashwani Sharma
Last Updated: Wednesday 12 June 2019

हीटवेव का सबसे अधिक प्रकोप 2015 में जब देश को झेलना पड़ा तब राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी (एनडीएमए) ने पहली बार वृहद स्तर पर हीटवेव एक्शन प्लान बनाया। इस हीटएक्शन प्लान में 11 राज्यों को शामिल गया था। 2017 हीटवेव से प्रभावित राज्यों की संख्या 17 हो गई। हालांकि यह अपने आप में एक विरोधाभाष है कि हीटवेव को एनडीएमए की 12 आपदाओं में शामिल नहीं किया गया है। इस संबंध में एनडीएमए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि केंद्रीय वित्तीय आयोग के अनुसार 12 आपदाओं को शामिल किया है लेकिन हीटवेव  शामिल नहीं है। कई ऐसी आपदाएं हैं, जिनके संबंध में पहली बार केंद्रीय वित्तीय आयोग ने सुझाव दिया है कि राज्य सरकार उन आपदओं को परिभाषित करें और अपने स्तर पर उसे आपदा घोषित करे, जिन्हें 12 आपदाओं में शामिल नहीं किया गया है। इस संबंध में चूंकि यह व्यवस्था की गई है कि एनडीआरएफ व एसडीआरएफ का फंड केवल आपदा के लिए ही खर्च हो सकता है। ऐसे में कमीशन ने यह व्यवस्था दी है कि वह एसडीआरएफ फंड का 10प्रतिशत राज्य अपने द्वारा घोषित आपदा पर खर्च कर सकता है। जैसे लाइटनिंग, हीटवेव आदि को राज्य आपदा घोषित कर इस फंड की 10 प्रतिशत की राशि आपदा प्रभावितों के बीच बांट सकता है। अधिकारी ने बताया कि पहले सबसे अधिक प्रभावित पांच राज्यों (गुजरात, आंध्र, तेलांगना,गुजरात, ओडिशा) में हीटवेव से हुई मौत के लिए मुआवजे की भी व्यवस्था की गई। आंध्र प्रदेश में एक लाख, ओडिशा में 30 हजार रुपए का मुआवजा दिया जाता है।

इस संबंध में उत्तर प्रदेश शासन के राजस्व शासनादेश संख्या 303, 27 जून 2016 को जारी किया। इसमें हीटवेव के प्रकोप को राज्य आपदा माना गया है। इसके तहत पीड़ित व्यक्ति या उसके परिजनों को सहायता राशि देने का प्रावधान किया गया है। इसके अनुसार हीटवेव लगने से मौत होने पर चार लाख रुपए की मदद मृतक के परिवार को दी जाएगी। इस संबंध में कानपुर देहात के जिलाधिकारी ने बताया कि इस बार हीटवेव से निपटने के लिए किए एनडीएमए द्वारा भेजे गए दिशा-निर्देशों का पालन किया गया है। इस संबंध में उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने आपदा प्रबंधन के अंतर्गत 2018-19 के लिए 3 करोड़ 60 लाख जारी किए हैं। यह 23 हीटवेव प्रभावित जिलों के लिए है। जबकि 2016-17 में 1 करोड़ 85लाख रुपए जारी किए गए थे।

छत्तीसगढ़ के बी.आर. आंबेडकर अस्पताल की स्वास्थ्य अधिकारी बताती है जब हीटवेव लगती है तो लोगों के शरीर में पानी की कमी या अन्य कारण दिखाई देता है और कई बार समय पर सही इलाज नहीं होने पर मौत भी हो जाती है। हीटवेव प्रभावित मरीजों के लिए यहां इमरजेंसी सेवाओं से लेकर आईसीयू तक पर्याप्त संख्या में हैं। इसके कारण इस प्रकार के मरीजों के आते ही उसे उचित उपचार मिल जाता है। इस वजह से पिछले कई वर्षों में इस अस्पताल में हीटवेव से मरने की बात सामने नहीं आई है।

अहमदाबाद में म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के साथ मिलकर साउथ एशिया फर्स्ट एक्शन प्लान 31 मई 2017 को लागू किया गया। इस प्लान के बारे में दिलीप मावलंकर ने बताया कि मौसम विभाग के साथ मिलकर 43 डिग्री के ऊपर तापमान जाने पर इसे ऑरेंज अलर्ट घोषित किया गया जबकि यह पारा 48 डिग्री पहुंचने पर रेड अलर्ट घोषित किया गया। अब देश के 100 से ज्यादा स्थानों पर 300 शहरों में मौसम विभाग के साथ मिलकर लोगों को मौसम का अलर्ट जारी करने का काम किया जा रहा है।

