Health

बच्चों के कुपोषण का कारण हैं इंस्टेंट नूडल्स: यूनिसेफ

यूनिसेफ की रिपोर्ट में कहा गया है मलेशिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे देशों में बच्चों को कम कीमत और आसानी से बनने वाले नूडल्स दिया जा रहा है, जो पोषण की दृष्टि से सही नहीं है 

 
By Lalit Maurya
Last Updated: Monday 21 October 2019
Photo: Creative commons
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विशेषज्ञों का कहना है कि इंस्टेंट नूडल्स खाने का एक सस्ता और आधुनिक साधन है, जो पोषण पर भारी पड़ रहा है। यह पेट तो भर सकता है, लेकिन पोषक तत्वों के आभाव में लाखों बच्चों को बीमार कर रहा है। जो कि बच्चों में कुपोषण की बड़ी वजह बनता जा रहा है।

दुनिया में फिलीपींस, मलेशिया और इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था तेजी से उभर रही है, साथ ही जीवनशैली तेजी से बदल रही है। आज कामकाजी माता-पिता के पास न तो बच्चों को पोषक खाना खिलाने के लिए समय और पैसा है, न ही इस बात की जानकारी है कि उनके स्वास्थ्य के लिए क्या खाना ठीक है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनिसेफ द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, इन तीन देशों में, पांच और उससे कम उम्र के 40 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं, जो वैश्विक औसत से भी अधिक है। गौरतलब है कि वैश्विक रूप से एक तिहाई बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। इंडोनेशिया के एक सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हस्बुल्लाह तबरानी ने बताया कि "माता-पिता का मानना ​​है कि उनके बच्चों का पेट भरना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। वास्तव में वे प्रोटीन, कैल्शियम या फाइबर से मिलने वाले पोषण के बारे में नहीं सोचते।"  ​​

खाने में पोषक तत्वों की कमी है बड़ी समस्या

यूनिसेफ के अनुसार जहां बच्चों में आयरन की कमी उसके सीखने की क्षमता को घटा देती है और मानसिक विकास को सीमित कर देती है, वहीं उसकी मां में आयरन की कमी बच्चे को जन्म देने के दौरान या उसके तुरंत बाद होने वाले मृत्यु के जोखिम को बढ़ा देती है। यह समस्या कितनी गंभीर है, इसे इस बात से ही समझा जा सकता है कि पिछले साल इंडोनेशिया में पांच साल से कम उम्र के 2.44 करोड़, जबकि फिलीपींस में 1.1 करोड़ और मलेशिया में 26 लाख बच्चे आयरन की कमी से ग्रस्त थे। म्यूनी मतुंगा जो कि एशिया में यूनीसेफ की पोषण विशेषज्ञ हैं, ने इस बात का पता लगाया है कि किस तरह परिवार पोषण से भरपूर पारंपरिक भोजन की जगह, सस्ता, सुलभ और आसानी से तैयार होने वाला "आधुनिक" भोजन अपना रहे हैं। उन्होंने बताया कि "नूडल्स बनाने में आसान हैं, सस्ते हैं। यह तुरंत बन जाते हैं और एक आसान विकल्प हैं, पर संतुलित आहार का क्या? क्या यह बच्चों को पर्याप्त पोषण दे सकते हैं ?

गरीबी भी है एक वजह

मत्तुंगा ने बताया कि मनीला में नूडल्स की कीमत 23 अमेरिकी सेंट प्रति पैकेट से भी कम है, लेकिन इसमें आवश्यक पोषक तत्वों और प्रोटीन की कमी होती है। वर्ल्ड इंस्टेंट नूडल्स एसोसिएशन के अनुसार, 2018 में 1250 करोड़ सर्विंग्स के साथ इंडोनेशिया, चीन के बाद इंस्टेंट नूडल्स का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता था। यह आंकड़ा भारत और जापान दोनों की कुल खपत से भी अधिक है।यूनिसेफ की रिपोर्ट में बताया गया है कि पोषक तत्वों से भरपूर फल, सब्जियां, अंडे, डेयरी, मछली और मांस अब आहार से गायब हो रहे हैं, क्योंकि बड़े पैमाने पर ग्रामीण आबादी नौकरियों की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है। हालांकि फिलीपींस, इंडोनेशिया और मलेशिया सभी को विश्व बैंक द्वारा मध्यम आय वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन वहां रहने वाले लाखों लोग अभी भी जीने के लिए पर्याप्त धन कमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मलेशिया के एक सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ टी जयबलान ने बताया कि "गरीबी एक प्रमुख मुद्दा है। उन्होंने कहा कि मलेशिया में कम आय वाले परिवार काफी हद तक तैयार नूडल्स, शकरकंद और सोया आधारित उत्पादों पर निर्भर करते हैं।विशेषज्ञों के अनुसार चीनी से भरपूर बिस्कुट, पेय पदार्थ और फास्ट फूड भी इन देशों के लिए एक बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं। जिसका  एशिया के लोगों के दैनिक जीवन और स्वास्थ्य पर तुरंत प्रभाव पड़ने की संभावना है। साथ ही, इनके प्रचार और विज्ञापन भी बेहद लुभावने होते हैं, बड़े पैमाने पर वितरण के कारण आज यह इंस्टेंट नूडल्स हर जगह यहां तक ​​कि सबसे दुर्गम स्थानों पर भी उपलब्ध हैं।

भारत में भी बढ़ रही है मांग

आज भारत में भी जंक फूड की यह समस्या विकराल रूप लेती जा रही है, आज जिसे देखो हर बच्चा इंस्टेंट नूडल का दीवाना है। मोर्डोर इंटेलिजेंस के विश्लेषण से पता चला है कि भारत में इंस्टेंट नूडल के बाज़ार में 2019-24 के बीच 5.6 फीसदी वृद्धि होने का आसार है। वर्ल्ड इंस्टेंट नूडल्स एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति वर्ष 550 करोड़ नूडल्स सर्विंग् की जाती है। खपत के दृष्टिकोण से विश्व में इसका चौथा स्थान है। भारत में भी नूडल्स की खपत जिस तेजी से बढ़ रही है, उसको देखते हुए यदि जंक फ़ूड से निपटने के लिए जल्द ही ठोस कदम न उठाये गए तो वह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है ।

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