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छठवीं बार इस पृथ्वी पर सामूहिक प्रजातियों की विलुप्ति का प्रबल खतरा

धरती पर अब तक कुल पांच बार सामूहिक प्रजातियों की विलुप्ति हो चुकी है। लगातार खराब होती धरती की सतह के कारण करीब आधी दुनिया (3.2 अरब लोग) की सेहत दांव पर है।  

 
By Vivek Mishra
Last Updated: Sunday 28 April 2019
Photo : Getty images
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हम सब सकुशल रहें और भावी पीढ़िया बेहतर पर्यावरण का आनंद ले पाएं इसके लिए बेहद जरूरी है कि हमारी धरा भी पूरी तरह सुरक्षित रहे। समूची दुनिया में हमारे अस्तित्व को आधार देने वाली धरती को कई तरह से चोट और नुकसान पहुंचाया जा रहा है। स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि धरती की लगातार हो रही क्षति ने इस पृथ्वी पर छठवीं बार सामूहिक प्रजातियों की विलुप्ति का संकट खड़ा कर दिया है। इससे पहले डायनासोर समेत कुल पांच बार प्रजातियों की सामूहिक विलुप्ति हो चुकी है।

जैव-विविधता और पारिस्थितिकी सेवाओं के अंतरराज्यीय विज्ञान नीति मंच (आईपीबीईएस) ने अपनी वैश्विक आकलन ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा है कि मौजूदा समय गलत तरीके से की जा रही मानवीय गतिविधियों के कारण न सिर्फ धरती की सतह खराब हो रही है बल्कि आधी दुनिया यानी 3.2 अरब लोगों की सेहत पर भी इसका नकरात्मक प्रभाव पड़ रहा है। धरती की सतह को नुकसान पहुंचने के एवज में हम प्रत्येक वर्ष वैश्विक स्तर पर 10 फीसदी जैव-विविधता और पारिस्थितिकी सेवाएं गवां रहे हैं।

आईपीबीईएस की ओर से  2005 के बाद दूसरी बार यह आकलन ड्रॉफ्ट रिपोर्ट तैयार की गई है। संस्था की ओर से चार मई को निर्णायक रिपोर्ट जारी की जाएगी। निर्णायक रिपोर्ट में तथ्यों में कुछ बदलाव भी संभव हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया के हर भाग में धरती के खराब होने की शिकायत है। धरती की सतह को कई तरह से नुकसान पहुंचाया जा रहा है। धरती को पुराने स्वरूप में लौटाना और क्षति पर अंकुश लगाना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।

रिपोर्ट में चेताया गया है कि छोटी अवधि में मिलने वाले लाभ के लिए जमीन का बेजा इस्तेमाल एक बड़े नुकसान के तौर पर हमें मिल सकता है। धरती की सतह खराब होने से न सिर्फ प्रजातियों की विलुप्ति होगी बल्कि कई पारिस्थितिकी सेवाएं पूरी तरह ठप हो जाएंगी।

रिपोर्ट के मुताबिक गैरटिकाऊ कृषि व अधिक फसलों की लालच में देशी वनस्पति वाली जमीनों को बर्बाद किया जा रहा है। इसके अलावा जंगलों में गैर वानिकी गतिविधियां, जलवायु परिवर्तन, शहरों का विस्तार, संरचना-विकास, उद्योग की वजह से भी न सिर्फ जमीन खराब हो रही है बल्कि जैवविविधता के नष्ट होने का खतरा भी है।

रिपोर्ट के मुताबिक एशिया और अफ्रीका में किए गए अध्ययनों के मुताबिक जमीन को उसके मूल स्वरूप में वापस लौटाने या उसकी क्षति को रोकने के लिए बरती जाने वाली उदासीनता की भारी कीमत चुकानी पड़ती है। मसलन, यदि समय रहते काम न किया जाए तो भूमि की क्षति उसके तीन गुना ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। वहीं, पुनरुद्धार का लाभ यह है कि ये कार्रवाई की लागत का 10 गुना ज्यादा वापस लौटाती है। न सिर्फ उस जमीन से हमें बायोमास मिलता है बल्कि रोजगार, लैंगिक समानता और शिक्षा व जीवन स्तर में भी सुधार होता है। यदि समय रहते ही भूमि की खराबी को रोका जाएतो हम अपने खाद्य और पेय की सुरक्षा भी करते हैं।

रिपोर्ट में यह चेताया गया है कि भूमि संरक्षण को लेकर हमें समय रहते ही चेतना होगा। अन्यथा इसके दुष्परिणाम समूची मानवजाति के लिए विध्वंसक होंगे।

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