हालांकि एनडीएमए के एक अधिकारी का कहना है कि जब से मुआवजे की बात आई है तब से हीटवेव से हुई मौत के बारे में कई गलत रिपोर्टिंग होती है। इसके लिए उन्होंने चेक एंड बैलेंस करने के लिए एक नया दिशा-निर्देश गाइड लाइन में शामिल किया है। उदाहरण के लिए यदि हीटवेव से कोई मौत होती है तो मृतक को सबसे पहले अस्पताल ले जाएगा और डॉक्टर बताएगा किस तरह की मौत है। लेकिन सवाल उठता है जो गरीब लोग अस्पताल पहुंचने की ही स्थिति में ही न हों तो उनका क्या किया जाए। उदाहरण के लिए किसी की मौत गांव में हो जाती है तो उसके बारे में जानकारी कैसे होगी। ऐसे में एनडीएमए ने इसके लिए जिला स्तर पर एक कमेटी बनाई जिसमें जिलाधीश डॉक्टर, राजस्व अधिकारी, बीडीओ, जनप्रतिनिधि व सिविल सोसायटी को कोई एक व्यक्ति हो सकता है। यह कमेटी जांच करेगी और उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही संबंधित पीड़ित के परिवार को मुआवजा दिया जाएगा। कमेटी पता करेगी कि स्थानीय तापमान के अलावा व्यक्ति कब से बीमार है, उसकी मौत स्वाभाविक है या कोई और कारण इसके लिए जिम्मेदार है। एज फैक्टर व तापमान के साथ-साथ उमस की स्थिति का भी आकलन किया जाएगा।

अधिकारी ने बताया कि उदाहरण के लिए यदि तापमान 37 डिग्री सेल्सियस है और उसमें 90 प्रतिशत उमस है तो ऐसे में मरीज का शरीर सुविधाजनक स्थिति में नहीं होगा क्योंकि ऐसी स्थिति में व्यक्ति 63 डिग्री सेल्सियस तापमान महसूस करेगा। यदि तापमान 45 डिग्री सेल्सियस है और उमस 20 प्रतिशत है तो ऐसे में व्यक्ति को अधिकतम 43 डिग्री सेल्सियस तापमान का अहसास होगा। आमतौर पर शरीर 37 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में आराम की स्थिति में होता है लेकिन इसके बाद जैसे-जैसे इसमें वृद्धि होती जाती है वह असुविधाजनक स्थिति में जाने लगता है। जहां तक हीटवेव से होने वाली मौतों की गलत रिपोर्टिंग की बात है तो 2016 में ओडिशा में 66 मौत के बारे में दावा किया गया है। लेकिन जब जिला कमेटी ने इसकी छानबीन की तो यह संख्या घटकर 36 मिली। इस कार्य में स्थानीय नौकरशाही से लेकर स्थानीय राजनीतिज्ञ शामिल होते हैं। एक मौत की जांच रिपोर्ट बहुत ही वृहद स्तर पर बनती है। उदाहरण के लिए एक मौत के केस की रिपोर्ट लगभग 124 पेज तक होती है।

एनडीएमए के अधिकारी ने बताया कि एनएमडीए ने मौसम विभाग व स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ मिलकर एक रूपरेखा बनाई है। विशेषकर आईएमडी साथ। मौसम के पूर्वानुमान की स्थिति में एक नया तरीका इजाद किया गया है। अब वह पांच स्तर पर पूर्वानुमान जारी करता है। आईएमडी ने चौदह शहरों को नामांकित किया हुआ है, जहां अधिकतम तापमान होने से नुकसान हो सकता है। इस साल 2018 के अंत ऐसे 100शहरों को चिन्हित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ एनडीएमए ने काम शुरू किया है, जिसके तहत देशभर के सभी जिलों के जिला अस्पताल की निगरानी करना है। इससे देशभर के हीटवेव संबंधी आंकड़े तुरंत मिलेंगे। 2017 में एनडीएमए ने विश्व मौसम विभाग के साथ मिलकर एक नई रूपरेखा तैयार की है। कलर कोडिंग के तहत भी अब हीटवेव की जानकारी लोगों को मुहैया कराई जा रही है। इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक सूचनात्मक बोर्ड हीटवेव इलाकों में लगाए गए हैं। कलर कोड में चार कलर का उपयोग किया गया  है, जैसे- हरा, पीला,नारंगी और लाल। ये हीटवेव की अलग स्टेज को चिन्हित करते हैं।

एनडीएमए ने लगातार बढ़ रही हीटवेव को ध्यान में रखते हुए अब अकेले आदमी ही नहीं पशुओं को भी बचाने के लिए भी 2017 में दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जानवरों के लिए भी शेड की व्यवस्था की गई है। कुछ राज्यों ने तो चारे की भी व्यवस्था की है। अगर इन दिशा-निर्देशों का ईमानदारी से पालन किया जाता है तो नि:संदेह हीटवेव से मौत का आंकड़ा कुछ कम जरूर होगा। लेकिन यह डर भी बना हुआ है कि जो हाल अक्सर सरकारी योजनाओं और दिशा-निर्देशों का होता आया है, कुछ वैसा ही हश्र एनडीएमए की पहल का भी न हो क्योंकि योजना बनाना और उन्हें धरातल पर उतारना दो अलग-अलग पहलू हैं।    

 

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